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इस वजह से महिलाओं को छोड़नी पड़ती है नौकरी, काम करते हुए भी नहीं बन पातीं कामकाजी

हम चांद पर पहुंच चुके हैं। तरक्की के घूमते पहिए हमारी आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाते जा रहे हैं। पर, महिलाओं के स्थिति जस की तस है। वह कल भी घर में ठिठकी थीं और आज भी ऐसा करने को मजबूर हैं। क्यों बड़ी संख्या में कामकाजी महिलाओं को आज भी छोड़नी पड़ती है नौकरी, बता रही हैं दिव्यानी त्रिपाठी।

Manju Mamgain हिन्दुस्तानFri, 21 June 2024 03:36 PM
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किसी की बेटी, किसी की पत्नी, किसी की मां और किसी बड़ी कंपनी की सीईओ भी। जब से वह होश संभालती हैं, तब से तमाम बंदिशों के बावजूद खुले आसमान में उड़ना चाहती हैं। वह भी करियर बनाना चाहती हैं। खुद पर गर्व करना चाहती हैं। पर, क्या वास्तव में ऐसा होता है? क्या यह सच है कि वह अपने करियर को आगे बढ़ा पाती है? अब आप कहेंगी हां, बिल्कुल आज लड़कियां क्या नहीं कर रहीं। आसमान छू रही हैं। हर क्षेत्र में लड़कियों की भागीदारी है। यह सच है। पर, एक सच यह भी है कि ऐसी लड़कियों को हाथों की उंगलियों पर गिना जा सकता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि 73 फीसदी भारतीय महिलाएं मां बनने के बाद नौकरी छोड़ देती हैं, जबकि 50 प्रतिशत महिलाएं अपने बच्चों की देखभाल के लिए 30 साल की उम्र में इस्तीफा दे देती हैं। यानी उनके हिस्से आता है, सप्ताह के सात दिन और चौबीसों घंटे की जिम्मेदारी और उनका पद होता है, हाउस वाइफ। यकीनन इसमें कोई बुराई नहीं। पर, तब जब यह उन्होंने अपनी इच्छा से चुना हो। पर, अधिकांश महिलाएं स्वेच्छा से करियर के बीच में नौकरी छोड़ने का निर्णय नहीं लेती हैं। घर, परिवार, बच्चे और ऑफिस की जिम्मेदारियों के चक्रव्यूह में बुरी तरह दबने के बाद थक-हार कर वो ऐसा करने का निर्णय लेती हैं।

आंकड़े बताते हैं कहानी

हमारी अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। यह सुनकर खुशी होती है। अनुमान है कि साल 2030 तक भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है, जो केवल अमेरिका और चीन से पीछे होगी। हर साल लाखों भारतीय गरीबी से उबर रहे हैं। पर, क्या आप यह जानती हैं कि भारत की महिलाएं इस दौड़ में पीछे, पीछे और पीछे छूटती जा रही हैं। यानी महिलाएं अपने करियर की गाड़ी पर बीच में ब्रेक लगा दे रही हैं या लगाने पर मजबूर हो रही हैं। आंकड़े भी इस बात की तसदीक करते हैं। भारत के कार्यबल में महिलाओं का अनुपात लगातार घट रहा है। लगभग दो दशकों में भारत की महिला श्रम भागीदारी दर घटी है। 2005 तक जो दर 32 फीसदी थी, वह 2021 में घटकर 19 फीसदी पर पहुंच चुकी है। विश्व बैंक की मानें तो 2021 से हर पांच भारतीय महिला में से एक से भी कम कामकाजी है। वर्ष 2017 से 2022 के बीच 2.1 करोड़ महिलाओं ने स्थायी तौर पर नौकरी छोड़ दी। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की रिपोर्ट कहती है कि 2017 में अर्थव्यवस्था में उनकी मौजूदगी 46 फीसदी थी, जो कि 2022 में 40 फीसदी ही रह गई। सांख्यिकी मंत्रालय की मानें तो भारत में 263 पुरुष के मुकाबले केवल 61 महिलाएं ही रोजगार में हैं। ऐसा बिल्कुल भी नहीं कि महिलाएं काम नहीं करतीं या करना नहीं चाहतीं, पर हमारे देश में उनके हिस्से आता है अनौपचारिक, अवैतनिक काम। महिलाओं के करियर ग्राफ के नीचे गिरने के पीछे एक नहीं ढेरों कारण हैं। मुमकिन है कि हर महिला के करियर ब्रेक का कारण अलग हो, पर उसका नतीजा एक ही है।

