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जीवन शैलीफिजां से गुम हो चुकी है बुंदेली लोकसंगीत की सुरमयी मिठास

एजेंसी ,झांसीPublished By: Pratima Jaiswal
Sun, 09 Aug 2020 03:40 PM
फिजां से गुम हो चुकी है बुंदेली लोकसंगीत की सुरमयी मिठास

 पाश्चात्य संगीत के बढ़ते प्रभाव के चलते बुंदेलखंड की संस्कृति का पयार्य माने जाने वाली लोकगायन की मिठास फिजां से लुप्त होती जा रही है। तीन दशक पहले तक खेती बाड़ी का काम निपटा कर गांव की चौपाल पर हर शाम जमा होने वाले ग्रामीण अपनी थकान वीररस से भरपूर लोकसंगीत का लुफ्त उठाकर मिटाते थे वहीं पेड़ों पर पड़े झूलों पर बच्चे किलकलारी मारते हुये पींग मारते नजर आते थे।  खुशी का मौका हो या गम भुलाने की तरकीब, लोकगायन उनके लिये टानिक का काम करता था। लोकसंगीत की मिठास से भरपूर निराली दुनिया में बुंदेलखंड की संस्कृति भी अमिट छाप साफ दिखती थी लेकिन  मोबाइल और इंटरनेट की ग्रामीण इलाकों में पहुंच ने युवा वर्ग को उन्हे इस अनूठी परंपरा और संस्कृति से दूर कर दिया है।
चौपालों में अब महफिलें नहीं सजती हालांकि कुछ बहुत बुजुर्ग कमर झुकाये अपनी समस्यायों को साझा करते देखे जा सकते है। लोकगायन की अनूठी परंपरा को लगभग विराम लग चुका है। शोरशराबे से भरपूर पाश्चात्य संगीत सदियों पुराने लोकसंगीत को लगभग लील चुका है। यही कारण है पारंपरिक वाद्य यंत्र जैसे झीका, मटका ,पखावज ,डफला, रमतूला, अलगोजा और पारंपरिक गायन तथा नृत्य की विधाओं का अस्तित्व खत्म होता जा रहा है।
जाने माने तबला वादक और बच्चों को संगीत की नि:शुल्क शिक्षा के लिए संगीत स्कूल चलाने वाले डॉ़ शिवपूजन अवस्थी ने 'यूनीवातार्' के साथ खास बातचीत में कहा “ भारतीय संस्कृति में बच्चे के जन्म से लेकर मृत्यु तक संगीत विभिन्न रूपों में सामने आता है। हमारे देवी देवाओं के हाथ भी वाद्य यंत्रों का होना बताता है कि संस्कृति के आधारभूत तत्वों में संगीत है। शिव के हाथ में डमरू,सरस्वती के हाथ में वीणा, नारद के हाथ में इकतारा तो कृष्ण की प्रिय थी बांसुरी। स्थानीय स्तर पर जीवन के दुखों और खुशियों के मिले जुले रंग से बना संगीत लोगों के गायन ,वादन और नृत्य से अपनी परिपूर्णता पाता है।”
उन्होने कहा कि आधुनिकता की होड़ और विलासितापूर्ण जीवन जीने के लिये अधिक पैसा कमाने की लालसा ने  इंसान को पुरखों की विरासत लोक संस्कृति से दूर कर दिया है। जीवन के हर रंग को खूबसूरती के साथ जीने की कला सिखाने वाली लोक संस्कृति पिछड़ती चली जा रही है।   

 

Photo Credit :orchaa.wordpress.com
डा अवस्थी ने बताया कि महर्षि व्यास, जनकवि ईसुरी, पद्माकर भूषण, मतिराम, केशव, तुलसी, बिहारी ,लक्ष्मीबाई, नाना, आल्हा और ऊदल की जन्मस्थली का गौरव पाने वाले बुंदेलखंड में लोकविधाओं के माध्यम से कभी संस्कार गीत, तो कभी श्रम गीत या ऋतुगीत गाकर भाईचारे का संदेश दिया जाता था। जनकवि ईसुरी ने अपनी रचनाओं बसंत के गीतों को गांव में खेत खलिहान मे लिखा । सावन आते ही बुंदेलखंड में लोकगायन ,वादन और नृत्य जैसी कलाएं जैसे चहकने लगती थीं। सावन में प्रकृति अपनी खुशी का इजहार करती थीं वही यहां पर लोग आल्हा ,कजली और झूला जैसे न जाने कितनी लोकशैलियों में अपनी प्रसन्नता का इजहार करते थे। 
उन्होने बताया  कि पहले गांव में लोग एकत्र होकर बच्चे बूढ़े और जवान लोक वाद्य यंत्रों की मदद से लोकगीत और नृत्य किया करते थे और इस तरह लोकसंगीत भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढी पर आसानी से चला जाता था। हर आयुवर्ग का व्यक्ति इस जश्न में शामिल होता था। बुंदेलखंड आल्हा और ऊदल जैसे वीरों का क्षेत्र है और दिल्ली नरेश पृथ्वीराज सिंह चौहान के साथ उनकी लडाइयों की गौरव गाथा आज भी यहां की हवाओं में गूंजती है। वीररस से भरी इन कथाओं का गायन जब यहां के लोग पूरे जोश से करते हैं तो बच्चे बच्चे में वीरता,शौर्य और मातृभूमि के लिए सब कुछ न्योछावर करने जैसी भावनाएं बलवती होती हैं। लोक कलाएं हर वर्ग के लोगों को आकर्षित और प्रभावित करतीं हैं इनमें न तो विषयों की कमी होती है और न ही कथ्य की। 
जनकवि ईसुरी की प्रेम , श्रृंगार ,करूणा, सहानुभूति और हृदय की कसक जैसी भावनाओंं से भरी फाग जब सावन में पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ सामूहिक रूप से गायी जाती हैं तो पूरी प्रकृति मानों झूमने लगती है । धान और दूसरी फसलों की बुवाई के समय भी लोग फसल को लोकगीत सुनाते हैं संगीत का सकारात्मक असर खेती पर भी बडा सकारात्मक होता है। इंसान से लेकर फसल तक अपना सकारात्मक प्रभाव छोड़ने वाले लोककलाएं अब बुंदेलखंड में भी शांत होती जा रहीं हैं। सावन के मौसम में शबाब पर आने वाली यह परंपरांए मानसून के कमजोर होने से कमजोर होती है। मानसून तो हो सकता है कि अगले साल अच्छा हो जाए लेकिन जिस तरह इस क्षेत्र से पलायन हो रहा है और लोगों में अपनी संस्कृति और परंपराओं से दूर जाने की प्रवृति बलवती हो रही है तो संभव है के यह लोककलाएं भी यूं ही दम तोड़ दें।
डॉ़ अवस्थी ने कहा कि कोरोना काल में सावन की मौज मस्ती भी प्रभावित हुई है। यहां अब कुछ ही लोगों के बीच होने वाले सामूहिक गायन वादन की परंपरा पर भी इस महामारी का असर साफ नजर आ है। गांवों में झूले नहीं पड़े, कजलियां नहीं निकाली गयी और लोगों के बीच सामूहिकता की भावना कमजोर हुई ऐसे में समाज को जोड़ने वाली इन लोकपरंपराओं को सहेजने की बहुत अधिक आवश्यकता है। यह सरकार का काम नहीं है आम लोगों को ही अपनी परंपराओं को सहेजने का प्रयास करना होगा अन्यथा सामाजिक ताने बाने पर इसका गंभीर प्रभाव होगा।                       

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