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Mother's Day 2019: मां है तो सब मुमकिन है, जानें ऐसी ही मांओं के बारे में

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मां यानी हमारी जिंदगी का आधार, हमारी सबसे बड़ी ताकत। मुश्किल चाहे छोटी हो या बड़ी सबसे पहले मां का नाम ही जुबान पर आता है। यकीन होता है कि मां है ना... सब संभाल लेगी। उसका त्याग, समर्पण और मार्गदर्शन हर बाधा को दूर कर देगा। इस मातृ दिवस के मौके पर आइये जानें ऐसी कुछ मांओं के बारे में जो मुश्किल समय में बच्चों के साथ डटकर खड़ी रहीं और उन्हें नए मुकाम पर पहुंचाया। पहले जान लेते हैं कि यह दिन इतना खास क्यों है...

इसलिए खास है आज का दिन
बच्चों के लिएपूरा जीवन समर्पित कर देने वाली मां के सम्मान में मई माह के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाता है। एक दिन मां के नाम करने की अपील 1908 में अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्ता एना जार्विस ने की थी। 9 मई 1914 को अमेरिका में इसके लिए बाकायदा कानून बना और धीरे-धीरे पूरी दुनिया ने इसे अपना लिया।

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रांचीः धमिकयों का डटकर सामना करना सिखाया
चार वर्ष की थी, जब मेरा दाखिला डोरंडा गर्ल्स मिडिल स्कूल (बांग्ला स्कूल) रांची में कराया गया। वहां योग की कक्षाएं चलती थीं। योग प्रशिक्षक सुशांतो भट्टाचार्य बच्चों को योग सिखाते थे। मेरा मन भी योग सीखने को करता था। सुशांतो भट्टाचार्य ने यह भांप लिया। एक दिन उन्होंने मुझसे मेरा नाम पूछा और जवाब में ‘राफिया नाज' सुनकर बोले अपने पिताजी को साथ लेकर आना, फिर सिखाऊंगा।

एक छोटी बच्ची की जिद पर मेरे माता-पिता मुझे सुशांतो भट्टाचार्य के घर लेकर गए और योग सिखाने का आग्रह किया। परेशानी तब शुरू हुई, जब पहली बार अपने योग गुरु के साथ चाईबासा में स्टेट योग चैम्पियनशिप में हिस्सा लिया। 2014-15 में सोशल साइट पर मुझे गालियां मिलने लगीं। मुझे ट्रोल किया जाने लगा। मेरा फेक अकाउंट बनाकर मुझे अपमानित और बदनाम किया जाने लगा। मेरी मां जमीला खातून जो पहले इदरिसिया हाई स्कूल रांची में शिक्षिका थीं, उन्होंने हमारी परवरिश के लिए नौकरी छोड़ दी थी। उस मुश्किल घड़ी में मां मेरे साथ चट्टान की तरह खड़ी रही।

हिम्मत दी
जब सोशल साइट पर मेरा फेक अकाउंट बना कर बदनाम किया जा रहा था तब मां ने कहा था तुमने कुछ गलत नहीं किया है। ऊपरवाला सबका रक्षक है। योग का संदेश संयमित जीवनचर्या है, इससे किसी का धर्म प्रभावित कैसे हो सकता है।

सपना पूरा कर सकूं
मां की प्रेरणा से ‘योगा बियॉन्ड रिलिजन' संस्था चला रही हूं। 2015 में मुझे अखिल भारतीय योग सम्मेलन में ‘योग प्रभा सम्मान' मिला। जम्मू कश्मीर में ‘योग प्रमोटर' का खिताब दिया गया। मां का सपना है कि मैं प्रोफेसर बनूं और समाज की संकीर्ण सोच बदलने को युवा मन को तैयार करूं।
(प्रस्तुति : श्रेयसी मिश्रा)

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बागेश्वरः बड़ी-बड़ी डिग्री वाले नहीं दे सकते मां जैसी शिक्षा

मैंने अपने पापा को नहीं देखा। छह महीने की थी जब वह दुनिया से चले गए। मेरी दीदी भी महज दो साल की थीं। पापा के न होने की टीस हम दोनों में आज भी है। अधिकांश बच्चों को स्कूल से लेने उनके पापा आते थे। तब हम रोज उनकी कमी महसूस करते थे। लेकिन ऐसे वक्त से मां ने हमें बाहर निकाला और आगे बढ़ना सिखाया। यह कहना है बागेश्वर की मेजर प्रिया पालनी का।

