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लाइफस्टाइलकोरोना से उबरे लोगों को वर्षों तक वायरस से सुरक्षित रखती है पहली खुराक

एजेंसियां,वाशिंगटनPublished By: Manju Mamgain
Tue, 01 Jun 2021 09:02 AM
कोरोना से उबरे लोगों को वर्षों तक वायरस से सुरक्षित रखती है पहली खुराक

कोरोना से बचाव में कारगर टीके उम्मीदों पर खरे उतरे हैं। जिन देशों में बड़े पैमाने पर टीकाकरण हुआ है, वहां सार्स-कोव-2 वायरस के कहर पर बहुत हद तक काबू पाने में मदद मिली है। अब एक नए अध्ययन से पता चला है कि कोरोना से उबरे लोगों में टीके का असर कई वर्षों तक बना रह सकता है। यही नहीं, वैक्सीन की महज एक खुराक भी उनमें वायरस के अलग-अलग स्वरूपों से लड़ने की पर्याप्त क्षमता पैदा करने में असरदार है।

न्यूयॉर्क स्थित रॉकफेलर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के मुताबिक इंसान का प्रतिरोधक तंत्र वैक्सीन और मूल संक्रमण को लेकर अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया देता है। जो लोग कोरोना वायरस को मात देने के बाद टीका लगवाते हैं, उनके अस्थिमज्जा (बोन मैरो) में बेहद ताकतवर ‘मेमोरी सेल’ विकसित हो जाती हैं। ये कोशिकाएं वायरस के दोबारा हमला करने की सूरत में प्रतिरोधक तंत्र को जरूरी एंटीबॉडी का उत्पादन करने का संदेश देती हैं। 

खास बात यह है कि संक्रमण से उबरे लोगों में वैक्सीन से बनी ‘मेमोरी सेल’ सार्स-कोव-2 वायरस के नए स्वरूपों से भी सुरक्षा मुहैया कराती हैं। इनके लंबे समय तक सक्रिय अवस्था में रहने के लिए ‘बूस्टर डोज’ यानी टीके की दूसरी खुराक लगवाने की जरूरत भी नहीं पड़ती है। हालांकि, जो लोग कभी कोविड-19 की चपेट में नहीं आए हैं, अगर वे चाहते हैं कि वायरस के मौजूदा और नए, दोनों ही स्वरूपों से सुरक्षित रहें तो उनके लिए पूर्ण खुराक लेना बेहतर रहेगा।

टीके से काबू में आएगी महामारी
मुख्य शोधकर्ता मिशेल न्यूसेंजवेज के मुताबिक नया अध्ययन उन आशंकाओं पर विराम लगाता है, जिनमें कहा गया है कि वैक्सीन से पनपा सुरक्षा कवच कुछ समय में नष्ट हो जाएगा और महामारी एक बार फिर विकराल रूप अख्तियार कर लेगी। उन्होंने कहा कि सार्स-कोव-2 वायरस बहुत खतरनाक है। इसके नए स्वरूप तो और भी ज्यादा संक्रामक हैं। लेकिन वैक्सीन के रूप में इंसान के हाथ एक बेहद कारगर हथियार भी लग चुका है। यह ‘मेमोरी सेल’ को वायरस का जेनेटिक डाटा याद रखने और भविष्य में होने वाले हमलों से निपटने में सक्षम बनाता है।

संक्रमण सुरक्षा की गारंटी नहीं
न्यूसेंजवेज ने स्पष्ट किया कि कोरोना टीकाकरण सभी के लिए जरूरी है। संक्रमण का शिकार हो चुके लोगों को इस मुगालते में नहीं जीना चाहिए कि उन पर भविष्य में वायरस के हमले का कोई असर नहीं होगा। हां, वे चाहें तो ‘बूस्टर डोज’ को जरूर नजरअंदाज कर सकते हैं। न्यूसेंजवेज के अनुसार उनकी टीम अब इस बात का पता लगाने की कोशिशों में जुट गई है कि कोविड-19 से महफूज रहने के लिए कितनी मात्रा में एंटीबॉडी की जरूरत है। इससे मालूम चलेगा कि कोई व्यक्ति संक्रमण के प्रति कितना संवेदनशील है। यही नहीं, बेहतर ‘बूस्टर डोज’ भी बनाई जा सकेगी।

पहले भी मिले संकेत
1.‘बूस्टर डोज’ साबित होती है पहली खुराक

मार्च में प्रकाशित आइकैन स्कूल ऑफ मेडिसिन (अमेरिका) के अध्ययन में दावा किया गया था कि ‘एम-आरएनए’ आधारित कोविड-19 वैक्सीन की पहली खुराक उन मरीजों में ‘बूस्टर डोज’ का काम करती है, जो कोरोना संक्रमण को मात दे चुके हैं और उनमें वायरस के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता बनी हुई है। ऐसे में इन मरीजों को दूसरी खुराक लगाना जरूरी नहीं है।

2.दोनों खुराक जितने एंटीबॉडी पैदा होते हैं
सिनाई मेडिकल सेंटर (लॉस एंजिलिस) में एक हजार स्वास्थ्यकर्मियों को फाइजर और मॉडर्ना की ओर से विकसित टीके लगाए गए। शोधकर्ताओं ने देखा कि कोरोना से उबरे प्रतिभागियों में पहली खुराक के बाद एंटीबॉडी का स्तर उन लोगों के बराबर पहुंच गया, जिनके कोरोना की जद में आने का कोई इतिहास नहीं था और जिन्हें वैक्सीन की दोनों खुराक लगाई गई थी। 

3.स्वस्थ लोगों से बेहतर प्रतिरोधक क्षमता मिली
‘न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन’ में हाल ही में प्रकाशित एक इतालवी अध्ययन में दावा किया गया है कि जो लोग सार्स-कोव-2 वायरस की जद में आ चुके हैं, उनमें टीके की पहली खुराक मात्र से ही ऐसे लाभार्थियों से कहीं बेहतर प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है, जिनका संक्रमण से कभी सामना नहीं हुआ है और उन्हें वैक्सीन की दोनों खुराक भी लगाई जा चुकी है।

एम-आरएनए टीके का कमाल
‘एम-आरएनए’ पर आधारित वैक्सीन में वायरस के कमजोर या निष्क्रिय रूप की अनुवांशिक सामग्री मिलाई जाती है। यह सामग्री मानव शरीर में स्पाइक प्रोटीन का उत्पादन सुनिश्चित करती है। स्पाइक प्रोटीन सार्स-कोव-2 वायरस को मानव कोशिकाओं पर हमला करने में सक्षम बनाता है। इसके संपर्क में आकर प्रतिरोधक तंत्र वायरस की पहचान करने और उससे लड़ने वाले एंटीबॉडी पैदा करने की कला सीख पाता है।

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