DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:
asianpaints

Loksabha Election 2019: संत कबीर की नगरी में जातीय गोलबंदी पर जोर

शाम ढलने को है। मगहर में संत कबीर की समाधि पर सन्नाटा पसरा है। गिने-चुने कुछ लोग तो है लेकिन माहौल बिल्कुल शांत है। हालांकि बाहर का नजारा इसका उलटा है। चुनावी चर्चाओं से भरपूर। कबीर ने कहा था कि ‘जाति न पूछो साधु की...’ लेकिन यहां चुनावी महासमर की सारी गोटियां इसी के ईद-गिर्द सिमटी सी जा रही है। जीत का सारा जोड़-घटाना जातीय गोलबंदी पर ही केंद्रित है। मुद्दे इसके आगे गायब से हो गये हैं। दो पूर्व सांसदों और एक मौजूदा सांसद की लड़ाई इस संसदीय सीट को दिलचस्प बना रही है। यहां बसपा के भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी, भाजपा से प्रवीण निषाद और कांग्रेस के भालचंद्र यादव मैदान में हैं। प्रवीण  निषाद गोरखपुर से सांसद हैं तो भाल चंद्र यादव और कुशल तिवारी यहां से सांसद रह चुके हैं। पहले  ये सीट खलीलाबाद कहलाती थी लेकिन जिला बनने के बाद 2008 में परिसीमन के चलते यह संत कबीर नगर लोकसभा सीट बन गई।

संतकबीर नगर का महत्व इससे बढ़ जाता है कि यहां पिछले वर्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आये थे। मगहर के बहाने उन्होंने पूरे पूर्वांचल को साधने की कोशिश की थी।  अभी वह संत कबीर नगर से सटे बस्ती में रैली करके गये हैं। उनकी रैली से वापस आये राकेश कहते हैं कि देखना होगा कि प्रवीण निषाद वोटरों को लुभा पाते हैं या नहीं। उन पर बाहरी का ठप्पा लगा है। इसलिए लोगों को उनसे ज्यादा उम्मीद नहीं है। वह (निर्बल इण्डियन शोषित हमारा आम दल) निषाद पार्टी  के अध्यक्ष संजय निषाद के बेटे हैं। गोरखपुर संसदीय सीट पर हुए उपचुनाव में प्रवीण निषाद जीते थे। वह सपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे। इस बार वह भाजपा के सिम्बल पर चुनाव लड़ रहे हैं।


जूता कांड की भी है चर्चा:

यहां के मौजूदा सांसद शरद त्रिपाठी की चर्चा चुनावी माहौल को चटपटा बना रही है। मिठाई की दुकान चलाने वाले सियाराम कहते हैं कि ‘उनकी चर्चा यहां एक ऐसे सांसद के रूप में है, जो मनबढ़ था।’ शरद त्रिपाठी ने अपनी ही पार्टी के एक विधायक पर एक बैठक में जूते से पिटाई करने का वीडियो खूब वायरल हुआ। तभी से माना जा रहा था कि पार्टी इस अनुशासन हीनता पर टिकट तक काट सकती है और उनका टिकट कट भी गया।    

