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चुनावी मुद्दा: उत्तरी पूर्वांचल की मरती नदियां नहीं बनतीं मुद्दा 

प्रदूषण के चलते पूर्वांचल की नदियां मर रही हैं। किसी नदी का पानी विषैला हो चुका है तो किसी में सिल्ट इस कदर पट गई है कि घुटनों बराबर भी पानी नहीं बचा है। इसी वजह से बरसात में बाढ़ व गर्मी में पानी का संकट बढ़ने लगा है। इन निराशाजनक तस्वीरों के बीच बस्ती में मनवर और कुशीनगर में हिरण्यवती को मूल स्वरूप में लाने के प्रयास उम्मीद तो जगा रहे हैं। लेकिन इसका दायरा बढ़े तो बात बने। 

शहरों से निकलने वाला गंदा पानी और उद्योगों का कचरा नदियों में ही गिरता है। एनजीटी की इस पर सख्त मनाही है। गोरखपुर में मरने के कगार पर पहुंच चुकी आमी नदी को लेकर लोगों ने बड़ा आंदोलन किया। मामला एनजीटी तक पहुंचा तो सरकार ने लिखकर दिया कि उद्योगों व नालियों का गंदा पानी बिना साफ किए नदी में नहीं गिरेगा। 

गीडा में कॉमन ट्रीटमेंट प्लांट, संतकबीरनगर व मगहर में एसटीपी लगाने को लेकर टेंडर हुए मगर बजट न मिलने से काम शुरू तक नहीं हो सके। गोरखपुर शहर के कई नाले राप्ती नदी में गिरते हैं। रोहिन नदी के पास खाली जगह पर कचरा फेंका जाता है। बरसात में यह कचरा पानी के साथ नदी में मिल जाता है और पानी गंदा हो जाता है। 

एमएमएमयूटी में पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. गोविन्द पांडेय कहते हैं कि नदियों को समाज व सरकार ने अपने हाल पर छोड़ दिया है। एनजीटी की सख्ती के बाद भी नदियों में बिना ट्रीटमेंट गंदा पानी गिराया जाता है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त मनाही के बाद भी प्रतिमाएं नदियों में ही विसर्जित की जा रही हैं। गोरखपुर में प्रतिमा विसर्जन के लिए पोखरे जरूर खुदवाए जाते हैं मगर वहां 50 फीसदी ही प्रतिमाएं विसर्जित होती हैं। इन सबका असर नदियों पर पड़ा है।

नदियों के पेट में बस रहे लोग :
बंधों और नदी के बीच लोगों ने घर बना लिए हैं। इनका कचरा नदियों में ही प्रवाहित होता है। इससे नदियां उथली होती हैं। बाढ़ के समय नदियों में उफान और रास्ता बदलने की वजहें भी प्रमुख रूप से यही हैं। राप्ती नदी के हार्बर्ट बंधे पर जब सरकार ने डबल लेन की सड़क बनाने का निर्णय लिया तो कई मकान ध्वस्त करने पड़े। नौसड़ से कौड़ीराम रोड पर लोगों ने नदी के पेट में कई मकान बना लिए हैं। 

बदरंग तस्वीर
शहर का कचरा व नालियों का गंदा पानी गिर रहा नदियों में
नदियों के जलस्तर में लगातार कमी दर्ज की जा रही, कई नदियां विलुप्त हो चुकी हैं

50फीसदी से अधिक प्रतिमाएं नदियों में विसर्जित होती हैं
24से ज्यादा नदियां उत्तरी पूर्वांचल की जीवनरेखा हैं
57किलोमीटर हिरण्यवती नदी को खोदने का बना प्रोजेक्ट

सुरक्षा के कोई उपाय नहीं
एनजीटी ने अपने एक आदेश में स्पष्ट किया था कि नदियों व ताल पोखरों का वेटलैंड चिह्नित कर उन्हें अवश्य सुरक्षित कर लिया जाए। मगर सरकार गंभीर नहीं हुई है। एनजीटी को इस बात के प्रमाण मिले हैं कि कई जगह वेटलैंड पर अतिक्रमण कर मकान बना हुआ है। आमी बचाओ मंच के विश्वविजय सिंह कहते हैं कि सरकार की मंशा जब तक ठीक नहीं होगी, तब न सिस्टम सुधरेगा और न ही नदियों की दशा सुधरेगी। 

