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विश्लेषण : सामाजिक न्याय के बहाने पिछड़ों की नए सिरे से लामबंदी

समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव की ओर से शुक्रवार को जारी विजन डॉक्यूमेंट ने एक बार फिर सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करने वाले कांशीराम के सिद्धांतों की याद ताजा कर दी। 

अखिलेश ने कांशीराम के नारे '85 बनाम 15 फीसदी' की तर्ज पर दस फीसदी सवर्णों को निशाने पर लिया है। सपा की इस रणनीति को सामाजिक न्याय के बहाने पिछड़ों-दलितों को लामबंद करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।  वैसे सपा की यह रणनीति बेवजह भी नहीं है। नब्बे के दशक में कांशीराम इसी समीकरण के सहारे बसपा को सत्ता पर काबिज कराने में कामयाब रहे थे। 

सियासी जानकारों की मानें तो गरीबी-अमीरी के चोले में यह सियासी हांडी यूं ही नहीं चढ़ाई गई। दरअसल, इसके पीछे पिछड़ों में अगड़े माने जाने वाले यादवों को जोड़ने की रणनीति के साथ बसपा के काडर को यह संदेश देना भी है  कि दोनों ही दलों का जिन जातियों से सरोकार है, उनके दुख-दर्द एक जैसे ही हैं। वे गरीब हैं और अमीरों ने उनके हिस्से पर कब्जा कर रखा है।

शायद यही वजह है कि अखिलेश यादव ने यादव-अहीर रेजीमेंट की न केवल वकालत की, बल्कि इसी बहाने गुजरात रेजीमेंट बनाने का तंज कसकर वहां के अमीरों को भी निशाने पर लिया। राजनीतिक विश्लेषक पूर्व आईजी अरुण कुमार गुप्ता कहते हैं कि सपा का कांशीराम की पुरानी रणनीति पर लौटना बसपा काडर को साथ लेने की कोशिश कहा जा सकता है। मगर, इससे अति पिछड़ी जातियों में असंतोष को हवा मिलने की आशंका भी पैदा हो सकती है, जो सियासी रूप से सपा के लिए शायद मुफीद ना हो।

पिछड़ों में असंतोष
कहना गलत न होगा कि जिन पिछड़ों को सपा व बसपा साधने की कवायद कर रहे हैं, उनकी तमाम जातियों में असंतोष है। वे ओबीसी आरक्षण में बंटवारे की मांग को और तेज कर सकते हैं। इन जातियों का दावा है कि ओबीसी आरक्षण का लाभ चंद जातियों के लोग ही लेते हैं। उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाता है। लिहाजा, सभी जातियों के आरक्षण नए सिरे से तय किए जाएं। सपा प्रमुख अखिलेश ने भी हालांकि शुक्रवार को कहा कि वह चाहते हैं कि जातीय जनगणना हो और उसी हिसाब से हिस्सेदारी तय हो।

भाजपा की सामाजिक न्याय समिति 

अति पिछड़ी जातियां मसलन-निषाद, बिंद, कहार, कलवार, भड़भूज, राजभर सहित करीब 60 जातियों की मांग रही है कि उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिला और कुछ खास जातियां जिनमें यादव व कुर्मी हैं, ने ही ज्यादा फायदा उठाया। ऐसे में भाजपा ने इस असंतोष को कम करने और अतिपिछड़ों को अपने पाले में लाने के लिए सामाजिक न्याय समिति बनाई है। पार्टी अब इसकी रिपोर्ट का अध्ययन कर रही है। सपा के इस विजन डॉक्यूमेंट के बाद इन जातियों में सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट लागू करने की मांग और तेज हो सकती है। समाजिक न्याय के नाम पर अगर नए सिरे से जातीय लामबंदी शुरू हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। 

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