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लोकसभा चुनाव 2019: कोसी और मिथिलांचल में सामाजिक समीकरण साधना बड़ी चुनौती

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सुपौल, मधेपुरा, अररिया, खगड़िया और झंझारपुर, बिहार की ये पांच लोकसभा सीटें हैं जिन पर तीसरे चरण में वोट डाले जाने हैं। मिथिला और कोसी अंचल की इन सीटों पर जीत-हार के बड़े मायने हैं।

चार वर्तमान सांसद महबूब अली कैसर, पप्पू यादव, रंजीत रंजन और सरफराज आलम के साथ ही तीन पूर्व सांसद शरद यादव, देवेन्द्र प्रसाद यादव और दिनेश चन्द्र यादव की किस्मत इस चरण में दांव पर रहेगी। कुल मिलाकर दिग्गजों के बीच की जंग काफी दिलचस्प होने वाली है। पेश है-दीपक कुमार, सरोज कुमार, अमिताभ, ब्रज मोहन मिश्र और फुलेन्द्र मल्लिक की रिपोर्ट 

खगड़िया: बीस उम्मीदवार मैदान में पर लड़ाई दो ध्रुवीय 
खगड़िया लोकसभा क्षेत्र के दंगल की तस्वीर साफ हो चुकी है। यूं तो यहां 20 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं लेकिन मुख्य मुकाबला निवर्तमान सांसद सह एनडीए के लोजपा प्रत्याशी चौधरी महबूब अली कैसर और महागठबंधन के वीआईपी उम्मीदवार मुकेश सहनी के बीच है। यहां सबकी नजर ‘माय’ समीकरण पर है। यादव और मुस्लिम वोटों की गोलबंदी व  बिखराव अर्थात टूट इस बार का चुनाव परिणाम तय करेगा। यदि माय समीकरण की गोलबंदी हुई तो महागठबंधन को बढ़त और यदि बिखराव हुआ तो एनडीए के हाथ बाजी। 

खगड़िया लोकसभा क्षेत्र में सबसे अधिक यादव मतदाता हैं। यहां इनकी संख्या 3.5 लाख है। जबकि मुसलमान वोटर भी डेढ़ लाख हैं। अन्य जातियों में निषाद डेढ़ लाख, कुर्मी व कुशवाहा ढाई लाख, सवर्ण डेढ़ लाख, एससी/एसटी डेढ़ लाख, पासवान डेढ़ लाख व अन्य जाति करीब तीन लाख हैं। इस बार यहां के चुनाव की खास बात यह है कि यादव बहुल इस लोकसभा क्षेत्र में पहली बार प्रमुख प्रत्याशी के रूप में कोई यादव प्रत्याशी चुनाव मैदान में नहीं है। इस कारण एनडीए और महागठबंधन दोनों यादव मतदाताओं को रिझाने में लगे हैं। 

खगड़िया में जातीय समीकरण को देखें तो यहां करीब पांच लाख यादव और मुस्लिम मतदाता हैं। इनकी गोलबंदी जिनके पक्ष में होगी, उनकी जीत लगभग तय है। इन दोनों मतदाताओं को महागठबंधन अपना आधार वोट मानता है। लेकिन एनडीए राज्य सरकार के कार्यों का हवाला देकर उस वोट बैंक में सेंध लगाने की भरपूर कोशिश में है। हालांकि यादव मतदाताओं ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। फिलहाल एनडीए और महागठबंधन दोनों के लिए खगड़िया प्रतिष्ठा की सीट बन चुकी है। 

मधेपुरा: पचपनिया मतदाताओं के रुख पर निगाहें
मधेपुरा लोकसभा सीट का परिणाम यादव वोटों के विभाजन और पचपनिया मतदाताओं के रुख पर टिका है। पिछड़ों व अतिपिछड़ों की पांच जातियों का समूह पचपनिया कहलाता है। महागठबंधन उम्मीदवार शरद यादव, एनडीए उम्मीदवार दिनेश चंद्र यादव और जन अधिकार पार्टी के उम्मीदवार राजेश रंजन ऊर्फ पप्पू यादव- तीनों यादव जाति के हैं। जाप और एनडीए के प्रत्याशी यादव वोट को साथ जोड़ने की कोशिश में लगे हैं। ऐसे में महागठबंधन के लिए अपने आधार वोट को सुरक्षित बनाए रखना बड़ी चुनौती दिख रही है। 

