धौला कुआं-लाल कुआं नाम के पीछे क्या है इतिहास? रोज जाने वाले लाखों लोग भी नहीं जानते इसकी असली कहानी
दिल्ली के लाल-धौला कुआं का नाम आपने जरूर सुना होगा लेकिन क्या आप इन नामों का इतिहास जानते हैं। आज हम आपको बताएंगे कि आखिर इनका नाम ये क्यों पड़ा और किसने इन्हें बनवाया था?

धौला कुआं और लाल कुआं का नाम आपने कभी न कभी जरूर सुना होगा या फिर आप वहां जाम में भी फंसे होंगे। दोनों ही जगह काफी व्यस्त और भीड़ वाली मानी जाती है, जहां पर लोग घंटों तक जाम में फंसे रहते हैं। धौला कुआं धौला कुआं दक्षिण-पश्चिम दिल्ली का रिहायशी इलाका है। तो वहीं लाल कुआं पुरानी दिल्ली का एक ऐतिहासिक इलाका है, जो चांदनी चौक और लाल किला के करीब में मौजूद है। यह इलाका आज बाजारों, संकरी गलियों और पुराने कारोबारी केंद्रों के रूप में जाना जाता है। दोनों ही जगहों के बारे में आपने जरूर सुना होगा लेकिन क्या कभी सोचा है कि आखिर इनके ये नाम क्यों पड़े? कुआं से तो सीधा मतलब पानी वाला कुआं ही होता है लेकिन क्या यहां पर कुएं थे, अगर हां, तो किसने बनवाएं और इन नामों के मतलब क्या थे। चलिए आपको पूरी जानकारी इस आर्टिकल में देते हैं।
धौला कुआं का इतिहास क्या है
इतिहासकारों के मुताबिक, मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय ने करीब 18वीं सदी में इस कुएं को बनवाया था। उस वक्त यहां पर चारों तरफ जंगल और पथरीला रास्ता था। इस रास्ते से गुजरने वाले मुसाफिरों, व्यापारियों और सैनिकों के पीने के पानी के लिए यहां एक कुआं बनवाया गया था। खास बात ये थी कि इस कुएं को सफेद पत्थरों (White Sandstone) से बनवाया गया था, जिससे इसका पानी गर्मी में भी ठंडा बना रहे। इसके अलावा इस कुएं का पानी मीठा होता था। जी हां, ऐसा कहा जाता है कि पानी का स्वाद वैसे तो कड़वा या खारा होता है लेकिन धौला कुआं का पानी का स्वाद मीठा था।
ये नाम क्यों पड़ा
सफेद पत्थरों (White Sandstone) से बनने के कारण इसका नाम धौला कुआं पड़ गया। हिंदी-राजस्थानी भाषा में सफेद रंग को धौला कहा जाता है। सफेद रंग के कुएं को देखकर लोगों ने इसका नाम धौला कुआं रख दिया। तभी से इसका यही नाम मशहूर हो गया और फिर इसी नाम से चौराहे, मेट्रो स्टेशन बन गया। अब ये कुआं बंद कर दिया गया लेकिन अब आप जब भी धौला कुआं से गुजरेंगे तो आपको ये कहानी याद आएगी।
लाल कुआं का इतिहास भी जानिए
पुरानी दिल्ली में मौजूद लाल कुआं को अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने अपनी प्रिय पत्नी बेगम ज़ीनत महल के लिए बनवाया था। इस कुएं को लाल बलुआ पत्थरों से बनवाया गया था और फिर ऊपर से लाल रंग का ही पोता भी गया था। इसी कारण से इसका नाम लाल कुआं पड़ गया। इसके अलावा एक लाल कुआं गाजियाबाद में भी है, जिसे गाजी-उद-दीन ने 18वीं सदी में बनवाया था। दिल्ली वाले लाल कुआं की तरह ही इसे भी लाल बलुआ पत्थरों से बनवाया था, जिससे वहां से गुजरने वाले राहगीर अपनी प्यास बुझा सकें।
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