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लोकसभा चुनाव 2019 : भारतीय राजनीति में धन और अपराध की बढ़ती धमक

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भारतीय राजनीति में धन और अपराध की भूमिका कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है। सांसदों की बढ़ती अमीरी उन्हें जनता से दूर ले जा रही है, तो आपराधिक पृष्ठभूमि के आरोपी सांसदों के चुनाव क्षेत्र विकास में पिछड़ते जा रहे हैं। ऐसे प्रत्याशी बिहार-उत्तर प्रदेश में ज्यादा हैं। लोकसभा चुनाव 2019 में क्या है पैसे और अपराध की भूमिका? राजनीति में क्या बदलाव आ रहे हैं? अर्जुन श्रीनिवास, श्रीहर्षा देवुलापल्ली और विष्णु पद्मनाभन की रिपोर्ट-

सातवें चरण की वोटिंग भी पूरी हो चुकी है और उम्मीदवार नतीजों के इंतजार में हैं। बहुतों के लिए यह बेचैन कर देने वाला इंतजार होगा। जैसे-जैसे भारतीय चुनाव बड़े होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे प्रतिस्पर्धा कड़ी होती जा रही है। इस वर्ष लोकसभा चुनाव में 679 पार्टियां और 8,048 प्रत्याशी प्रतिस्पर्धा में हैं। 15 वर्ष पहले 157 पार्टियां और 3,262 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। जैसे उम्मीदवारों का समूह बढ़ा है, उनकी कुछ विशेषताओं का महत्व भी बढ़ रहा है। पूरे भारत में भावी और सेवारत राजनेता संपन्न हो रहे हैं और उन पर अपराध के मामले भी बढ़ रहे हैं। इस प्रवृत्ति का प्रभाव राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज पर पड़ रहा है। 

नामांकन भरते हुए अपने चुनावी शपथपत्र में प्रत्याशियों द्वारा घोषित संपत्ति के अनुसार, इन चुनावों में प्रत्याशियों की संपत्ति की मेडियन या माध्यिका (कमाई-संपत्ति का बीच का आंकड़ा) 25 लाख रुपये है। एसोशिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और अशोका यूनिवर्सिटी के त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डाटा ने इस पर पड़ताल की है। एक अध्ययन के अनुसार, साल 2012 में एक भारतीय की औसत संपत्ति करीब 85,000 रुपये ही थी।

वास्तव में जो निर्दलीय और छोटी पार्टियों के उम्मीदवार (संख्या 3,441) हैं, उनकी वजह से ही कमाई या संपत्ति की माध्यिका कम नजर आ रही है। ये प्रत्याशी बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के प्रत्याशियों की तुलना में कम अमीर माने जाते हैं।  

उदाहरण के लिए, भारतीय जनता पार्टी के 436 प्रत्याशियों की माध्यिका 3.5 करोड़ रुपये है और कांग्रेस के 421 प्रत्याशियों की माध्यिका 404 करोड़ रुपये है। वास्तव में ये जो कमाई या संपत्ति के आंकड़े हैं, वह कम हैं, क्योंकि ये आंकड़े केवल घोषित कमाई देखकर ही निकाले गए हैं। इन आंकड़ों से प्रत्याशियों की वास्तविक समग्र कमाई का पता नहीं चलता। 

हालांकि सबसे अमीर प्रत्याशी निर्दलीय है। रमेश कुमार पाटलीपुत्र, बिहार से चुनाव लड़ रहे हैं, उन्होंने नवी मुंबई में 1,100 करोड़ रुपये की कृषि भूमि होने की घोषणा की है।  चुनाव क्षेत्र स्तर पर देखें, तो सबसे समृद्ध प्रत्याशी पूर्वोत्तर और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों से चुनाव लड़ रहे हैं। दक्षिण भारत के चुनाव क्षेत्रों को देखें, तो आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कुछ क्षेत्रों को छोड़ दें, तो बाकी प्रत्याशियों की संपत्ति तुलनात्मक रूप से कम है। 

