History Of Mahoba City: चंदेल राजाओं का प्रमुख केंद्र था महोबा, आल्हा-ऊदल की वीरभूमि का आधुनिक है इतिहास

Mar 08, 2026 11:56 am ISTDeepali Srivastava लाइव हिन्दुस्तान
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उत्तर प्रदेश का शहर महोबा पहले बुंदेलखंड में हुआ करता था और ये शहर चंदेल राजाओं का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। आज हम आपको महोबा शहर से जुड़ा चंदेलों का इतिहास और आल्हा-ऊदल की कहानी बताने जा रहे हैं।

History Of Mahoba City: चंदेल राजाओं का प्रमुख केंद्र था महोबा, आल्हा-ऊदल की वीरभूमि का आधुनिक है इतिहास

उत्तर प्रदेश का खूबसूरत शहर महोबा का नाम शायद ही आपने सुना होगा। पहले महोबा बुंदेलखंड में आता था लेकिन 11 फरवरी, 1995 को यह उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले से अलग होकर स्वतंत्र जिला बना। 9वीं-12वीं शताब्दी में चंदेल राजाओं के शासनकाल के दौरान महोबा उनकी राजधानी और बुंदेलखंड की 'वीरभूमि' के रूप में प्रसिद्ध था। यहां आपको सांस्कृतिक इतिहास लेकर योद्धाओं की वीरता के किस्से सुनने को मिलेंगे। महोबा को आल्हा-उदल की नगरी भी कहा जाता है और इसे चंदेल राजा की भूमि भी। महोबा में जहां-तहां अद्भुत कारीगरी की झलक विशाल मंदिर, नक्काशीदार इमारतों में दिखती है। साथ ही यहां आल्हा-उदल के नाम से चौराहे भी बने हुए हैं, जो उनकी अलग पहचान कराते हैं। आज हम आपको महोबा से जुड़ा पूरा इतिहास विस्तार से और यहां के मशहूर जगहों के बारे में बताएंगे।

चंदेल राजाओं का राज्य

चंदेल राजपूत के वंश माने जाते हैं, जो 9 से 21वीं शताब्दी तक बुंदेलखंड के कई हिस्सों में राज करते थे। चंदेल राजा काफी साहसी और वीर माने जाते थे, जिनका गाथाएं काफी मशहूर हैं। ऐसा कहा जाता था कि चंदेल राजाओं के सैनिक इतने वफादार होते थे कि वह राजा के एक इशारे पर अपनी जान दे देते थे। महोबा में चंदेल वंशज की नींव नन्नुक ने 831-845 ई. में रखी थी। इसके बाद यशोवर्मन, धंगदेव, और विद्याधर सबसे शक्तिशाली शासक थे, जिन्होंने महमूद गजनवी के हमलों को रोका था। महोबा के आखिरी शासक थे परमर्दिदेव (परमाल), इनके समय 1182 ई. में पृथ्वीराज चौहान से युद्ध हुआ और इसी युद्ध में आल्हा-उदल की वीरता की कहानी मशहूर हुई।

कौन थे आल्हा-ऊदल

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12वीं शताब्दी के बुंदेलखंड (महोबा) के महान वीर योद्धा और सगे भाई थे आल्हा-ऊदल, जो चंदेल राजा परमाल की सेना के सेनापति दसराज के पुत्र थे। आल्हा-ऊदल को परमाल के दरबार में ही पाला गया था और बचपन से ही वह दोनों काफी बहादुर थे। आल्हा को युधिष्ठिर और ऊदल को भीम का अवतार माना जाता है। दोनों ने महोबा की रक्षा में पृथ्वीराज चौहान की सेना के साथ अंतिम युद्ध किया था और अपनी आखिरी सांस तक लड़ते रहे थे। इसके बाद वीरगति को प्राप्त हुए थे। इसके बाद भी कहा जाता था कि आल्हा-ऊदल अमर हैं। ऐसा माना जाता है कि आल्हा आज भी मैहर देवी की पूजा करते थे। महोबा में दोनों के नाम से अलग-अलग चौराहे बने हुए हैं और दोनों की घोड़े पर सवार मूर्ति बनी हुई है, जिसे आल्हा और ऊदल चौक के नाम से जाना जाता है।

महोबा में आकर्षक का केंद्र

महोबा में झील, तालाब, बगीचे खूब सारे बने हुए हैं और कहा जाता है कि ये चंदेल राजाओं ने ही बनवाए हैं। महोबा जाएंगे तो वहां आपको चंद्रिका देवी मंदिर मिलेगा, जिसकी नक्काशी और कला कृति अद्भुत लगेगी। महोबा का कजली का मेला काफी मशहूर है, जो हर साल सावन में लगता है। महोबा में आप विजय और मदन सागर घूमने जा सकते हैं, जहां पार्क के साथ बोटिंग का मजा मिलेगा।

बेर जरूर खाएं

अगर महोबा जाएं तो वहां के उबले बेर जरूर खाएं। महोबा में बेर उबालकर उसमें नमक डालकर पत्ते के दोने में दिया जाता है, जो काफी टेस्टी लगता है। इसके अलावा महोबा में खाने के लिए मशहूर है बैंगन का भर्ता और रोटी। पान की खेती भी महोबा में खूब ज्यादा की जाती है और यहां का देशावरी पान भी फेमस है। महोबा में महुआ भी खूब उगते हैं, जिसकी सब्जी काफी स्वादिष्ट बनती है।

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दीपाली श्रीवास्तव पिछले 8 वर्षों से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं और 5 सालों से लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में डेप्युटी चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं। संस्थान में साल 2021 में वेब स्टोरी से अपने सफर की शुरुआत करने के बाद, वह आज लाइफस्टाइल टीम का अहम हिस्सा हैं। डिजिटल मीडिया के बदलते ट्रेंड्स, यूजर बिहेवियर और पाठकों की रुचि को समझने में उनकी मजबूत पकड़ उन्हें एक भरोसेमंद और प्रभावशाली कंटेंट प्रोफेशनल बनाती है।


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