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26 मार्च, 2020|12:42|IST

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चिपको आंदोलन : पेड़ों को बचाने की मुहिम के आगे ऐसे झुक गई थी सरकार, ग्रामीणों की हिम्मत को आज भी दुनिया करती हैं सलाम

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आज के समय में जिस तरह आधुनिकता की आड़ में जंगल और जीवों को नुकसान पहुंच रहा है। आने वाले समय में इसके दुष्परिणामों से इंकार नहीं किया जा सकता। 70 के दशक में जंगल को बचाने की मुहिम ने ऐसी क्रांति का रूप ले लिया, जो हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गई। इस आंदोलन की चंडीप्रसाद भट्ट और गौरा देवी की ओर से की गई थी और भारत के प्रसिद्ध सुंदरलाल बहुगुणा ने आगे इसका नेतृत्व किया। इस आंदोलन में पेड़ों को काटने से बचाने के लिए गांव के लोग पेड़ से चिपक जाते थे, इसी वजह से इस आंदोलन का नाम ‘चिपको आंदोलन’ पड़ा था।

आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा 
चिपको आंदोलन की शुरुआत प्रदेश के चमोली जिले में गोपेश्वर नाम के एक स्थान पर की गई थी। आंदोलन साल 1973 में शुरु हुई जंगलों की अंधाधुंध और अवैध कटाई को रोकने के लिए शुरू किया गया। इस आंदोलन में महिलाओं का भी खास योगदान रहा और इस दौरान कई नारे भी मशहूर हुए और आंदोलन का हिस्सा बने। इस आंदोलन में वनों की कटाई को रोकने के लिए गांव के पुरुष और महिलाएं पेड़ों से लिपट जाते थे और ठेकेदारों को पेड़ नहीं काटने दिया जाता था। जिस समय यह आंदोलन चल रहा था, उस समय केंद्र की राजनीति में भी पर्यावरण एक एजेंडा बन गया थाय इस आन्दोलन को देखते हुए केंद्र सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम बनाया।
इस अधिनियम के तहत वन की रक्षा करना और पर्यावरण को जीवित करना है। कहा जाता है कि चिपको आंदोलन की वजह से साल 1980 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक विधेयक बनाया था। इस विधेयक में हिमालयी क्षेत्रों के वनों को काटने पर 15 सालों का प्रतिबंध लगा दिया था। चिपको आंदोलन न सिर्फ उत्तराखंड में बल्कि पूरे देश में फैल गया था। आज भी यह आंदोलन सुनहरे अक्षरों में इतिहास में दर्ज है। जिस तरह ग्रामीणों में पेड़ों के कटाव को रोकने के लिए हिम्मत दिखाई थी, उसे पूरी दुनिया सलाम करती है। 
 

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  • Web Title:what is chipko movement know its history significance and other major facts