तितौवा चौराहे पर इस जूता कांड का विश्लेषण चल रहा है। बुजुर्ग अवधेश चौधरी कहते हैं -इसे सांसद और विधायक की लड़ाई मत समझिये। ये तो हमारे पूर्वांचल में दशकों से चली आ रही ठाकुर-ब्राह्मणों की लड़ाई है। 2014 में शरद त्रिपाठी जीते लेकिन उनकी अपनी पहचान क्या थी? उन्हें हम लोग  रमापति राम त्रिपाठी के बेटे के रूप में ही जानते हैं। अरे त्रिपाठी यहां भाजपा के बड़े नेता हैं और जूता जिन पर उठाया गया वह हैं मेंहदावल विधानसभा के विधायक राकेश सिंह बघेल। वह हैं ठाकुर। इनके पिता भी भाजपा के दिग्गज नेताओं के करीबी माने जाते हैं। यहां बघेल का भी एक ऑडियो चर्चा में है जिसमें वो इशारों में ‘विटामिन बी’ कह कर मजाक उड़ा रहे हैं। माना जा रहा है कि यह जूता कांड उसी का नतीजा है।
दूसरी तरफ यहां ब्राह्मण चेहरा होने के चलते लोग उनका पक्ष भी लेते दिखते हैं। हालांकि शरद त्रिपाठी का टिकट काटने में भाजपा को बहुत मंथन करना पड़ा। यहां चर्चा है कि उनका टिकट काटने से पहले भाजपा को अपने बेस वोट बैंक की चिंता थी। इस बात की पूरी कवायद थी कि टिकट कटा तो ब्राह्मण नाराज और न कटे तो ठाकुर।  इसका तोड़ पार्टी ने निकाला कि उनके पिता रमापति राम त्रिपाठी को देवरिया से टिकट दे दिया।  इससे उसने दोनों बेस वोटर की नाराजगी से बचने की कोशिश की। शरद पहली बार 2009 में लोकसभा का चुनाव लड़े लेकिन हार गये थे। 2014 में मोदी लहर में संसद पहुंच गये।

पूर्व सांसद को मिला काग्रेेस का साथ

चर्चा सिर्फ शरद त्रिपाठी की ही नहीं बल्कि पूर्व सांसद भालचंद्र यादव के साथ हुए अन्याय की भी है। भालचंद्र इस बार कांग्रेस से मैदान में है। कांग्रेस ने यहां से पहले घोषित अपने प्रत्याशी को बदलकर समाजवादी पार्टी से सांसद रह चुके भालचंद्र यादव को मैदान में उतारा है। भालचंद्र यहां से दो बार सांसद रह चुके हैं। बस्ती और संत कबीर नगर जिलों में सपा के जिलाध्यक्ष भी रह चुके हैं और यहां उनकी छवि जमीनी नेता की है। यहां के राधेश्याम कहते हैं कि एक बार तो वह फफक पड़े कार्यकर्ताओं के बीच। सपा ने यह अच्छा नहीं किया। भालचंद्र यादव को यहां से उतारने से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। मेंहदावल के किरोड़ीलाल कहते हैं कि भालचंद्र पूरे 5 साल इंतजार किए। अब उनको टिकट न मिले तो क्या करें? अरे उनके कार्यकर्ता उनको बोले कि आप चुनाव लड़िये। लिहाजा गठबंधन प्रत्याशी के सामने गठबंधन ही चुनौती बन गया है। यहां सपा के कई कार्यकर्ता भी भालचंद्र यादव के साथ पाला बदल चुके हैं। रमेश यादव कहते हैं -अभी जो सपा में कार्यकर्ता हैं उनमें भी एकता नहीं दिख रही है लिहाजा वोट ट्रांसफर में थोड़ा शक है। लिहाजा भितरघात से इनकार नहीं किया जा सकता। 
 

बाहरी प्रत्‍याशी पर मतभेद
भाजपा के प्रत्याशी प्रवीण निषाद को यहां बाहरी प्रत्याशी माना जा रहा है।  पायनपुर के अजय अहिरवार कहते हैं -उनका यहां हवा-पानी नहीं है। उनसे तो गोरखपुर में ही निषाद नाराज हैं। कह रहा है कि पार्टी बेच दिये भाजपा को। अच्छा प्रत्याशी लाती भाजपा तो यहां फायदा होता।  मेहदावल के सुधीर कहते हैं -भाजपा में यहां आपसी गुटबाजी निषाद पर भारी पड़ेगी। भाजपा का यहां एक कार्यकर्ता सम्मेलन होना था। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्र चन्द्र पाण्डेय को आना था लेकिन उससे पहले ही कुर्सियां चल गईं। वो आए नहीं। ऐसे में प्रवीण निषाद के साथ कितने लोग होंगे, ये देखना होगा। भाजपा का कोर वोटर उससे नाराज है। हां, यहां की पांचों विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है।  यह भाजपा प्रत्याशी के लिए मजबूती देने वाला है लेकिन जातीय गोलबंदी में कौन किसको साध पायेगा, यह देखने वाला होगा। एक अनुमान के मुताबिक यहां 2.5 लाख ब्राह्मण, 4.20 लाख एससी वर्ग, 3.75 लाख मुस्लिम हैं। वहीं पिछड़ों के भी निर्णायक मत हैं।
 

