
समय के साथ बदला शादी का चलन, शादी करने से पहले खुद से पूछें ये 5 सवाल
शादी कैसे होगी? किससे होगी? कब होगी? जीवनसाथी चुनने का पैमाना क्या होगा? या शादी में समझौते किस हद तक किए जाएंगे? ये सभी फैसले महिलाएं अब खुद लेने लगी हैं। शादी की पूरी प्रक्रिया में आए इन बदलावों पर नजर डाल रही हैं वरिष्ठ पत्रकार क्षमा शर्मा
विवाह का मौसम है। चारों ओर जेवर, कपड़ों, कारों आदि की खरीदारी से लेकर तमाम तरह के होटल्स, बैंक्वेट हॉल्स, बस, रेल, हवाई जहाज आदि के टिकट की बुकिंग की होड़ लगी है। युवा हर तरह से अपनी शादी को यादगार बनाना चाहते हैं। कोई प्रियंका, अनुष्का और दीपिका की तरह डेस्टिनेशन वेडिंग करना चाहता है, तो किसी को राधिका मर्चेंट के लहंगे की नकल करनी है, किसी को आलिया भट्ट की शादी वाला जोड़ा चाहिए। शादी की जगह भी कुछ-कुछ ऐसी ही होनी चाहिए। अपने इन अरमानों को पूरा करने के लिए शादी के खर्चे निपटाने के लिए भारी-भरकम कर्ज लेने का रिवाज भी बढ़ा है।

शादी के फैसले में हमारा बढ़ता दखल
नब्बे के दशक के बाद, जिस तरह से भूमंडलीकरण का विस्तार हुआ, लड़कियों की शिक्षा, आत्मनिर्भरता और खुद निर्णय लेने की क्षमता बढ़ी, वैसे-वैसे विवाह में उनकी मर्जी और बाजार का दखल भी बढ़ता गया। सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि कहां तो लड़की बीस साल की होती थी, तो परिवार के लोग उसके विवाह के बारे में सोचने लगते थे, क्योंकि पहले विवाह का कुल मतलब पति और परिवार की देखभाल से लेकर संतान पैदा करना भर था। तीस की उम्र के बाद लड़कियों को संतान न पैदा करने की सलाह डॉक्टर्स भी देते थे। उसके मुकाबले आज बहुत कुछ बदल गया है। अब भारत में लड़कियों की शादी की न्यूनतम आयु को 18 से बढ़ाकर 21 करने का विधेयक प्रस्तावित है। पहली बात तो यह है कि महिलाओं का एक बड़ा वर्ग अपने फैसले खुद लेने लगा। वहीं, शादी-ब्याह जैसे मसलों में परिवार वाले लड़की की बातों को भी सुनने लगे हैं। अब विवाह लड़कियों के लिए, शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता के मुकाबले प्राथमिकता में पीछे है। पहले अच्छी नौकरी, फिर नौकरी से प्राप्त आर्थिक स्वतंत्रता का आनंद, घूमना-फिरना और फिर शायद शादी। पिछले दिनों ही एक खबर आई थी कि अपने देश में अकेली घूमने वाली लड़कियों की संख्या बहुत बढ़ी है।
बदल गया शादी का रूप
एक जमाने में शादियां नाते-रिश्तेदार ही तय करते थे। हर कुनबे में एक ऐसी बुआ जरूर हुआ करती थीं, जो इस काम में पारंगत थीं। जोड़ी मिलाने का यह काम अब मेट्रिमोनियल वेबसाइट्स करने लगी हैं। सिर्फ भारत में 1500 से ज्यादा ऐसी वेबसाइट्स हैं। इनके अलावा एप्स हैं। डेटिंग साइट्स हैं। प्रेम विवाह करने वाले जोड़े भी हैं ही। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल होने वाली शादियों में 10 से 15 प्रतिशत प्रेम विवाह होते हैं। हाल के वर्षों में लिव-इन का चलन भी बढ़ा है, जिसमें साथ रहकर, एक-दूसरे को देखने-परखने के बाद ही जोड़े शादी करने और जिंदगी साथ बिताने का निर्णय लेते हैं।
कानून और तकनीक ने दिए पंख
एक जमाने में नैतिकतावाद की जिस लाठी से लड़की को बिना कारण ही पीटा जाता था, वैसे मामले अब कम दिखने लगे हैं। इसका बड़ा कारण लड़कियों की शिक्षा, आत्मनिर्भरता, लोकतंत्र द्वारा दी गई शक्तियां तथा महिलाओं के पक्ष में बने तमाम कानून भी हैं। इसलिए शादी न चले, तो लड़कियां उससे दूर हो जाती हैं। बड़ी उम्र में विवाह किया और संतान की चाहत हुई, तो बहुत-सी नई तकनीक मौजूद हैं जैसे कि आईवीएफ, सरोगेसी आदि। बिना शादी किए भी महिला बच्चे को कानूनी रूप से गोद ले सकती है। यह प्रावधान पहले नहीं था। इसके अलावा अब एक्सेंचर इंडिया और वीवर्क इंडिया जैसी कंपनियां अपनी महिला कर्मचारियों को एग फ्रीज करवाने के लिए मेडिकल कवर भी मुहैया करवा रही हैं। एग फ्रीजिंग की मदद से वे जिस उम्र में भी चाहें, मां बन सकती हैं।
