वीआईपी सीट सासाराम: एक-दूसरे के वोट बैंक में सेंधमारी कर रहे गठबंधन प्रत्याशी

सासाराम संसदीय सीट अपनी पहचान को कभी मोहताज नहीं रही है। इसका अतीत समृद्ध रहा है। शेरशाह ने पांच वर्षों के कार्यकाल में विकास कर जहां जनप्रतिनिधियों को राह दिखाने का काम किया था, वहीं सहस्त्राबाहु के...

वीआईपी सीट सासाराम: एक-दूसरे के वोट बैंक में सेंधमारी कर रहे गठबंधन प्रत्याशी

सासाराम संसदीय सीट अपनी पहचान को कभी मोहताज नहीं रही है। इसका अतीत समृद्ध रहा है। शेरशाह ने पांच वर्षों के कार्यकाल में विकास कर जहां जनप्रतिनिधियों को राह दिखाने का काम किया था, वहीं सहस्त्राबाहु के नाम से इसका नामकरण भी हुआ। पहले सहस्त्राराम, बाद में सहसराम और अब सासाराम के नाम से जाना जा रहा है। मां मुंडेश्वरी धाम, हरसुब्रह्म धाम, चंदतन शहीद पीर व गुप्ताधाम ने भी इसे पहचान दी है। अगर राजनीतिक क्षेत्र में इसकी चर्चा करें तो इस सीट से जीतने वाले जगजीवन राम उपप्रधानमंत्री तो उनकी बिटिया मीरा कुमार ने लोकसभा के अध्यक्ष पद तक को सुशोभित किया है। अभी देश की सुरक्षा पर राजनीति गरम है, तो इसी जगजीवन बाबू ने रक्षा मंत्री रहते हुए दुश्मन देश के सैनिकों को सरेंडर भी कराया था। 

इस बार के लोकसभा चुनाव में सासाराम (सु.) सीट से 13 प्रत्याशी अपना भाग्य आजमा रहे हैं। अभी न चुनाव प्रचार जोर पकड़ा है और न स्टार प्रचारकों को दौर शुरू हुआ है। किसान मतदाता भी खामोश हैं। युवा मतदाता बहुत कुछ नहीं कह पा रहे हैं। नए मतदाता वोट देने को लेकर उत्साहित जरूर दिख रहे हैं, लेकिन वह किसे बेहतर मान रहे हैं के मुद्दे पर अपना मुंह नहीं खोल पा रहे हैं। इसलिए यह कहा जा रहा है कि मतदाताओं ने नेताओं को सस्पेंस में डाल रखा है। मामला चाहे जो भी हो, इस सीट पर लड़ाई भाजपा के छेदी पासवान और व कांग्रेस की मीरा कुमार के बीच होने की बात कही जा रही है। लेकिन, बसपा व सीपीआई एमएल वोट बैंक को तोड़ने की जुगत लगे हैं। इसमें वह कितना सफल होंगे अभी कहना जल्दबाजी होगी।

सासाराम लोकसभा सीट: वाराणसी से सटी इस सीट पर प्रत्याशियों में होगी जमकर टक्कर

सासाराम संसदीय क्षेत्र काशी के नजदीक है, जहां से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव लड़ रहे हैं। उनके क्षेत्र में भी कैमूर-रोहतास की करीब 20 हजार आबादी निवास करती है। इनमें से अधिकतर सासाराम लोकसभा क्षेत्र के मतदाता हैं। दोनों जगहों पर 19 मई को मतदान होना है। सासाराम सीट इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है कि इस पर देश के शीर्ष नेताओं की नजर है क्योंकि इस सीट से जीतने वाले नेताओं की पार्टी ही केंद्र में सरकार बनाती है। इसका इतिहास रहा है।

गठबंधन के दल बदले तो समीकरण भी बदल गया
वर्ष 2014 के चुनाव में इस सीट से जदयू ने केपी रमैया को प्रत्याशी बनाया था। इस बार जदयू एनडीए में शामिल है। लेकिन, एनडीए को मदद देने वाली रालोसपा इस बार महागठबंधन के साथ है। इसके साथ राजद, हम, वीआईपी व लोजद भी हैं। इस समीकरण में कौन कितना मजबूत हुआ है अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। 

इस बार मैदान में हैं 13 प्रत्याशी
छेदी पासवान (भाजपा), मीरा कुमार (कांग्रेस), मनोज कुमार (बसपा), अशोक बैठा (सीपीआई एमएल), रघुनी राम शास्त्री (शोषित समाज दल), सत्यनारायण पासवान (भारतीय अपना दल), धर्मराज पासवान (लोक जन विकास मोर्चा), निर्मला देवी (प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया), विद्या ज्योति (बहुजन मुक्ति पार्टी), सत्यनारायण राम (अंबेडक राइट पार्टी ऑफ इंडिया), रजनीकांत चौधरी (जय जनता पार्टी) व अशोक कुमार पासवान, रामएकबाल राम (स्वतंत्र)।

2009 
मीरा कुमार, कांग्रेस 192213
मुनि लाल, भाजपा 149259

2014  
छेदी पासवान, भाजपा 366087
मीरा कुमार, कांग्रेस 302760

वर्ष 1984 तक काबिज रहे बाबूजी
वर्ष 1952 से लेकर वर्ष 1984 तक के चुनाव में जगजीवन बाबू इस सीट पर काबिज रहे। वर्ष 1952 से 1971 तक कांग्रेस के टिकट पर व वर्ष 1977 व 1980 में जनता पार्टी और वर्ष 1984 में वे कांग्रेस (जे) के टिकट पर चुनाव लड़कर जीत दर्ज कराए।

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