वर्ष 2004 के बाद प्रत्याशियों की संपत्ति में तीन गुना वृद्धि हुई है। विस्तार में जाएं, तो जो प्रत्याशी बार-बार लड़ते हैं और जीतते हैं, वे अच्छे-खासे अमीर हैं। उदाहरण के लिए, पिछली बार चुनाव जीतने वाले सबसे अमीर उम्मीदवार इस बार फिर चुनाव लड़ रहे हैं। फिर से चुनाव लड़ रहे सांसदों की संपत्ति की माध्यिका 4.37 करोड़ रुपये है। उनकी कमाई पिछले पांच वर्षों में अच्छी-खासी बढ़ी है। जब पिछली बार वर्ष 2014 में वे चुने गए थे, तब उनकी संपत्ति की माध्यिका 3.34 करोड़ रुपये थी। ये आंकड़े गवाह हैं कि पैसा और चुनावी सफलता के बीच रिश्ता मजबूत होता जा रहा है। 

राजनीतिक विज्ञानी देवेश कपूर और मिलन वैष्णव के अनुसार, जो 21,000 प्रत्याशी पिछले तीन आम चुनावों में लड़े हैं, उनमें से सबसे अमीर 20 प्रतिशत प्रत्याशियों के चुनाव जीतने की संभावना सबसे निर्धन 20 प्रतिशत प्रत्याशियों की तुलना में 20 गुना ज्यादा थी। 
धन आज भारतीय राजनीति का केंद्र हो गया है, क्योंकि प्रत्याशियों को अपना चुनाव अभियान चलाना पड़ता है। जैसे-जैसे प्रतिस्पद्र्धा कड़ी होती जा रही है, जैसे-जैसे चुनाव क्षेत्र में भीड़ बढ़ रही है, वैसे-वैसे चुनाव में पैसे की जरूरत भी बढ़ती जा रही है।  

राजनीतिक विज्ञानी नीलांजन सरकार के अनुसार, इससे भारतीय लोकतंत्र को नुकसान पहुंच रहा है। अमीर प्रत्याशी अपने क्षेत्र के कमतर जन-प्रतिनिधि साबित होते हैं और क्षेत्र के लोगों की चिंता भी कम करते हैं। ज्यादा चिंता की बात है, यदि प्रत्याशी चुनाव अभियान को आर्थिक निवेश के रूप में देखेंगे, तो इससे उनके सत्ता में आने पर भ्रष्टाचार के मामले बढ़ सकते हैं। जाहिर है, चुनाव जीतने के बाद वे अपने निवेश को वापस पाना चाहेंगे।

चुनावी क्षेत्रों से आने वाले डाटा के अभाव में वास्तविक गणना करना मुश्किल है। किसी नेता के पूरे राजनीतिक प्रदर्शन पर संपत्ति का प्रभाव जानना आसान नहीं, लेकिन संसद के आंकड़ों के जरिये हम सांसद की संपत्ति और उसकी संसद में भागीदारी की तुलना अवश्य कर सकते हैं। हालांकि इस तुलना से कोई खास प्रवृत्ति या ट्रेंड का पता नहीं चलता। अमीर और गरीब सांसदों की संसदीय भागीदारी में कोई विशेष अंतर नहीं लगता है।

जैसे-जैसे पैसे का महत्व बढ़ रहा है, अपराध भी बढ़ रहा है। इन चुनावों में 14 प्रतिशत प्रत्याशियों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। वर्ष 2004 के चुनाव में 8 प्रतिशत प्रत्याशियों के खिलाफ ही गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे। जिन पार्टियों ने कम से कम 20 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, उनमें राष्ट्रीय जनता दल में गंभीर आपराधिक मामले वाले प्रत्याशियों का प्रतिशत सबसे ज्यादा है। लालू प्रसाद यादव द्वारा गठित पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के प्रत्याशियों में 57 प्रतिशत के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

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राष्ट्रीय पार्टियां ऐसे दागदार उम्मीदवारों को कम खड़ा करती हैं, लेकिन तब भी भारतीय जनता पार्टी ने 28.44 प्रतिशत और कांग्रेस ने 25.41 प्रतिशत ऐसे उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। इनमें से अधिकतर आपराधिक पृष्ठभूमि के प्रत्याशी उत्तर प्रदेश और बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में सात में से पांच प्रत्याशी गंभीर आपराधिक आरोपों को झेल रहे हैं। 