मेजर प्रिया अभी कोलकाता में तैनात हैं और उनकी बड़ी बहन सोनाली बागेश्वर में ही एक एनजीओ से जुड़कर दिव्यांग बच्चों के लिए भविष्य की राह तैयार कर रही हैं। प्रिया के पिता नंदन सिंह असम राइफल्स में थे और अल्पायु में वह दुनिया छोड़ गए।

फोन पर हुई बातचीत में प्रिया ने कहा, हमारी तो दुनिया ही मां है। वह कहती हैं कि बच्चा अपने पिता की अंगुली पकड़कर चलना सीखता है लेकिन हमारे लिए तो यह फर्ज भी मां मालती ने ही निभाया। आज पीछे मुड़कर बचपन को देखती हूं तो एहसास होता है कि मां ने तो कुछ पता ही नहीं चलने दिया। मेरी मां आठवीं पास हैं। इसके बावजूद जीवन का जो सबक उन्होंने हमें दिया वह डिग्री रखने वाले नहीं दे सकते। कोर्स की किताबें तो उसने हमें नहीं पढ़ाई लेकिन संघर्ष से शिखर तक पहुंचने का रास्ता दिखाया। उसी के बताए रास्ते पर चलकर मैं देश के काम आने लायक बनी हूं। उसी के बताए रास्ते पर चलकर आज मेरे दीदी दूसरे बच्चों के लिए जीवन की नई राह तैयार कर रही है।

पेंशन के लिए लड़ाई लड़ी
मालती देवी को पति की मौत के बाद पेंशन के लिए भी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। अधिवक्ता गोविंद सिंह भंडारी बताते हैं कि कुछ कारणों से शुरुआत में उन्हें पूरी पेंशन नहीं मिल पा रही थी। ऐसे में उन्होंने कानून की मदद ली। पांच साल के बाद अदालत का फैसला उनके पक्ष में आया।
(प्रस्तुति : देवेंद्र पांडे)

लखनऊः मानसिक अशक्त बच्चों का सहारा बनीं कुसुम
बच्चों का दर्द अपने आंचल में समेट कितना कुछ करती है मां। अपनी आंख के तारों के लिए दुख तकलीफों को सहन कर उनको आगे बढ़ाती है मां।

राजधानी के निरालानगर की रहने वाली कुसुम कमल जिन्होंने साल 2004 में बेटी वैष्णवी को जन्म दिया । जन्म के बाद पताचला कि उनकी बेटी मानसिक रूप से अशक्त है ऐसे में समाज ने बेटी को छोड़ने को कहा पर अपनी हिम्मत और ममता के कारण उन्होंने बेटी को पाला और आज उनकी बेटी की स्थिति पहले से बेहतर है। उन्होंने बताया कि शायद अगर मैं तब बेटी को छोड़ देती पर शायद तब मेरी बेटी संग मैं भी खत्म हो जाती। आज मैंने प्यार से उसको पाला है। इसके साथ मैंने 2012 में ठान लिया कि मैं वैष्णवी जैसे अन्य बच्चों को परवरिश दूंगी और मैंने संस्था शुरू की। जिसमें आज 300 मानसिक अशक्त बच्चों की परवरिश कर रही हूं जो मुझको मां बुलाते हैं। (निसं)

नई दिल्लीः हताशा से उबार जीने का हौसला दिया
एक मां ने मुझे जन्म दिया तो दूसरी मां (वीना) ने पाल पोसकर नई जिंदगी जीने की प्रेरणा दी। हताश और निराश जिंदगी में खुशियों के रंग भरके मां ने मुझे जीना सिखाया। कोई सगी मां भी अपनी बेटी के लिए यह कष्ट सहन नहीं कर सकती है जो मुझे गोद लेने वाली मां ने सहन किए। यह कहना है एसिड अटैक पीड़िता मोहिनी गौरव कुमार का।

तीन साल तक दुनिया से रही दूर: गीता कॉलोनी निवासी मोहिनी बताती है कि एसिड अटैक के बाद से वह दुनिया से तीन साल के लिए पूरी तरह से कट गई थी। बस अस्पताल और घर के बीच के सफर के बारे में उन्हें जानकारी रहती थी।

रो-रोकर मां का था बुरा हाल : हर कोई मां से मुझे छोड़ देने की बात कहने लगा था। यह सुनकर मां का रो-रोकर बुरा हाल हो जाता था। पापा ने छोटे भाई से मुझे गोद लिया था। जिनके भविष्य की उम्मीदों का सहारा सिर्फ मैं थी।

तेजाब फेंका था :मोहिनी के ऊपर 2005 में एसिड हमला हुआ था। जब जयपुर जाने के लिए निकलीं थीं।