मनवर सफाई का अभियान
बस्ती में 115 किमी लंबी मनवर नदी है। यह नदी शैवाल व सिल्ट से पट गई थी। नदी के पुनरुद्धार के लिए एक अरब की परियोजना पर काम चल रहा है। 18 करोड़ रुपये जन सहयोग, 11 करोड़ रुपये मनरेगा व 76 करोड़ रुपये सिंचाई विभाग की कार्ययोजना बनी है। मनरेगा व जन सहयोग से सफाई का काम जारी है। 

मोड़ दी सरयू की धारा
बस्ती में सरयू में सिल्ट के चलते कई जगहों पर नदी स्थान बदल चुकी है। इससे 55 किमी लंबे विक्रमजोत-धुसवा बांध पर कई जगह कटान होने लगा। सितम्बर 2018 में मुख्यमंत्री योगी ने बाढ़ से स्थाई समाधान के लिए नदी को मूल स्थान पर वापस लौटाने की बात कही।  लगभग 15 करोड़ की इस योजना पर दिसम्बर 2018 में काम शुरू हुआ। 

बस्ती :आमी व कुआनो का पानी हाथ-पैर धोने लायक भी नहीं
बस्ती में सरयू, कुआनो, आमी, मनवर व रामरेखा नदियां बहती हैं। आमी के पानी का रंग केमिकल के चलते काला हो गया है। क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट पर एक चीनी मिल के खिलाफ कार्रवाई भी हुई। खलीलाबाद में भी कुछ उद्योगों पर कार्रवाई हुई। गोंडा से चलकर बिसुही नदी बभनान क्षेत्र में कुआनो नदी में मिलती है। बिसुही अपने साथ दो मिलों का रासायनिक कचरा लेकर कुआनो में मिलाती है। बस्ती के पास भी एक फैक्ट्री का रसायन कुआनो में मिलता है। 

महराजगंज: नेपाल के चलते प्रदूषित हुईं नदियां 
महराजगंज में बड़ी गंडक, छोटी गंडक, रोहिन, राप्ती, चंदन व प्यास नदियां हैं। नेपाल के उद्योगों के पानी से रोहिन और चंदन का पानी दूषित होता है। कूड़ा नदी स्थानीय लोगों के चलते प्रदूषित हुई है। नदियों के प्रदूषण का प्रभाव सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग पर भी पड़ता है। पर्यावरणविद् विंध्यवासिनी सिंह ने नदियों के प्रदूषण से मर रहे वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए प्रशासन के माध्यम से नेपाल सरकार को भी पत्र भेजा लेकिन हल नहीं निकल सका। सिद्धार्थनगर में उद्योग नहीं है तो नगरों और कस्बों का कचरा नदियों को मार रहा है। 

हिरण्यवती को पुनर्जीवित करने का काम शुरू
कुशीनगर के बुद्ध कालीन हिरण्यवती नदी को पुनर्जीवित करने की योजना 2013 में यहां के तत्कालीन डीएम रिग्जियान सैंफिल ने बनाई थी। उस समय आधारशिला से बात आगे नहीं बढ़ी। योगी आदित्यनाथ की सरकार ने इसके लिए बजट दिया तो साल भर पहले करीब पांच किमी नदी खोदी गई। पास की नहर से इसे जोड़ने की योजना बनाई गई ताकि नदी में पानी हमेशा बरकरार रहे। करीब 57 किमी नदी खोदने का प्रोजेक्ट बना है। इसी के साथ पुराने जलस्रोत करुणा सागर की खुदाई भी शुरू हो गई है। आसपास पौधरोपण, बुद्धा पार्क, बुद्धा घाट आदि के भी निर्माण कराए जा रहे हैं। 

विलुप्‍त हो गई स्‍याही नदी
देवरिया की स्याही नदी विलुप्त हो कई है। थोड़ा बहुत पानी रह गया है। खाली स्थानों पर लोगों ने मकान बना लिए हैं। कुशीनगर में बाड़ी नदी के अस्तित्व पर संकट है। बौद्धकालीन हिरण्यवती नदी विलुप्त हो चुकी है। पर्यावरणविद डॉ. हरिशंकर गोविंद राव चेताते हैं कि नदियों को बचाने पर कार्य नहीं किया गया तो हालात विकट होंगे। जलस्रोतों को बचाकर ही जीवन और संस्कृति की धारा बरकरार रखी जा सकती है।

 

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  • Web Title:Dead rivers not become issue in Election in Gorakhpur