भारतीय लोकतंत्र  में अपराध भी चुनावी सफलता से बड़ी मजबूती के साथ जुड़ा हुआ है। पिछले चुनावों में लगभग पांच विजयी प्रत्याशियों में से एक के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामला विचाराधीन था। ऐसे प्रत्याशियों का अनुपात पिछले तीन चुनावों में काफी बढ़ा है। 

राजनीतिक विज्ञानी मिलन वैष्णव अपनी किताब वेन क्राइम पेज : मनी ऐंड मसल इन इंडियन पॉलिटिक्स  में तर्क देते हैं, राजनीतिक पार्टियां आपराधिक उम्मीदवार इसलिए चुनती हैं, क्योंकि वे धनवान होते हैं और लोग ऐसे उम्मीदवारों को यह सोचकर वोट देते हैं कि ऐसे उम्मीदवार उनके काम करवाएंगे। अपराधी इसलिए राजनीति में आते हैं, क्योंकि वे यहां अपनी सुरक्षा की गुंजाइश देखते हैं और इसके साथ ही, धन कमाई की संभावना भी देखते हैं। इन चुनावों के आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं। विगत पांच वर्ष में ज्यादा कमाई करने वाले सांसदों में जो फिर से चुनाव लड़ रहे हैं, उनके खिलाफ किसी न किसी प्रकार के गंभीर आपराधिक मामले हैं।

राजनीति में अपराधियों की बढ़ती भागीदारी तो चिंता का विषय है ही, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसे सांसद स्थानीय विकास को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। इनका ध्यान स्थानीय लोगों के विकास पर ज्यादा नहीं रहता है। वर्ष 2017 में निशिथ प्रकाश और अन्य ने एक अध्ययन करके बताया था, गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि के आरोपी को चुनने से चुनाव क्षेत्र में आर्थिक विकास में काफी कमी आती है, और इसके परिणाम हम बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की गरीबी में देख सकते हैं।राजनीतिक विज्ञानी कहते हैं, इन समस्याओं को दूर करने के लिए बहुकोणीय दृष्टिकोण के साथ काम करना होगा। चुनावी वित्त सुधार और राज्य की क्षमता में सुधार करना पड़ेगा, लेकिन तब तक भारतीय राजनीति में धन और अपराध की दुरभिसंधि फलती-फूलती रहेगी। 

पैसे का बोलबाला 
जो राजनीति में चुनाव लड़ने के लिए धन का निवेश करेगा, वह जीतने के बाद धन की वसूली भी करेगा। जैसे-जैसे सांसद अमीर होता जाएगा, जन-प्रतिनिधि के रूप में उसकी जनता से दूरी भी बढ़ती जाएगी। 

कानून से खिलवाड़ 
चुनाव जीतकर अपराधी या दागी उम्मीदवार सबसे पहले अपने आप को सुरक्षित करने के लिए मेहनत करेगा। इसके अलावा आंकड़े गवाह हैं, वह भ्रष्टाचार करके धन कमाने में भी पीछे नहीं रहेगा। 

नतीजा पिछड़ापन
ध्यान देने की बात है कि आपराधिक पृष्ठभूमि या गंभीर अपराध में आरोपी सर्वाधिक सांसद उत्तर प्रदेश और बिहार में ही चुने जाते हैं, इससे क्षेत्रीय आर्थिक विकास धीमा होता है। क्षेत्र और राज्य में गरीबी बढ़ती है। 

क्या है समाधान?
पैसे और अपराध की गलत बढ़त पर चौतरफा प्रहार करना होगा। कानून कड़े करने के साथ ही समाज में जागरूकता के लिए प्रयास बढ़ाने होंगे। अपराधी उम्मीदवारों के प्रति समाज की दृष्टि बदलनी चाहिए। जरूरी है कि ऐसे दागियों से हम कोई उम्मीद न रखें। उन्हें आगे न बढ़ाएं।

(MINT से साभार)

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  • Web Title:Lok Sabha Elections 2019: Increasing Threat of Money and Crime in Indian Politics