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कोरोना काल में बढ़े कन्वर्जन डिसऑर्डर के मामले, जानें क्या है ये रोग और इसके लक्षण

हिन्दुस्तान टीम,नई दिल्लीPublished By: Manju Mamgain
Thu, 17 Jun 2021 09:26 AM
कोरोना काल में बढ़े कन्वर्जन डिसऑर्डर के मामले, जानें क्या है ये रोग और इसके लक्षण

कोरोना काल में एक बात यह भी सामने आई है कि लोगों को दिक्कत कम हैं, लेकिन खुद को बीमार ज्यादा महसूस कर रहे हैं। बार-बार डॉक्टरों के यहां चक्कर लगा रहे हैं। फायदा न मिलने पर दूसरे डॉक्टर के पास जा रहे है। पर आप पहले जान तो लें कि आपको दिक्कत क्या है। दरअसल, यह एक ऐसी बीमारी है जिसकी पहचान आसान नहीं होती। इसे कन्वर्जन डिसऑर्डर कहते हैं। यह एक तरह से मनोवैज्ञानिक बीमारी है जिसका इलाज मनोचिकित्सक या मनोवैज्ञानिक ही कर सकते हैं। वेबजह परेशान न हों। आइए जानें कैसे होती है पहचान और क्या है बीमारी।
 
ऐसे पहचानें लक्षण
- यह एक ऐसी एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है जिसमें बीमारी के लक्षण न्यूरोलॉजिकल प्रतीत होते हैं।
- असामान्य चलना, कंपकंपी, अंधापन या दोहरी दृष्टि, बहरापन या सुनने में समस्या।
- संतुलन की हानि, गंध कम लगना, (एनोस्मिया), कमजोरी या पक्षाघात का अहसास।
- हाथ न उठना, सिर में दर्द, पेट में दर्द, कम दिखना आदि ।

रोसा टेस्ट से होती है इसकी पहचान
ऐसे रोगियों की पहचान के लिए रोसा टेस्ट कराया जाता है। इसमें क्लीनिकल और बीमारी से संबंधी प्रश्नों पर आधारित सवाल होते हैं। एक तरह से उस व्यक्ति के जीवन में झांकने की कोशिश होती है जिससे बीमारी का कारण यानी जवाब मिल जाता है। इसी पर आधारित इलाज किया जाता है। इलाज पूरी तरह मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग पर आधारित होता है।

दो माह में 48 फीसदी मामले सामने आए
कानपुर के साइकोलॉजिकल टेस्टिंग एंड काउंसिलिंग सेंटर (पीटीसीसी) में पिछले दो माह में गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्याओं से जुड़े जो मामले आए उनमें 133 में से करीब 64 (48 फीसदी) कन्वर्जन डिसऑर्डर से जुड़े हैं। सामान्य तौर ऐसे मामले बहुत कम आते हैं।

लोगों में अजब-गजब दिखी बीमारी
1. एक महिला का रात में सोते समय पेट फूल जाता था। उसका इलाज देश के बड़े अस्पतालों में हुआ लेकिन फायदा नहीं हुआ। पति-पत्नी के रिश्ते टूटने की कगार पर पहुंच गए। कानपुर पीटीसीसी में महिला का रोसा टेस्ट हुआ। उसे कन्वर्जन डिसऑर्डर निकला। रिश्तों में दरार पड़ने की वजह गैस या अन्य कोई बीमारी नहीं थी। महिला के डर ने उसे इस बीमारी का शिकार बना दिया था। 

2. कक्षा सात की एक बच्ची से जैसे ही पढ़ने को कहा जाता था उसका पेट दर्द होने लगता। पसीने से तर-बतर हो जाती। उसे डॉक्टरों को दिखाया गया, लेकिन फायदा नहीं हुआ। रोसा टेस्ट में पता चला कि उसने दो साल पहले मां-बाप से वादा किया था कि वह डॉक्टर बनेगी। मां-बाप भी वैसी ही अपेक्षाएं रखे थे पर पढ़ाई में वह कमजोर थी जिसने उसे इस बीमारी का शिकार बना दिया।

अगर कन्वर्जन डिसऑर्डर की पहचान हो जाए तो गंभीर बीमारी एक माह से अधिकतम छह माह में गायब हो जाती है। इस दौरान कोई दवा नहीं खाना पड़ती। बस मानसिक स्थिति को पूर्व की स्थिति में लाना होता है। कोरोना काल में डिप्रेशन और परिवार को एक दूसरे को समझने के लिए लंबे अवसर के कारण ही इसके मरीज बढ़े हैं।
-डॉ. एलके सिंह, निदेशक, साइकोलॉजिकल टेस्टिंग एंड काउंसिलिंग सेंटर

 

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