DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

लोकसभा चुनाव 2019 : पश्चिमी यूपी पर टिकीं निगाहें,यहां से कई दिग्गजों की साख दांव पर 

हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बन पिछले दो चुनावों का रुख तय करने वाला पश्चिमी यूपी अभी कोई संदेश देता नहीं दिख रहा है। यह मान्यता पक्की होती जा रही थी कि पश्चिमी यूपी में शुरू हुआ महासंग्राम ही यूपी में चुनाव की असली हवा बनाता है लेकिन अभी तक ऐसी कोई सियासी बयार पूरे सूबे की तरफ आती नहीं दिख रही। यहां की 8 सीटों पर 11 अप्रैल को वोट पड़ना है। अब सियासतदानों की नजरें 5 अप्रैल को सहारनपुर और अमरोहा में होने वाली मोदी की रैली पर हैं। इस आखिरी हफ्ते में पश्चिमी यूपी को कई दलों के दिग्गज नेता चुनावों को रुख देने की कोशिश करेंगे।

कई जगह हो चुकी हैं रैलियां, कई दिग्गज बाकी: मेरठ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रैली कर चुके हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी बागपत, बिजनौर, मेरठ, बुलंदशहर में रैलियां कर चुके हैं लेकिन कांग्रेस और गठबंधन ने अभी तक यहां शुरुआत नहीं की है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, महासचिव प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिंया 8 अप्रैल को सहारनपुर, कैराना और बिजनौर में रैली करेंगे। 7 अप्रैल को मायावती, अजित सिंह व अखिलेश संयुक्त रूप से सहारनपुर में पश्चिमी यूपी में चुनाव प्रचार की शुरुआत करेंगे।

पिछले दो चुनाव में माहौल बनाने में पश्चिमी यूपी मददगार: विशेषज्ञ इसके खास मायने निकाल रहे हैं। वह इसलिए कि  बीते लोकसभा और विधानसभा चुनाव में यहीं से माहौल बना और पूरे यूपी के चुनाव को उसने प्रभावित किया। कहीं कोई मुद्दा काम नहीं आया और न ही कोई और जातीय समीकरण ठीये से बैठ पाया।  मुजफ्फरनगर दंगे, कैराना से पलायन, लव जिहाद जैसे मुद्दों को खूब हवा दी गई और इसकी आंच पूरे प्रदेश तक फैली। इस बार ऐसा नहीं है। विपक्षी पार्टियां भी फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं। वे भाजपा के उठाए ज्यादातर मुद्दों पर चुप्पी साध ले रही हैं ताकि ध्रुवीकरण का माहौल न बने और उन्हें नुकसान  न होने पाए। भाजपा सत्ता में है लिहाजा उसके पास विपक्ष वाले तेवर नहीं हैं।

मेरठ में बीते दिनों हुई रैली में मोदी ने सरकार का रिपोर्ट कार्ड पेश किया, साथ ही राष्ट्रवाद के मुद्दे को भी हवा देने की कोशिश की। हिन्दुत्व आतंकवाद का मुद्दा भी उठाया लेकिन किसी विपक्षी नेता ने आक्रामक रुख नहीं अपनाया। जातीय व धर्मिक गोलबंदी के बावजूद चौंकाने वाले नतीजे देने वाला पश्चिमी यूपी पिछले अनुभवों से उबर चुका है। यहां जाट और मुसलमानों के राजनीतिक प्रभाव की बातें होती हैं।  दलितों और अति पिछड़ों की संख्या भी खासी है। इसी आधार पर माना जाता है कि सपा, बसपा और कांग्रेस के लिए यहां स्थितियां अच्छी हो सकती हैं।

नसीमुद्दीन समेत कई दिग्गजों की सांख दांव पर

यहां से कई दिग्गजों की साख दांव पर हैं। पहली बार लोकसभा चुनाव के लिए मैदान में उतरे नसीमुद्दीन सिद्दीकी कांग्रेस के टिकट पर बिजनौर सीट से हैं। बसपा में कद्दावर नेता के तौर पर पहचान रखने वाले सिद्दीकी के लिए ये चुनाव निर्णायक होगा। सहारनपुर से भाजपा सांसद राघव लखनपाल के मुकाबले कांग्रेस के फायरब्रांड नेता इमरान मसूद और गठबंधन से बसपा के हाजी फजरुल रहमान मैदान में हैं।

बिजनौर से भाजपा ने मौजूदा सांसद कुंवर भारतेंद्र सिंह पर भरोसा जताया है तो गठबंधन की तरफ से बसपा के मलूक नागर हैं। पिछले चुनाव में अपनी जमीन गंवा चुके रालोद अध्यक्ष गठबंधन के प्रत्याशी के तौर पर अजित सिंह इस बार मुजफ्फरनगर की सीट से हैं। बागपत की अपनी परम्परागत सीट उन्होंने अपने बेटे जयंत चौधरी को दे दी है। कांग्रेस ने भी यहां से प्रत्याशी नहीं उतारा है वहीं भाजपा के मौजूदा सांसद संजीव बलियान पर अपनी सीट बचाने का दबाव रहेगा। वहीं कैराना से गठबंधन प्रत्याशी तब्बसुम हसन उप चुनाव में भाजपा की मृगांका सिंह को हराकर सांसद बनी थीं, उन पर अपनी सीट को बचाने का दबाव रहेगा।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Lok Sabha Elections 2019: Look at Western UP the reputation of many veterans at stake