इन शब्दों ने दी ताकत
मां ने विपरीत परिस्थितियों का डटकर सामना किया। वह मुझसे बस यहीं शब्द कहती थीं कि बेटा हार नहीं माननी है। जब तक तेरी मां जिंदा है तुझे किसी बात की चिंता करने की जरूरत नहीं है। जिंदगी जीने की नई ऊर्जा मां ने मेरे अंदर पैदा की। जिसकी बदौलत आज दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में सरकारी नौकरी कर रही हूं। 
(प्रस्तुति : ललित कौशिक)

रुद्रपुरः मनोज को मजदूरी के पैसे से दिलाया पहला बैडमिंटन
मां का हौसला गजब का था। हार न मानने की जिद और विपरीत परिस्थितियों में ‘एकलव्य' की तरह हौसले से पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन जैसी कई खूबियां थीं मेरी मां में। मां के हौसले के दम पर मैंने खेल को जारी रखा और बेहतर प्रदर्शन करते हुए ‘अर्जुन' पुरस्कार हासिल किया। यह बात अर्जुन अवार्डी मनोज सरकार ने कही।

आदर्श बंगाली कालोनी निवासी मनोज सरकार का बचपन बेहद गरीबी में बीता। उनकी मां जमुना सरकार बीड़ी बनाने और मटर तोड़ने का काम करती थीं। आर्थिक तंगी में दिन गुजरे लेकिन मां ने खुद के साथ ही परिवार का हौसला कम न होने दिया। सरकार ने बताया कि उनकी ज्वाइंट फैमिली थी तो एक बार चचेरे भाइयों के लिए रैकेट लाया गया था। जब उन्हें रैकेट नहीं मिला तो वह रूठ गए लेकिन मां ने अपनी मजदूरी से 10 रुपये दिए और कहा ले आ रैकेट। इसके बाद मैंने एक सेकेंड हैंड रैकेट खरीदा। वहीं से बैडमिंटन से जुड़ाव हो गया।

गलत उपचार से दिव्यांग हुए : मनोज के भाई मनमोहन सरकार ने बताया कि जब उनके बड़े भाई मनोज डेढ़ साल के थे तो उन्हें तेज बुखार आया था। गलत दवा खाने के बाद से उसके एक पैर में कमजोरी आ गई थी।

शुक्र हैं, मां के साथ साझा किया अर्जुन अवार्ड: कनाडा में एक प्रतियोगिता में प्रतिभाग कर रहे मनोज ने बताया कि उनकी मां का कहना था कि मेहनत के दम पर अच्छे खिलाड़ी तो बन जाओगे लेकिन हमेशा एक अच्छे इंसान भी बने रहना। उन्होंने बताया कि जब उन्हें अर्जुन अवार्ड मिला तो उन्होंने अपनी मां के साथ साझा किया तो उनकी आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े। मनोज ने बताया कि अगर ओलंपिक में उनका चयन होता है तो वह देश के लिए तो जरूर खेलेंगे ही लेकिन इससे पहले वह ओलंपिक मां के लिए खेलेंगे।

मां के जाने के बाद घर हुआ सूना : मनोज के मुताबिक, मां के देहांत के बाद से उन्हें घर की इच्छा भी कम ही रहती है। मां के देहांत के बाद दुबई में आयोजित प्रतियोगिता में भाग लिया।
(प्रस्तुति : राहुल जोशी)

मुजफ्फरपुरः मेरी मां तो सुपरहीरो है- प्रतिभा प्रिया
दो बहनें हैं हम। सबसे पहली चुनौती तो यही थी हमारे सामने। ना जाने कितनी बार लोगों को मां से यह कहते हुए सुना कि बेटा नहीं है। 23 साल की उम्र तक समाज की यह संकीर्ण सोच हमारे सामने ना जाने कितनी बार आई। मेरा बैडमिंटन खेलना। 3 हजार रुपये की मासिक आय में हमारी पढ़ाई-लिखाई से लेकर हमारी जरूरत का ध्यान रखना।

मैं आज तक यह समझ ही नहीं पाई कि मां तुम ये सब कैसे कर लेती हो। राष्ट्रीय स्तर की बैडमिंटन खिलाड़ी और वर्तमान में दिल्ली में फिटनेस ट्रेनर के रूप में कार्यरत प्रतिभा प्रिया कहती है कि मां हमारी हीरो है। सोसाइटी की रूढ़िवादी सोच के खिलाफ जाकर उन्होंने हमें आगे बढ़ने की हिम्मत दी। एमडीडीएम कॉलेज में हॉस्टल केयर टेकर के रूप में काम करते हुए उन्होंने हमें आगे बढ़ने की आजादी और हिम्मत दोनों दी।
(प्रस्तुति : अनामिका)

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