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अररिया लोकसभा सीट: चुनावी मैदान में दांव पर भाजपा और राजद की प्रतिष्ठा

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अमरकथा शिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु की माटी पर 23 अप्रैल को होने जा रहे लोकसभा के चुनावी समर में यूं तो 12 लड़ाके मैदान में हैं, लेकिन असल मुकाबला भाजपा और राजद के  बीच है। दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर है। कोसी-सीमांचल समेत पूरे अंग प्रदेश की 12 सीटों में केवल अररिया में ही एनडीए की ओर से भाजपा ने अपना योद्धा उतारा है।
 
जीत के लिए एनडीए की पूरी फौज
ताकत  उनकी जीत के लिए राजनाथ सिंह, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार, सुशील मोदी और एनडीए की पूरी फौज ताकत झोंक रही है। भाजपा के लिए यह सीट कितनी महत्वपूर्ण है यह इसी से समझा जा सकता है कि चुनावी समर में एनडीए के सेनापति प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद 20 अप्रैल को सभा करेंगे। सीमांचल में राजद के कद्दावर नेता और पूर्व गृह राज्य मंत्री रहे मरहूम मो. तस्लीमुद्दीन की विरासत को बचाने में पार्टी और पुत्र एड़ी-चोटी एक करने में पीछे नहीं हैं।

2014 में मोदी लहर में मो. तस्लीमुद्दीन ने भाजपा को 1.46 लाख वोटों से शिकस्त दी थी। 2017 में उनकी मौत के बाद मार्च 2018 में हुए उपचुनाव में उनके पुत्र सरफराज आलम ने भी भाजपा को हराया। भाजपा के प्रत्याशी प्रदीप कुमार सिंह को पिता और पुत्र के हाथों मिली हार का बदला लेने के लिए कड़ा संघर्ष करना होगा।

जातीय गोलबंदी और ध्रुवीकरण पर टिकी है जीत
इस बार भाजपा और राजद दोनों 2014 के लोकसभा चुनाव के परिणाम को देखकर नहीं बल्कि 2018 में हुए उपचुनाव के नतीजों को ध्यान में देखकर रणनीति तैयार कर रहे हैं। अररिया की जीत-हार जातीय गोलबंदी और ध्रुवीकरण पर टिका है। अररिया लोकसभा क्षेत्र में 18 लाख से अधिक वोटर हैं। राजनीतिक जानकारों के अनुसार 7.75 लाख के करीब मुस्लिम वोटर हैं। 5.25 लाख के करीब पिछड़ा, अतिपिछड़ा, महादलित और संथाली वोटर हैं। वहीं 2.75 लाख यादव और 2.25 लाख के लगभग सवर्ण वोटर हैं। राजद मुस्लिम और यादव को ‘माय’ समीकरण के तहत अपना आधार वोट मानता है। वहीं भाजपा अतिपिछड़ा, महादलित और सवर्णों को अपना आधार वोट समझती है। दोनों दलों की पैनी नजर यादव वोट बैंक पर टिकी है। राजद इसमें बिखराव रोकना चाहता है जबकि भाजपा इसमें अधिक से अधिक सेंधमारी करना चाहती है। हालांकि राजद भी महादलित वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश में जुटा है। लेकिन किसकी रणनीति कितनी कामयाब रहेगी यह तो 23 अप्रैल को ही पता चल पाएगा।

देश के पिछड़े जिलों में शुमार 
1967 से लोकसभा चुनाव देख रहा अररिया 1990 में जिला बना। कांग्रेस, जनता पार्टी, जनता दल, भाजपा और राजद सबने इसपर राज किया। लेकिन रेणु की ‘परती परिकथा’ उपन्यास की परिकल्पना के अनुरूप इसका विकास नहीं हो पाया। बिहार में जूट उद्योग के क्षेत्र में कभी लोहा मनवा चुका और अब मक्का उत्पादन में अग्रणी यह क्षेत्र आज देश के सबसे पिछड़े जिलों में शुमार है।

12 प्रत्याशी चुनाव मैदान में  
़1. सरफराज आलम-राजद
2. प्रदीप कुमार सिंह-भाजपा
3. रामनारायण भारती-बसपा
4.ताराचंद पासवान-बहुजन मुक्ति पार्टी
5.सुदामा सिंह-बिहार लोक निर्माण दल
6. अब्दुल वाहिद खान-निर्दलीय
7. मो मतीन -निर्दलीय
8. मो मिनहाज आलम —निर्दलीय 
9. मुकेश सिंह —निर्दलीय 
10.मो मोबिनुल हक—निर्दलीय
11. रामानंद ऋषिदेव —निर्दलीय
12. शाहीन परवीन —निर्दलीय

2014 चुनाव का परिणाम 
मो. तस्लीमुद्दीन - राजद- 4,07,978
प्रदीप कुमार सिंह-भाजपा- 2,61,474
विजय मंडल- जदयू- 2,21,769

2018 उपचुनाव का परिणाम

जीते: सरफराज आलम     राजद    509334
हारे: प्रदीप कुमार सिंह     भाजपा    447546

2009 उपचुनाव का परिणाम

जीते: प्रदीप कुमार सिंह    भाजपा    282742
हारे: जाकिर हुसैन खान    लोजपा     260240 

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  • Web Title:Araria Lok Sabha seat: stake of BJP and RJD prestige in electoral fields for lok sabha election 2019