मधेपुरा लोकसभा क्षेत्र में करीब 35 फीसदी यादव और मुस्लिम, 23 फीसदी वैश्य और पचपनिया हैं। यहां करीब 18 फीसदी ब्राह्मण और राजपूत वोटर हैं। इसके अलावा करीब 22 फीसदी दलित, मुसहर, कुर्मी- कोयरी, धानुक वोटर भी हैं। इसबार जदयू और भाजपा मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं।  वहीं महागठबंधन भी यादव वोटों को अपनी ओर करने में लगा है। पर कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी महागठबंधन के लिए बड़ी चुनौती बनती दिख रही है। दोनों गठबंधनों के बीच जन अधिकार पार्टी से प्रत्याशी पप्पू यादव चुनाव को त्रिकोणीय बनाने में लगे हैं। वे अपनी जाति के वोट को अपने साथ जोड़ने में लगे हैं। विकास की बात बड़े नेताओं की सभाओं को छोड़ गौण हैं। ऐसे में तीनों प्रत्याशियों को यादव वोटों से आस है।

सुपौल: जातीय गुणा-भाग पर टिकी हैं उम्मीदें 
सुपौल लोकसभा सीट पर महागठबंधन और एनडीए में सीधी टक्कर मानी जा रही है। तमाम चुनाव प्रचार के बाद अब दोनों गठबंधन के प्रत्याशियों की उम्मीदें जातीय समीकरण पर टिक गई हैं।  यहां दोनों प्रत्याशी जातीय समीकरण में फिट बैठते हैं। ऐसे में जिनका समीकरण अधिक सही बैठा, उनकी जीत तय है। 

यहां इस बार एनडीए ने जदयू के दिलेश्वर कामत को टिकट दिया है। दिलेश्वर अतिपिछड़ा वर्ग की केवट जाति से आते हैं। उधर, महागठबंधन ने निवर्तमान सांसद कांग्रेस की रंजीत रंजन को अपना प्रत्याशी बनाया है। रंजीत रंजन यादव जाति से आती हैं। सुपौल में यादव और मुस्लिम वोटरों की संख्या न सिर्फ कुल वोटरों की संख्या का लगभग आधा है बल्कि दोनों की एकजुटता नतीजों को प्रभावित करने का मादा भी रखती है। इसके अलावा अतिपिछड़ा वोटरों की संख्या भी काफी है। यादव और मुसलमान के बाद सबसे अधिक अतिपिछड़ा वोटर ही है। इनका वोटिंग प्रतिशत भी चुनावी नतीजों को उलट-पलट सकता है। महागठबंधन की प्रत्याशी रंजीत रंजन का दारोमदार एमवाई (मुस्लिम/यादव) वोटरों के समर्थन पर टिका है, पर भाजपा-जदयू के साथ होने से उनकी परेशानी बढ़ गई है। परेशानी का एक कारण राजद का उनके प्रति उत्साह में न होना भी है। दूसरी तरफ एनडीए को बीजेपी के कैडर वोटरों के अलावा अतिपिछड़ों के वोट से उम्मीद है। हालांकि दोनों गठबंधनों के प्रत्याशी अब भी एक-दूसरे के कैडर वोटरों को तोड़ने की कोशिश में है। 

अररिया : यादव मतदाता और ध्रुवीकरण पर नजर
अररिया लोकसभा सीट का परिणाम यादव वोटों के विभाजन और ध्रुवीकरण पर टिका हुआ है। महागठबंधन उम्मीदवार सरफराज आलम और एनडीए उम्मीदवार प्रदीप कुमार सिंह दोनों के लिए यादव वोट बहुत अहम हैं। दोनों प्रत्याशियों ने यादव वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है।

यहां करीब 44 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं। 56 फीसदी हिंदू में 15 फीसदी यादव हैं। जबकि पिछड़ा, अतिपिछड़ा और महादलित सब मिलाकर 28 फीसदी वोटर हैं। इसमें सबसे अधिक अतिपिछड़ा हैं। जाहिर है यह तबका यहां के चुनाव में बड़ा असर डालेगा। भाजपा के प्रदीप कुमार सिंह भी अतिपिछड़ा वर्ग गंगई से आते हैं। लगातार दो बार हारने के बावजूद उन्हें भाजपा से टिकट मिलने का यह बड़ा कारण है। 