पीछा नहीं छोड़ रही रूढ़िवादिता

हम हर रोज तरक्की कर रहे हैं। पर, महिलाओं के प्रति सोच में तरक्की को गति पकड़ने की जरूरत है। दुनिया भर में महिलाओं के लिए परिवार प्राथमिकता हो सकती है, लेकिन भारत में इसे परंपरा से जोड़ा जाता है। यकीनन, भारत में घर-परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियां महिला पर ज्यादा होती है, पर उन्हें त्याग और देखभाल का जिम्मा उठाने के लिए महिमामंडित करना कितना जायज है? जबकि पुरुष पारिवारिक जिम्मेदारियों का औसतन केवल दस फीसदी भार ही उठाते हैं, जो दुनिया में सबसे कम है। कभी बच्चों की देखभाल की जरूरत तो कभी परिवार के अन्य सदस्यों के प्रति महिला की जवाबदेही न चाहते हुए भी कामकाजी महिलाओं के पैरों को घर के भीतर रोक लेती है। अब आप सोचेंगी कि संयुक्त परिवार में रहना महिला के करियर को सहारा देता है? पर, आंकड़े इस बात से बिल्कुल भी इत्तेफाक नहीं रखते। संयुक्त परिवार में रहने वाली ग्रामीण महिलाओं की गैर कृषि रोजगार में भागीदारी दस फीसदी से भी कम है। इसके पीछे का मुख्य कारण यह है कि वह अपने फैसले खुद नहीं ले पातीं। जबकि इसके उलट चीन में संयुक्त परिवार में रहने वाली महिलाओं के कामकाजी होने की संभावना में वृद्धि हो जाती है। हमारे यहां महिला के लिए पेशेवर काम करने की तुलना में अवैतनिक घरेलू काम को वरीयता दी जाती है। यहां औरतें हर रोज लगभग चार घंटे बिना किसी वेतन के घरेलू काम करती हैं।

सुरक्षा है मसला

महिलाओं के प्रति अपराध भी कई बार उनके करियर पर अपनी कुदृष्टि डाल देता है। इनिशिएटिव फॉर व्हाट वक्र्स टू एडवांस वुमेन एंड गल्र्स इन द इकोनॉमी नाम के एक सर्वे की मानें तो जिन राज्यों में कामगार महिलाओं की भागीदारी कम है, वहां पर महिलाओं और लड़कियों से होने वाले अपराध की दर ज्यादा दर्ज की जाती है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की अनुसार 2011 से 2017 के बीच राज्य स्तरीय अपराध के आंकड़ों में बिहार और दिल्ली जैसे राज्यों में महिलाओं के खिलाफ अपराध में वृद्धि हुई हैऔर इसी बीच कामकाजी महिलाओं की संख्या में भी कमी दर्ज की गई है। यकीनन इस ओर गौर करने की आवश्यकता है।

जिम्मेदारियों का बोझ

घर, परिवार, बच्चे, बुजुर्ग... चाहे कोई भी जिम्मेदारी हो, उसका बोझ महिला के कंधों पर पुरुषों की तुलना में ज्यादा होता है। अध्ययन बताते हैं कि महिलाओं में घर-परिवार और काम से संबंधित चीजों की चिंता पुरुषों की तुलना में ज्यादा होती है। डॉ. कुमार कहते हैं कि काम और परिवारिक जिम्मेदारियों के बीच जीवन को संतुलित करने के कारण महिलाएं लगातार थका हुआ महसूस करती है। इसका असर उनकी शादीशुदा जिंदगी पर भी पड़ता है। 166 शादीशुदा जोड़ों पर किए गए एक अध्ययन के अनुसार महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक तनाव में रहती हैं। 22 साल से 55 साल की महिलाएं काम और घर की जिम्मेदारियों के बीच तालमेल बिठाने के चलते तनाव झेलती हैं। महिलाओं के तनाव के मामले में 21 देशों में से भारत अग्रणी है। जिसके नतीजे मधुमेह, अनिंद्रा, रक्तचाप व अवसाद के रूप में सामने आ रहे हैं।

उपयुक्त नौकरी का है अभाव

महिलाओं को घर पर ही नहीं, बल्कि कार्यक्षेत्र पर भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। अध्ययन बताते हैं कि महिलाएं पुरुषों के बराबर परिणाम देने के बावजूद वेतन, करियर ग्रोथ, बराबरी के मौकों के लिए आज भी संघर्ष करती नजर आती हैं। समान मौकों के अभाव के चलते उत्पन्न हुआ असंतोष कई बार करियर बे्रक का कारण बन जाता है। महिलाओं के काम को मापना भी कठिन है। महिला श्रम दर लगभग 20 फीसदी है, इसका मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि बची हुई 80 फीसदी महिलाएं काम नहीं कर रही हैं। हां, यह बात अलग है कि उनको उन कामों का श्रेय नहीं दिया जाता।

समृद्धि बन रही रोड़ा

‘हमारे पास सब कुछ तो है, तुम्हें नौकरी करने की क्या जरूरत?’ जैसे-जैसे पारिवारिक आय में इजाफा होता है, महिलाएं नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर होती जाती हैं। परिवार और कुछ हद तक महिलाएं भी ऐसा मानती हैं कि उन्हें परिवार की जरूरतों के हिसाब से नौकरी शुरू करना और छोड़ देना चाहिए। पर, यह भी यह सच है कि एक समय के बाद वही महिलाएं एक अलग तरह की हीन भावना को महसूस करती हैं। मनोचिकित्सक डॉ. उन्नित कुमार कहते हैं कि हमारे समाज में लड़कियों को छुटपन से दूसरों के बारे में सोचना सिखाया जाता है। खुद के बारे में सोचना उसे अपराध बोध महसूस कराता है। ऐसी धारणा आगे चलकर महिलाओं में कुंठा का कारण बन सकती है।

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