ब्राहमण चेहरा मैैदान में उतारा

बहुजन समाज पार्टी ने इसी सीट से अपने सांसद रहे भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी को  यहां से फिर मैदान में उतारा है। वह 2009 में इस सीट से सांसद रह चुके हैं और 2014 में दूसरे नंबर पर रहे। कुशल तिवारी कद्दावर नेता हरिशंकर तिवारी के बेटे हैं लिहाजा ब्राह्मण वोट साधने के लिए उनसे बेहतर कोई प्रत्याशी नहीं हो सकता था। पूर्वांचल में ब्राह्मण वोट साधने के  लिए हरिशंकर तिवारी बड़ा नाम है। वहीं गठबंधन के चलते यादव, मुस्लिम और दलित वोट भी साथ है। सुरेश कहते हैं कि भालचंद्र यादव कुशल तिवारी का कितना वोट काटेंगे? हो सकता है कि पूरा वोट ट्रांसफर न हो पाये लेकिन उनके साथ गठबंधन का कोर वोट बैंक तो होगा ही, ब्राह्मण  वोट भी पड़ेगा क्योंकि ब्राह्मण यहां भाजपा से  नाराज हैं कि उसने ब्राह्मण का टिकट काट कर निषाद को टिकट दिया।

कहीं योजनाओं का लाभ पहुंचा तो कहीं नाराजगी

मंदौर चौराहे पर बैठे हाजी वसीमउल्लाह सरकारी योजनाओं में धांधली का आरोप लगाते हैं। वह कहते हैं कि कई लोगों को मकान मिला, संडास मिला लेकिन हमें नहीं मिला। उनके बगल में बैठे करीम का कहना है कि क्षेत्र का विकास सबसे अहम होता है लेकिन वोट देने के दो दिन पहले ही ऐसा माहौल बना दिया जाता है कि वोट जाति और धर्म पर ही पड़ जाता है।

यहां के युवा रोजगार के लिए बाहर जाने को मजबूर है। यहां की इकलौती चीनी मिल बंद हो चुकी है। किसान रामसुमेर कहते हैं कि यहां का गन्ना बस्ती जाता है। पर्ची यहां कट जाती है।  बरदहिया बाजार पर फेरी लगा रहे श्रवण चुनाव की बात सुनते ही खीझ जाते हैं-क्या चुनाव? खलीलाबाद में क्या है? क्या दिया नेताओं ने हमें? मगहर-मगहर करते हैं लेकिन कताई मिल न सिर्फ बंद हुई बल्कि यहां से हथकरघा उद्योग के नामलेवा न बचे। उनके पास बैठे बुजुर्ग संकटिया लाल इसमें दखल देते हैं कि कहा गया कि यहां उद्योग धंधे होंगे, बच्चों को यहीं रोजगार मिलेगा।  किसानों से सस्ते दर पर जमीनें ली गईं लेकिन सभी बंद होते चले गए।

खलीलाबाद में कपड़ा खूब हुआ करती थी लेकिन राजनीतिक उपेक्षा के चलते खलीलाबाद व मगहर की कताई व छपाई मिलें बंद हो गईं। हथकरघा जैसा कुटीर उद्योग भी  दम तोड़ रहा है। बेलहर के संतराम कहते हैं कि यहां बुनकर खूब हुआ करते थे लेकिन अब देखिये, गिनती के भी न मिलेंगे।  आमी नदी का प्रदूषण भी चुनावी म़ुद्दा नहीं बनता। वहीं घाघरा और राप्ती जब चढ़ती है तो बाढ़ की विभीषिका भी यह क्षेत्र झेलता है।

 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Jateey golbandi in Santkabirnagar Loksabha election