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30 जून, 2020|6:53|IST

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Covid-19:खून में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाने से बचेगी मरीजों की जान, शोध में दावा

corona investigation of 54 including four doctors negative in amroha

कोरोना के खिलाफ जंग में उम्मीद की एक नई किरण जगी है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी दवा के क्लीनिकल परीक्षण की तैयारियां तेज कर दी हैं, जो खून में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाने में सक्षम है। 

कोशिकाओं को नहीं मिलती पर्याप्त ऊर्जा-
दरअसल, दुनियाभर में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की जान जाने की एक बड़ी वजह खून में ऑक्सीजन का स्तर गिरना भी है। ऑक्सीजन की कमी से कोशिकाओं को पर्याप्त मात्रा में ऊर्जा नहीं मिल पाती और वे दम तोड़ने लगती हैं। इससे अंग खराब होने से मरीज की मौत का खतरा बढ़ जाता है।

फेफड़ों में रक्त का प्रवाह बिगड़ जाता है-
-यही नहीं, आमतौर पर जब फेफड़े के एक हिस्से में ऑक्सीजन का स्तर बहुत कम हो जाता है तो वहां की नसें सिकुड़ने से खून का प्रवाह उस भाग में होने लगता है, जहां ऑक्सीजन ठीक मात्रा में मौजूद है। हालांकि, ऑक्सफोर्ड के शोध में कोरोना से जूझ रहे मरीजों में यह प्रक्रिया अव्यवस्थित होने की बात सामने आई है।

संक्रमित हिस्सों में अत्यधिक प्रसार-
शोधकर्ताओं के मुताबिक कोरोना पीड़ितों में खून का अधिकतर प्रवाह संक्रमित हिस्सों में होता है, जहां ऑक्सीजन बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है। यह फेफड़ों के स्वस्थ हिस्सों में नहीं बहता, जहां ऑक्सीजन अच्छी मात्रा में मौजूद है। इसका अर्थ यह है कि फेफड़ों में ज्यादातर रक्त बिना ऑक्सीजन लिए ही बहने लगता है।

दवा से नसों को सिकोड़ने की योजना-
शोध दल में शामिल प्रोफेसर पीटर रॉबिंस ने बताया कि फ्रांस में विकसित ‘एलमिट्राइन बाइस्मेसिलेट’ नाम की दवा फेफड़े के संक्रमित हिस्सों में बिछे नसों के जाल को सिकोड़ने का काम करेगी। इससे खून का प्रवाह फेफड़े के स्वस्थ भाग की तरफ मुड़ेगा, जहां से उसे पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन मिलना संभव होगा।

गंभीर श्वासरोग के इलाज में कारगर-
‘एलमिट्राइन बाइस्मेसिलेट’ ऑक्सीजन की पहचान करने वाली शारीरिक प्रणाली को सक्रिय बनाती है। एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (एआरडीएस) के इलाज में इसे खासा मददगार पाया गया है। क्लीनिकल परीक्षण के दौरान यह देखा जाएगा कि क्या एआरडीएस की तरह यह कोरोना संक्रमितों के खून में भी ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाने में सक्षम है। 

वेंटिलेटर के सहारे की नहीं पड़ेगी जरूरत-
मौजूदा समय में ‌वि‌श्वभर के अस्पताल संक्रमितों के खून में ऑक्सीजन का स्तर बनाए रखने और श्वास प्रणाली को सहारा देने के लिए सहायक थेरेपी का सहारा ले रहे। इनमें कृत्रिम ऑक्सीजन की आपूर्ति करना और मरीज को वेंटिलेटर पर रखना शामिल है। हालांकि, ‘एलमिट्राइन बाइस्मेसिलेट’ के सकारात्मक नतीजे मिलने पर इन दोनों की ही जरूरत नहीं पड़ेगी।

दो चरणों में परीक्षण-
-पहला चरण : जिन संक्रमितों की श्वास प्रणाली को सहारा देने की जरूरत होगी, उन्हें दवा की एक खुराक देकर देखा जाएगा कि खून में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ रहा है या नहीं
-दूसरा चरण : इसके तहत मरीजों को सात दिन तक ‘एलमिट्राइन बाइस्मेसिलेट’ खिलाकर जांचा जाएगा कि उनमें कृत्रिम ऑक्सीजन और वेंटिलेटर की जरूरत कम होती है या नहीं 

आठ महीने में मिलेंगे नतीजे-
-3 महीने में ब्रिटेन में ‘एलमिट्राइन बाइस्मेसिलेट’ का उत्पादन होने लगेगा
-1 महीने में पहले चरण तो चार महीने में दूसरे चरण का परीक्षण पूरा होगा

खून में कितना जरूरी ऑक्सीजन -
-97% के करीब आंका गया मानव रक्त में ऑक्सीजन का सामान्य स्तर
-90% से नीचे जाना घातक, मस्तिष्क को नहीं मिलती पर्याप्त ऑक्सीजन
-80% के स्तर पर पहुंचने से शरीर के प्रमुख अंगों के खराब होने का खतरा 
-50% से 70% के बीच आ जाता है कोरोना संक्रमितों के खून में ऑक्सीजन का स्तर
-60 वर्ष से कम उम्र के मरीजों को वेंटिलेटर/कृत्रिम ऑक्सीजन के जरिये बचाना संभव

‘साइटोकिन स्टॉर्म’ भी चिंता का सबब-
-नए तरह के विषाणु को नष्ट करने की जद्दोजहद में प्रतिरोधक तंत्र कई बार अतिसक्रिय हो जाता है और स्वस्थ कोशिकाओं पर ही हमला करने लगता है। वैज्ञानिक भाषा में इस अवस्था को ‘साइटोकिन स्टॉर्म’ कहते हैं। इससे शरीर को हमलावर वायरस से कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। अंग खराब होने से मरीज की जान तक जा सकती है। 

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  • Web Title:Covid-19: research claims Increasing oxygen levels in blood will save corona patients lives