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क्या आप जानते हैं कि जीत के आगे क्या है

कहते हैं कि डर के आगे जीत है, पर जीत के आगे क्या है? सफलता छोटी हो या बड़ी, खुशी देती है, आगे के लिए नया जोश भर देती है। बधाइयां मिलती हैं, जश्न मनाया जाता है, मान-सम्मान भी बढ़ता है। पर जीत इतनी ही तो नहीं होती। सफलता उनको दोहराती है, जो दिल भी जीतते हुए बढ़ते हैं।

‘आखिरी प्वॉइंट पूरा होते ही हम दोस्त हो जाते हैं। दूसरे खिलाड़ी को गले लगाते हैं और कहते हैं, तुम अच्छा खेले। इतना ही। इसके आगे कोई लड़ाई नहीं।' अपने विरोधी खिलाड़ी के लिए टेनिस के नंबर एक खिलाड़ी नोवाक जोकोविच इसी अंदाज में पेश आना चाहते हैं।

यूं जीत के बाद ऐसी ही बड़ी बातें सुनने को मिलती हैं। पर हारने वाले के लिए ऐसी उदारता बरतने वाले नायक कम ही मिलते हैं। हालत तो यह है कि एक मामूली-सी बहस के बाद मुस्कराना तक मुश्किल हो जाता है। छोटी-सी सफलता भी सिर पर बहुत जल्दी चढ़ जाती है।

दुनिया को बेहतर बनाने के लिए हर किसी के लिए रखें करुणा

दूसरे विश्वयुद्ध के समय इंग्लैंड के प्रधानमंत्री विन्सटन चर्चिल का मशहूर कथन है, ‘युद्ध में संकल्प। हार में दृढ़ता और जीत में उदारता।' चर्चिल की इसी बात को आधार बनाते हुए 2003 में इराक-युद्ध से पहले ब्रिटिश सैन्य अधिकारी टिम कॉलिन ने सैनिकों को जो कहा था, उसकी खूब तारीफ हुई। अपने उस विशेष संबोधन में उन्होंने सैनिकों से एक ओर आक्रामक तो दूसरी ओर विरोधियों के हारने या मृत्यु पर उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार करने की नसीहत दी।

यह सच है कि जीत के क्षणों में संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होता। जीत के साथ आया उन्माद, अहंकार, लापरवाही और रूखापन, विरोधियों को ही नहीं, कई बार अपनों को भी दूर ले जाते हैं। पर महान लोग ऐसी गलतियां नहीं करते। बड़े दिलवाले जीत का जश्न भी सलीके से मनाते हैं। यूं भी विरोधियों की खिल्ली उड़ाते रहना, उन पर निजी हमले करना या उन्मादी हो जाना हमारी जीत को छोटा कर देता है। हम अपनी ऊर्जा फिजूल कामों में खर्च करने लगते हैं।

जब लक्ष्य बड़े हों 

सफलता को पचा पाना आसान नहीं होता। अपने बूते सफल हुए बिजनेसमैन स्कोलार्डी कहते हैं, ‘हम उठे हुए कदम को देर तक हवा में नहीं रोक सकते। आगे बढ़ने के लिए खुद को धक्का देते रहना पड़ता है। नहीं तो हम जल्दी ही दिशा भटकने लगते हैं।' जीत का सिलसिला चलता रहे इसके लिए उस जज्बे, जोश और समर्पण को जिंदा रखना जरूरी होता है, जो सफल होने से पहले हमारे भीतर था। उन लोगों का साथ बनाए रखना होता है, जो शुरू से ही साथ रहे हैं। आचार्य महाप्रज्ञ ने कहा है, ‘फूल खिलना बंद हो जाते हैं, जब हम जड़ों की सिंचाई करना छोड़ देते हैं। हमारी जड़ों का दायरा जितना सीमित होता है, वृक्ष का फैलाव उतना ही सिमट जाता है।' 

सोशल मीडिया सेः दान का घमंड

घर, ऑफिस, खेल या राजनीति, बड़ी सफलता हासिल करने के लिए हमें उन लोगों को भी साथ लेकर चलना होता है, जो हमारे विरोधी होते हैं, जिनके साथ हमारी नहीं बनती। मैनेजमेंट की कक्षा में यह सबक सिखाया जाता है कि आपको कभी भी, कहीं भी दोस्त की जरूरत हो सकती है। और यह दोस्त आपको अपने विरोधी में भी मिल सकता है।

यह सही है कि हर कोई आपकी तरक्की से खुश नहीं होता। आपको पीछे करने के लिए विरोधी भी जुटे रहते हैं। पर उसके बाद भी सबको साथ लेकर ही बड़े लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है। यूं भी हार और जीत नजरिये की ही बात है। लगातार सीखने वाले के लिए कोई भी क्षण हार का क्षण नहीं होता। बुद्ध और महावीर के दर्शन में जहां किसी भी वैर की गांठ को देर तक पकड़े रहने की मनाही है, वहीं गांधी, विकास को अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक पहुंचाने की वकालत करते हैं। फिर आपसी मनमुटावों को भुलाकर अंत में विरोधी से भी हाथ मिलाना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि मजबूती है। और हमें अपने नायक मजबूत और उदार ही अच्छे लगते हैं।

बड़े दिल वाले बाजीगर

1. जीत का श्रेय साथ काम करने वालों को देते हैं। उनके साथ अपनी खुशी बांटते हैं।

2. जीत के बाद विनम्र हो जाते हैं। आक्रामक या उग्र नहीं होते। 'अपने लिए पहले से बड़े लक्ष्य तय करते हैं। ऐसे लक्ष्य और कामों पर भी ध्यान देते हैं, जिनमें दूसरों का भी फायदा हो।

3. पहले से अधिक मेहनत करने के लिए तैयार रहते हैं। अपनी सीमाओं का विस्तार करते हैं और कमजोर पक्षों को सुधारते हैं।

4. सही आलोचना करने वालों पर ध्यान देते हैं। बुरी सोच रखने वालों पर अपनी ऊर्जा खर्च नहीं करते।

5. जीत के बाद विरोधियों की अच्छी बातों की तारीफ करते हैं। उनके साथ मिलकर काम करने की भी इच्छा जाहिर करते हैं। - पूनम जैन

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