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सोशल मीडिया सेः दान का घमंड

एक आदमी बहुत धनवान था। पैसा बहुत था उसके पास, बस धैर्य नहीं था। किसी को एक पैसा देता तो सैकड़ों-हजारों के गीत गाया करता। हर जगह अपनी दानशीलता और संपन्नता का गुणगान करता। एक दिन उसे पता चला कि शहर में एक बड़े महात्मा आए हैं। वह उनके पास जा पहुंचा। अभिवादन के बाद महात्मा ने उससे उसके आने का प्रयोजन पूछा तो पहले तो उसने अपने ऐश्वर्य और दानशीलता का बखान किया।

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अपनी प्रशंसा के बाद उस आदमी ने एक थैली निकालकर महात्मा के पास रखी और बोला, ‘मैंने सोचा कि आपको पैसे की तंगी रहती होगी, इसलिए यह लेता आया। ये हजार मुहरें हैं।' ऐसा कहते हुए उसकी आंखों में अभिमान भी उभर आया। महात्मा ने थैली को एक ओर सरकाते हुए कहा, ‘मुझे पैसों की जरूरत नहीं है, तुम्हारी है।' यह सुनकर धनवान दुखी हो गया। आखिर महात्मा की हिम्मत कैसे हुई, जो उसकी दी हुई भेंट उन्होंने ठुकरा दी। आज तक यह साहस किसी ने नहीं किया। महात्मा बोले, ‘क्यों, तुम्हें बुरा लगा न!' व्यक्ति बोला, ‘बुरा लगने की बात ही है। इतनी बड़ी रकम आपने ठोकर मार दी, जैसे मिट्टी हो।' यह सुनकर महात्मा ने जबाव दिया, ‘याद रखो, जिस दान के साथ दाता अपने को नहीं देता, वह दान मिट्टी के बराबर हो जाता है। दान का अर्थ है सम विभाजन। दूसरे का हिस्सा तुमने ले लिया है। उसे लौटाते हो तो इसमें अभिमान का अवसर कहां रहता है? यह तो चोरी का प्रायश्चित है।' धनी का गर्व चूर-चूर हो गया। उसकी सोच की दिशा ही बल गई।

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  • Web Title:pride of charity excerpts from social media