
सफेद नहीं काले रंग का था पहला 'ताज', मकबरे पर लिखी हई हैं कुरान की आयतें
इब्राहिम रोजा मकबरे पर कुरान की आयतें खुदी हुई हैं, जो इसकी वास्तुकला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये आयतें मकबरे की नक्काशीदार जालीदार खिड़कियों और दरवाजों पर दिखाई देती हैं, जो इसे एक भव्य और धार्मिक रूप देती हैं।
अगर आप घूमने-फिरने के शौकीन हैं और वीकेंड के आसपास अकसर छुट्टियां लेकर नई-नई जगह देखने के लिए घर से निकल पड़ते हैं तो आपको साउथ का 'काला ताजमहल' जरूर आकर्षित कर सकता है। जी हां, बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि आगरा के ताजमहल से पहले ही दक्षिण में बने इस 'काले ताज' की नींव रखी जा चुकी थी। बता दें, यह काला ताज और कोई नहीं इब्राहिम रोजा का मकबरा है। जी हां, इब्राहिम रोजा मकबरा ताजमहल से पहले बना था, क्योंकि यह बीजापुर में 1626-1627 में बनकर तैयार हुआ, जबकि ताजमहल का निर्माण 1632 में शुरू हुआ था। यह मकबरा मूल रूप से इब्राहिम आदिल-शाह द्वितीय ने अपनी पत्नी ताज सुल्ताना के लिए बनवाया था, लेकिन इब्राहिम की मृत्यु उनकी पत्नी से पहले हो गई और उन्हें पहले ही वहां दफना दिया गया।
इब्राहिम रोजा परिसर की खासियत
इब्राहिम रोजा परिसर को ’काला ताजमहल’ या ’दक्षिण का ताज’ के रूप में जाना जाता है। यह भारत के उत्तरी कर्नाटक के बीजापुर शहर में स्थित है। इब्राहिम रोजा का निर्माण आदिल शाही वंश के छठे सुल्तान, इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय ने 1626 ई. में करवाया था। यह दो इमारतों का एक सुंदर और मनोरम समूह है जिसमें इब्राहिम द्वितीय, उनकी रानी ताज सुल्ताना और परिवार के चार अन्य सदस्यों के मकबरा शामिल है।
गहरे भूरे बेसाल्ट पत्थर से बना है मकबरा
इब्राहिम रोजा मकबरा काला नहीं है, लेकिन इसे कभी-कभी 'काला ताज' कहा जाता है क्योंकि इसका निर्माण गहरे भूरे बेसाल्ट पत्थर से किया गया है, जो सफेद संगमरमर के साथ मिलकर एक अनूठा प्रभाव देता है। इसे 'दक्कन का ताज' भी कहते हैं और यह अपनी अद्भुत वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें घनी अलंकृत सतहें और बल्बनुमा गुंबद शामिल हैं।
इब्राहिम रोजा मकबरे पर खुदी हुई हैं कुरान की आयतें
बीजापुर के इब्राहिम रोजा मकबरे पर कुरान की आयतें खुदी हुई हैं, जो इसकी वास्तुकला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये आयतें मकबरे की नक्काशीदार जालीदार खिड़कियों और दरवाजों पर दिखाई देती हैं, जो इसे एक भव्य और धार्मिक रूप देती हैं।
वास्तुकला की विशेषताएं
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में शामिल इस राष्ट्रीय महत्व के स्मारक की अनोखी कला यहां आने वाले हर पर्यटक को अपने ओर आकर्षित करती है। इब्राहिम रोजा, बीजापुर में स्थित, आदिलशाही वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसे इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय की पत्नी ताज सुल्तान ने बनवाया था। इब्राहिम रोजा परिसर में एक मकबरा और एक मस्जिद है, जिन्हें एक सजावटी पूल द्वारा अलग किया गया है। इसकी प्रमुख विशेषताओं में फ़ारसी वास्तुकला से प्रभावित मीनारें, जटिल नक्काशी, कुरान के शिलालेख और मकबरे के भीतर इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय सहित कुल छह कब्रें शामिल हैं। मकबरे का आंतरिक भाग बहुत सरल है, जबकि मस्जिद का अग्रभाग जटिल नक्काशी से सजाया गया है। परिसर की हर कोने पर चार पतली मीनारें हैं। मकबरे के अंदर का हिस्सा बहुत ही सादा है, लेकिन इसकी छत पर एक मंडलाकार पैनल है जिसमें फूल जैसी रचना है।

लेखक के बारे में
Manju Mamgainलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




