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Lok sabha election Result 2019- आरा का किसे मिलेगा ताज, फैसला होगा आज

आखिरकार वह घड़ी आ ही गयी, जिसका भोजपुर वासियों को बेसब्री से इंतजार है। आज गुरुवार को यह फैसला हो जायेगा कि इस बार आरा का ताज किसे मिलेगा। भाजपा प्रत्याशी आरके सिंह दुबारा संसद पहुंचेंगे या फिर भाकपा माले प्रत्याशी राजू यादव को पहली बार मौका मिलेगा। वैसे तो आरा के चुनावी अखाड़े में कुल 11 प्रत्याशी हैं, लेकिन कांटे के मुकाबले में फंसे इन दोनों प्रत्याशियों समेत इनके समर्थकों की धुकधुकी बढ़ी हुई है। बुधवार की पूरी रात इनकी आंखों में ही कटी। 

मालूम हो कि यहां आखिरी चरण में बीते रविवार को मतदान हुआ था। कुल 10 लाख 72 हजार 530 वोट मिले हैं। जानकारों के अनुसार नोटा समेत शेष नौ प्रत्याशियों के हिस्से में करीब 72 हजार वोट जाने को आधार बनाया जाये तो ऐसे में पांच लाख से अधिक वोट पाकर ही इस बार आरा का सांसद बनने की संभावना है। वैसे यह पहला मौका होगा, जब यहां के निर्वाचित सांसद को इतनी बड़ी संख्या में वोट मिलेंगे। 2014 के पिछले चुनाव में 3 लाख 91 हजार 74 वोट मिले थे। पिछली बार भी सर्वाधिक वोट पाने का रिकार्ड आरके सिंह के नाम बना था। इसके पूर्व 2009 के चुनाव पर नजर डालें तो निर्वाचित सांसद जदयू नेत्री मीना सिंह को महज 2 लाख 12 हजार 726 वोट मिले थे। 

मतगणना की तैयारी व रणनीति पर होती रही चर्चा 
बुधवार को जहां एक ओर मतगणना की तैयारी में जिला प्रशासन जुटा रहा, वहीं दूसरी ओर दोनों खेमों में भी इसकी तैयारी होती रही। वरिष्ठ नेता व कार्यकर्ता इसकी रणनीति में मशगूल रहे। मतगणना हॉल में जाने वाले कार्यकर्ताओं को भी निर्देश दिये जाते रहे। भाजपा प्रत्याशी आरके सिंह के प्रधान चुनाव कार्यालय में मतगणना को ले चर्चा देखी गयी। इस दौरान कई युवा कार्यकर्ता आपस में मशगूल दिखे। वहीं भाकपा माले के जिला कार्यालय में भी रौनक रही। वरिष्ठ नेता व कार्यकर्ता मतगणना को ले रणनीति बनाते रहे। 

आखिरी चरण में शाहाबाद की सभी चार सीटों पर मतदान के ठीक बाद आये विभिन्न एग्जिट पोल एनडीए को भले ही सुकून देने वाले हैं पर दोनों खेमों के उम्मीदवारों व समर्थकों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं। पिछले लोस चुनाव में चारों सीटों पर एनडीए ने मोदी लहर में एकतरफा जीत दर्ज की थी। लेकिन इस बार महागठबंधन से कांटे की टक्कर है।

नए परिसीमन के बाद के पिछले दोनों चुनावों पर नजर डालें तो 2009 में शाहाबाद इलाके के आरा व काराकाट में एनडीए ने जीत हासिल की, जबकि बक्सर व सासाराम में क्रमश : राजद व कांग्रेस (मौजूदा महागठबंधन में शामिल) ने जीत दर्ज की। 

वहीं 2014 में आरा, बक्सर व सासाराम में भाजपा और काराकाट में रालोसपा (उस समय एनडीए की सहयोगी) ने आसान जीत दर्ज की। शेरशाह कॉलेज के प्राध्यापक सुभाषचंद्र सिंह यादव कहते हैं कि कुछ मौकों को छोड़ चुनाव में जातीय फैक्टर हावी रहे हैं। आरा के जैन कॉलेज के रिटायर प्राध्यापक प्रो बलिराज ठाकुर बताते हैं कि भोजपुरी भाषी इस इलाके में पूर्व में नेताओं का व्यक्तित्व भी वोटरों के लिए खासा अहमियत रखता था पर अब वैसी बात नहीं रही। 

देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम (1857 की क्रांति) के अमर योद्धा बाबू वीर कुंवर सिंह की ऐतिहासिक धरती राजनीतिक रूप से काफी उर्वर रही है। देश के पहले दलित डिप्टी पीएम जगजीवन बाबू व पहली महिला लोकसभा स्पीकर के रूप में उनकी बिटिया मीरा कुमार और लोस में पहले प्रतिपक्ष के  नेता रामसुभग सिंह इसी माटी की उपज रहे हैं तो यहां के पहले सांसद बलिराम भगत लोस स्पीकर भी बने। 1952 के पहले आम चुनाव से ले 1971 तक पांच चुनावों में यहां कांग्रेस का कब्जा रहा तो भगत ही लगातार सांसद चुने जाते रहे। 1977  में कांग्रेस का खूंटा यहां से पहली बार उखड़ा। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर में कांग्रेस यहां आखिरी बार जीती। 1989 में वीपी सिंह की लहर के बावजूद बहुकोणीय मुकाबले में पहली बार आईपीएफ (भाकपा माले) ने यहां जीत दर्ज की। इसके बाद से 2009 तक जनता दल या इसमें टूट के बाद बने राजनीतिक दलों राजद, समता पार्टी या जदयू ने ही बारी-बारी से परचम लहराया। आजादी के बाद 2014 के चुनाव में पहली बार यहां कमल खिला। 

अस्सी से बदल रहे हैं सांसद
यह अजीब संयोग है कि 1980 तक यहां केवल दो सांसद चुने गये और अस्सी के बाद से हर बार सांसद बदलते रहे हैं। 1952 से 1971 तक कांग्रेस के बलिराम भगत लगातार पांच बार व 1977 व 80 में क्रमश: भारतीय लोक दल व जनता पार्टी सोशलिस्ट से चंद्रदेव वर्मा लगातार दो बार चुनाव जीते। इसके बाद से ही यहां कोई भी सांसद लगातार दो बार चुनाव जीतने में सफल नहीं रहा है। यहां तक कि 1996 से 99 तक तीन सालों में तीन चुनाव हुए और तीनों ही बार सांसद बदल गये। बदलाव यह मिथक कब टूटता है, इसका इंतजार है।

1989  में आईपीएफ की जीत
जातीय समीकरण यहां हमेशा से हावी रहे हैं। विभिन्न जातियों में रस्साकशी देखने को मिलती रही है। पहले आमचुनाव से ले 2004 के चुनाव तक केवल एक बार छोड़ यहां या तो यदुवंशी का कब्जा रहा या फिर कुशवंशी का। सिर्फ 1989 के बहुकोणीय मुकाबले में यहां अतिपिछड़ा वर्ग से आईपीएफ उम्मीदवार रामनरेश प्रसाद की जीत हुई थी। नये परिसीमन के बाद हुए पिछले दोनों चुनावों में यहां रघुवंशी समाज के प्रतिनिधि की जीत हुई है। हालांकि पहले भी जीत-हार में अन्य जातियां भूमिका निभाती रही थीं।

सात विस को समेटे हुए है आरा
2008 में नये परिसीमन के बाद से आरा संसदीय क्षेत्र भोजपुर जिले के सभी सात विधानसभा क्षेत्रों को समेटे हुए है। इनमें इकलौते अगिआंव विस सुरक्षित क्षेत्र पर एनडीए की ओर से जदयू का कब्जा है, जबकि शेष छह विस क्षेत्रों पर महागठबंधन काबिज है। इनमें तरारी विस क्षेत्र माले तो आरा, बड़हरा, संदेश, जगदीशपुर व शाहपुर विस क्षेत्र राजद के कब्जे में हैं। हालांकि पिछला विस चुनाव भाजपा जदयू से अलग होकर लड़ी थी और उसे किसी क्षेत्र में सफलता नहीं मिली थी। 

वर्तमान सांसद : आरके सिंह
मोदी सरकार में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी मिली

आरा संसदीय क्षेत्र में 2014 के  चुनाव में मोदी लहर पर सवार होकर आरके सिंह ने पहली बार कमल खिलाने में कामयाबी हासिल की। मोदी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार में उन्हें बिजली व ऊर्जा नवीकरण मंत्रालय का राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) की जिम्मेदारी दी गयी। वे मूल रूप से सुपौल के बांसपट्टी गांव के निवासी हैं पर ससुराल व अन्य रिश्तेदारी भोजपुर में होने से यहां से जुड़े रहे हैं।

कौन जीते कौन हारे 
2014

जीते : आरके सिंह, भाजपा,     391074
हारे : श्रीभगवान कुशवाहा, राजद,    255204

2009
जीते : मीना सिंह, जदयू,     212726
हारे : रामाकिशोर सिंह, एलजेपी,    138006

2004 
जीते : कांति सिंह, राजद,    299422
हारे:रामनरेश राम,भाकपा माले,149679

1999
जीते : राम प्रसाद सिंह, राजद,     264140
हारे : एचपी सिंह, जदयू,    171858 

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