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चुनावी मुद्दा: बाढ़ की बर्बादी के मुहाने पर 50 लाख लोग

terror in public after water level increase of rivers

चुनावी रण में ताल ठोक रहे सूरमा मतदाताओं को लुभाने के लिए तरकश से एक से बढ़कर एक तीर निकाल रहे हैं। विरोधियों को नाकाम अथवा कमतर साबित करने का कोई मौका भी नहीं चूक रहे। पूरी तस्वीर से अगर कोई गायब है तो वह है जतना और उसके मुद्दे। मुद्दा भी कोई मामूली नहीं, बल्कि जीने-मरने के सवाल का है। उत्तरी पूर्वांचल की 50 लाख की आबादी का जीवन हर साल बाढ़ से बेपटरी होता है। जब तक संभलने की कोशिश करते हैं, बाढ़ फिर कमर तोड़ देती है। पिछले तमाम चुनावों की तरह एक बार फिर वायदों की लंबी फेहरिस्त के साथ सियासी लड़ैया मैदान में हैं, मगर बाढ़ की इस सनातन समस्या के पुख्ता समाधान की गारंटी किसी के पास नहीं।

गोरखपुर-बस्ती मंडल ने वर्ष 1998 में सदी की भीषणतम बाढ़ की विभीषिका झेली थी। दोनों मंडलों में बहने वाली दो दर्जन से अधिक छोटी-बड़ी नदियों ने जमकर तबाही मचाई थी। अकेले गोरखपुर में बाढ़ ने 127 से अधिक जिंदगियां निगल ली थीं। तकरीबन 15 लाख से अधिक आबादी प्रभावित हुई। यही हाल अन्य जिलों का भी रहा। वर्ष 2017 में एक बार फिर वही मंजर लोगों ने देखा। दोनों मंडलों में नदियों ने तबाही मचाई। जनधन की हानि हुई। फसलें बर्बाद हो गईं। झोपड़ी और कच्चे मकान की कौन कहे, पक्के आशियाने भी बह गए। 

चारों तरफ मचा था हाहाकार: 
बाढ़ से तबाही का आलम यह रहा कि चारों तरफ हाहाकार मचा रहा। बाढ़ से बचाव और राहत कार्य पर अकेले गोरखपुर में तकरीबन 13 करोड़ रुपये खर्च हो गए। मंडल का आंकड़ा 100 करोड़ से ज्यादा रहा। हालांकि, इसके बाद बाढ़ से बचाव के कुछ काम 
शुरू हुए हैं, लेकिन जरूरत रफ्तार बढ़ाने की है। 
    
देशभर में आपदा से जंग लड़ने को गोरखपुर के दो सौ बेटे प्रशिक्षित : देशभर में कहीं भी आपदा आएगी तो गोरखपुर के दो सौ बेटे वहां मदद के लिए पहुंच जाएंगे। आपदा से निपटने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंध प्राधिकरण ने प्रशिक्षण देकर उन्हें दक्ष बनाया है। केंद्र सरकार द्वारा आपदा मित्र परियोजना के तहत देशभर से छह हजार युवाओं को चयनित कर उन्हें आपदा से लड़ने के लिए तैयार किया गया है। 

कभी थे 12 बीघे के खेतिहर अब दो डिस्मिल पट्टा
तीन साल पहले कटान से देवरिया का कुर्ह परसिया गांव सरयू नदी में समा गया। तभी से गांव के लोग विस्थापितों का जीवन बिता रहे हैं। यहीं के रहने वाले कृष्णानंद मिश्र को परसिया तिवारी गांव के पश्चिम में दो डिस्मिल जमीन पट्टे पर मिली है, जिसपर आवास बनाकर वह परिवार का गुजर-बसर कर रहे हैं। दर्द बयां करते हुए वह फफक पड़ते हैं। बताते हैं कि घर के साथ ही तकरीबन 12 बीघा खेती की जमीन नदी निगल गई। इससे परिवार की माली हालत बदतर हो गई। पंडिताई करके किसी तरह दो वक्त की रोटी का जुगाड़ होता है। सब कुछ खरीदकर खाना पड़ता है। 

एक दर्जन गांव नदी में समाए विभाग मानता ही नहीं
कुशीनगर में छोटी गंडक के एपी तटबंध के किनारे पिपराघाट के चार पुरवा, विरवट कोहन्वलिया का एक पुरवा, बाघाचौर का दो, अहिरौलीदान का पांच पुरवा समेत 12 पुरवों का अस्तित्व समाप्त हो चुका है। इन गांवों की चार हजार आबादी एपी तटबंध पर रहने को मजबूर है, लेकिन विभाग इन पुरवों का अस्तित्व समाप्त होना कबूल नहीं करता है। 24 किलोमीटर लंबे एपी तटबंध से यूपी-बिहार के करीब साढ़े चार सौ गांवों की दस लाख आबादी को सुरक्षा मिलती है। इस समय नदी तटबंध से बिल्कुल सटकर बह रही है। इससे कई जगह इसके कटने का खतरा पैदा हो गया है।