साथी चुनने में बढ़ा दखल
इस दौर की लड़कियों के लिए विवाह अब सात जन्मों का बंधन नहीं रहा। अब पहले की तरह बिना लड़की-लड़के की मुलाकात हुए शादी तो होती नहीं। पहले जहां लड़के-लड़कियों को पसंद करने का अधिकार रखते थे, अब वही अधिकार लड़कियों ने हासिल कर लिया है। लड़का पंसद नहीं आया, उसका वेतन कम है, उसका स्वभाव ठीक नहीं, उसका परिवार बड़ा है, वह कंजूस है, लड़की पर बहुत से बंधन लगाना चाहता है, जैसे मुद्दों पर पारंपरिक रूप से भारतीय लड़कियों को समझौते करने की सीख दी जाती रही है। आज की लड़कियां अब इन मुद्दों पर समझौता नहीं करतीं। शादी टूटने पर अब जिंदगी खत्म नहीं होती।
बदल रहे हैं अभिभावक भी
जब लड़के, लड़कियां एक-दूसरे को पसंद करते हैं, तो अब बहुत से माता-पिता भी उसमें अड़चन नहीं डालते। उनका कहना होता है कि जिंदगी तो इन्हें ही साथ बितानी है, तो हम बीच में क्यों बोलें। इसलिए मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग में जाति, धर्म, प्रदेश आदि की अवधारणाएं टूट रही हैं। कुछ दशक पहले तक लड़कों की तो ऐसी शादी करने को माता-पिता राजी हो जाते थे, लेकिन लड़कियों की नहीं। अब वह भी खत्म हो रहा है।
शादी कोई मजबूरी नहीं
इन दिनों यदि कोई संबंध नहीं चल पा रहा, तो युवा अब बेहतरी की आस में उसे नहीं ढोते। वे किसी बुरे संबंध में जीवन बिताने के मुकाबले जल्दी से जल्दी उससे निकलना सही मानते हैं। छोटे-छोटे मुद्दों पर भी तलाक लेने के मामले सामने आने लगे हैं। पूरी दुनिया में तलाक की तुलना में देखें तो भारत में यह दर महज एक प्रतिशत है। सच्चाई यह है कि आज के युवा अपने जीवन जीने के तरीके खुद चुन रहे हैं। उनके फैसलों को पुराने तौर-तरीकों के आधार पर सही-गलत नहीं कहा जा सकता।
अब लड़कियां भी रख रहीं शर्त
जब लड़कियों को अपना वर चुनने का अधिकार मिला है, तो उनकी शर्तें भी बढ़ती जा रही हैं। पिछले दिनों एक मित्र अपने बेटे के लिए लड़की ढ़ूंढ़ रहे थे। लड़के के पास अच्छी नौकरी है। हालांकि, जब वे लोग लड़की से मिलने गए, तो लड़की ने शादी से इसलिए मना कर दिया, क्योंकि लड़के के पास छोटी गाड़ी थी। लड़कियां आजकल बड़ी आसानी से शादी से पहले बड़ी गाड़ी, घर, अच्छी नौकरी, घर में दो-तीन घरेलू सहायक और ह्यलड़के के माता-पिता के साथ नहीं रहना हैह्ण, जैसी शर्तें रखनी लगी हैं।
वहीं महिलाओं का एक बड़ा तबका ऐसा भी है, जो शादी करना ही नहीं चाहता। मॉर्गन स्टेनली के एक सर्वे के मुताबिक 2030 तक भारत में 25 से 44 आयु वर्ग की 45 प्रतिशत महिलाएं सिंगल रहेंगी। बहुत से लड़के भी अब लड़कियों की तरह ही शादी से इनकार करने लगे हैं।
शादी के निर्णय से पहले खुद से पूछें ये 5 सवाल
-क्या मैं अपनी जिंदगी किसी और के साथ साझा करने के लिए भावानात्मक रूप से परिपक्व हूं?
-क्या मैंने उन लक्ष्यों को प्राप्त कर लिया है, जो मैंने खुद के लिए तय किए थे?
-क्या मैं आर्थिक रूप से स्वतंत्र हूं या आर्थिक आजादी की राह पर आगे बढ़ रही हूं?
-क्या शादी के साथ आने वाली जिम्मेदारियों के बारे में मैं वाकिफ हूं?
-मैं अपनी मर्जी से शादी कर रही हूं या फिर किसी तरह के दबाव में आकर यह फैसला ले रही हूं?

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Manju Mamgainलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