वहीं 13 प्रतिशत सवर्ण वोटर हैं। महागठबंधन जहां ‘माय’ समीकरण को साधने में लगा है, वहीं एनडीए उसमें सेंधमारी करने में। यादव वोटरों में सेंधमारी के लिए एनडीए सभी हथकंडे अपना रहा है। यादव वोटरों के गढ़ नरपतगंज में एनडीए के नेता लगातार कैंप कर रहे हैं। वहीं फारबिसगंज में नरेंद्र मोदी भी सभा कर चुके हैं। दोनों ही प्रत्याशियों का मानना है कि इस बार पलड़ा उनकी ओर झुका हुआ है। दूसरी ओर, महागठबंधन यादव वोटों को बिखरने से रोकने के अलावा महादलित वोटरों को साधने की जुगत में है। अगर ऐसा हो जाता है तो 

महागठबंधन दूसरों के लिए बेहद कठिन चुनौती साबित हो सकता है। महादलित बाहुल्य क्षेत्रों में पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की कई सभाएं हो चुकी हैं। दूसरी ओर अपने समीकरण बैठाने में लगा एनडीए महागठबंधन की इस प्रयास को नाकाम करने की लगातार कोशिश कर रहा है। लेकिन अंतिम फैसला यादव वोटरों का रुख ही तय करेगा, इस बात की जानकारी दोनों गठबंधनों को है। 

झंझारपुर : फिर त्रिकोणीय संघर्ष में उलझी लड़ाई 
झंझारपुर लोकसभा सीट लंबे समय तक किसी एक पार्टी के खाते में नहीं रही है। पिछले चुनाव में भाजपा ने यहां से बाजी मारी थी। इस बार एनडीए में यह सीट भाजपा की जगह जदयू के खाते में गई है। जदयू ने रामप्रीत मंडल को मैदान में उतारा है। महागठबंधन के उम्मीदवार झंझारपुर के राजद विधायक गुलाब यादव हैं। पांच बार इस क्षेत्र से प्रतिनिधित्व कर चुके पूर्व मंत्री देवेंद्र प्रसाद यादव लड़ाई को त्रिकोणीय बनाने में जुटे हैं। इसबार निर्दलीय उतरे यादव पिछले चुनाव में जदयू के उम्मीदवार थे। 

एनडीए और महागबंधन को यहां अपने-अपने समीकरण का भरोसा है। वहीं देवेंद्र यादव को  उम्मीद है कि लोग समीकरण से ऊपर उठकर वोट करेंगे । उन्हें सीपीआई का भी समर्थन है। इस सीट पर  18.25 लाख वोटरों में यादव वोटरों की संख्या करीब 2.80 लाख है। वहीं मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग ढाई लाख है।  
राजद को माई के अलावा नए समीकरण में कुशवाहा, सहनी और दलितों के एक वर्ग के वोट की उम्मीद है। इनकी संख्या लगभग दो लाख है। वहीं,एनडीए अपने समीकरण को जोड़ रहा है। यादव को छोड़कर पिछड़ा और अतिपिछड़ा वर्ग के वोटरों की संख्या करीब 3.5 लाख है। सवर्ण वोटरों की संख्या लगभग 2.5 लाख है।

वैश्य की 1.25 लाख और दलितों की संख्या 4 लाख से अधिक है। अतिपिछड़ा और दलित वोट पर सबकी नजर है। यही कारण है कि यहां आने वाले सभी स्टार प्रचारकों के भाषण के केन्द्र में आरक्षण का मुद्दा रहता है। पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग के प्रभाव का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मंडल आयोग की सिफारिश लागू होने के बाद से अब तक इस सीट का प्रतिनिधित्व इसी वर्ग के उम्मीदवार करते आ रहे हैं। 

झंझारपुर का इतिहास रहा है कि चुनावी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने वाले उम्मीदवार ने किस समीकरण से कितना वोट लिया इसी पर जीत और हार तय होती है। 2014 में भी त्रिकोणीय संघर्ष में बीजेपी के उम्मीदवार वीरेंद्र कुमार चौधरी ने जीत दर्ज की थी।  2014 में जदयू, बीजेपी और राजद अलग-अलग लड़ाई में थे। 
 

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  • Web Title:Lok Sabha Elections 2019: big Challenging of Social Equation in Kosi and Mithilanchal area