गोरखपुर एसडीआरएफ गठित की सरकार ने 
उत्तरी पूर्वांचल में सरयू, राप्ती, छोटी गंडक, बड़ी गंडक, रोहिन, बूढ़ी राप्ती, गोर्रा, कुआनो, आमी, बानगंगा, कूड़ा, घोंघी, जमुआर, मनवर, रामरेखा, सोतवा, परासी नदियां बहती हैं। दोनों मंडल में बाढ़ की विभीषिका से निपटने के लिए एनडीआरएफ की एक टुकड़ी गोरखपुर में रहती है। चरगांवा में कैम्प है, जहां एक कम्पनी जवान और अफसर रहते हैं। आपदा आने पर बचाव कार्य में जुट जाते हैं। मंडल में बाढ़ की विभीषिका को देखते हुए ही उत्तर प्रदेश सरकार ने 26वीं वाहिनी पीएसी में एक कम्पनी जवानों को प्रशिक्षण दिलाकर उन्हें दक्ष कराया। इस कम्पनी को एसडीआरएफ में शामिल किया गया है।

दर्द : नदी में समा गए चार दर्जन गांव 
बस्ती में माझा क्षेत्र के कुर्मियाना गांव को 2004 में सरयू निगल गई। तभी से गांव के लोग चांदपुर तटबंध पर झोपड़ी डालकर जीवन गुजार रहे हैं। पिछले साल प्रशासन ने चांदपुर गांव की ग्राम समाज की जमीन पर उन्हें अस्थाई रूप से बसाया। बुद्धिराम बताते हैं कि मकान तो रह नहीं गया, अब झोपड़ी में जिन्दगी कट रही है। परिवार में पांच सदस्य हैं, जो मजदूरी कर पेट पाल रहे हैं। नेता हों या अफसर, सभी केवल आश्वासन देते हैं। स्थाई समाधान की बात कोई नहीं करता। इसी दर्द से सरयू में समा चुके बस्ती जिले के 23 गांवों की करीब 25 हजार आबादी गुजर रही है। इसके अलावा सिद्धार्थनगर का भिखारीपुर, गोरखपुर का कोलखास और जगदीशपुर, देवरिया का कुर्ह परसिया समेत कुल करीब चार दर्जन गांव अब सिर्फ कागजों में रह गए हैं। 

दवा : बाढ़ से बचाव को मोड़ी सरयू की धारा
बस्ती में ही सरयू किनारे बने 55 किलोमीटर लंबे विक्रमजोत-धुसवा बांध के जिम्मे करीब 400 गांवों की सुरक्षा है। नदी कटान करते हुए कई जगह बंधे पर दबाव बना रही थी। इससे पिछले साल आई बाढ़ में दो जगह बांध कटने से भारी तबाही मची थी। सितम्बर 2018 में बाढ़ पीढ़ितों के बीच पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्थाई समाधान की बात कही। इसके बाद सिंचाई विभाग की यांत्रिक टीम ने नदी की धारा को पुराने स्थान पर पहुंचाने की योजना तैयार की। लगभग 15 करोड़ की इस योजना पर दिसम्बर 2018 में काम शुरू हुआ। अब तक शेरवा घाट, कटरिया चांदपुर और पिपरपाती के पास ड्रेजिंग कर धारा को बंधे से दूर कर दिया गया है। बस्ती के अलावा संतकबीरनगर व गोरखपुर में भी ड्रेजिंग का काम चल रहा है।

दिक्कत: धारा मोड़ने के विरोध में हुए मुखर
गोरखपुर में राप्ती नदी भी हर साल तबाही मचाती है। यहां भी कुछ जगहों पर धारा मोड़ने की योजना तैयार की गई है, लेकिन बेलीपार क्षेत्र के करजही में धारा मोड़ने का काम चालू होने के पहले ही विरोध शुरू हो गया। यहां महापंचायत में जलपुरुष राजेंद्र सिंह भी आ चुके हैं। वह इसे पर्यावरण का मुद्दा बताते हैं। वह इस प्रयास को बाढ़ से मुक्ति के सपने दिखा जनता को गुमराह किए जाने की बात कह गए। हालांकि, वैज्ञानिक तरीके से न तो कोई विरोध करने वालों को समझा पा रहा है और न ही समझने को उत्सुक दिख रहा है। जबकि सेटेलाइट तस्वीरें भी बता रही हैं कि तीन दशक में राप्ती करीब ढाई किलोमीटर खिसककर मलौनी बंधे से सटकर बहने लगी है। बंधा कटान की जद में आया तो बड़ी तबाही मच सकती है। 
 

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  • Web Title:50 thousand peoples are on stake in Gorakhpur due to flood