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जीवन शैली‘मौत की उम्र क्या है? दो पल भी नहीं!’ जीवन में कभी हार नहीं मानने देगी, अटल बिहारी वाजपेयी की यह प्रेरक कविता  

लाइव हिन्दुस्तान टीम ,नई दिल्ली Published By: Pratima Jaiswal
Fri, 25 Dec 2020 06:52 PM
‘मौत की उम्र क्या है? दो पल भी नहीं!’ जीवन में कभी हार नहीं मानने देगी, अटल बिहारी वाजपेयी की यह प्रेरक कविता  

इस दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो इस दुनिया को छोड़कर भी कहीं न कहीं हमारे आसपास ही रहते हैं। वे हमेशा हमारी स्मृतियों में जिंदा रहते हैं। आज ऐसी ही महान शख्सियत पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न स्व। अटल बिहारी वाजपेयी की 96वीं जयंती है। वाजपेयी एक सशक्त नेता होने के साथ महान लेखक और कवि भी थे। उनकी लिखी कविताएं जीवन के कई पहलुओं को बयां करती हैं। उनकी ऐसी ही कविता है ‘मौत से ठन गई’, जो विपरीत परिस्थितियों के बीच आत्मविश्वास के साथ खड़े रहने की प्रेरणा देती है। 

 

मौत से ठन गई
ठन गई!
मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यूं लगा जिंदगी से बड़ी हो गई।
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं।
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?
तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आजमा।
मौत से बेखबर, जिंदगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।
बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।
हर चुनौती से दो हाथ मैंने किए,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है।
पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ां का, तेवरी तन गई।
मौत से ठन गई। 
 

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