40 की उम्र और मेनोपॉज: खत्म नहीं, यहां से शुरू होता है असली रोमांस
'क्या मैं बदल गई हूं?', 'क्या मेरा रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा?', 'क्या अब रोमांस का मतलब कुछ और है?'। महिलाओं के खुद से किए जाने वाले इस तरह के सवालों के जवाब में मेनोपॉज कोच तमन्ना सिंह कहती हैं कि हां, प्यार भी बदलता है और यह बदलाव गलत नहीं, बल्कि जरूरी होता है।

40 की उम्र पार करते ही कई महिलाएं शारीरिक, मानसिक और रिलेशनशिप से जुड़े कई बदलाव एक साथ महसूस करने लगती हैं। ऐसा तब ज्यादातर मामलों में होता जब सवाल प्यार को लेकर किए जाते हैं- 'क्या मैं बदल गई हूं?', 'क्या मेरा रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा?', 'क्या अब रोमांस का मतलब कुछ और है?'। महिलाओं के खुद से किए जाने वाले इस तरह के सवालों के जवाब में मेनोपॉज कोच और मेनोवेदा की सह-संस्थापक तमन्ना सिंह कहती हैं कि एक अनुभवी हार्मोनल और मेनोपॉज कोच के रूप में मेरा जवाब साफ है- हां, प्यार भी बदलता है और यह बदलाव गलत नहीं, बल्कि जरूरी होता है। आइए जानते हैं आखिर क्या है वजह।
जब हार्मोन बदलने पर बदलने लगती हैं उम्मीदें
मेनोपॉज कोई बीमारी नहीं, बल्कि जीवन का एक जैविक चरण है। इस दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन में उतार-चढ़ाव आता है, जिसका असर महिला की ऊर्जा, मूड, नींद, आत्मविश्वास और यौन इच्छा पर पड़ सकता है। समस्या तब होती है जब हम खुद से या अपने रिश्ते से वही उम्मीदें लगाए रखते हैं, जो 25 या 30 की उम्र में थीं।
40 की उम्र के बाद क्या है रोमांस का सही मतलब?
40 की उम्र के बाद अब प्यार का मतलब हर समय 'एक्साइटमेंट' नहीं, बल्कि सुरक्षा, समझ और साझेदारी होता है। इस उम्र का रोमांस अक्सर शांत, गहरा और ज्यादा वास्तविक हो जाता है। यह सिर्फ शारीरिक नजदीकी नहीं, बल्कि भावनात्मक कनेक्शन, सम्मान और स्पेस का नाम भी बन जाता है। जिसमें-
-आपका पार्टनर आपके मूड स्विंग्स को जज नहीं करता
-जब 'आज नहीं' कहना अपराधबोध नहीं लाता
-जब साथ बैठकर चाय पीना भी काफी लगता है
महिलाएं क्यों खुद को दोष देती हैं?
तमन्ना सिंह कहती हैं कि हमारी सामाजिक कंडीशनिंग हमें सिखाती है कि प्यार में 'देना' जरूरी है- चाहे शरीर थका हो, मन भारी हो या हार्मोन असंतुलित हों। मेनोपॉज के दौरान कई महिलाएं खुद को 'कम आकर्षक' या 'कम चाहने योग्य' मानने लगती हैं। जबकि यह सबसे बड़ा मिथक है। इस बात को समझें कि आप कम नहीं हुई हैं बल्कि आप बदल रही हैं और बदलाव कमजोरी नहीं, विकास का संकेत होता है।
बातचीत- रिश्तों की नई कुंजी
मेनोपॉज से गुजर रही महिलाओं को तमन्ना सिंह रिश्ते को बचाने या बेहतर बनाने लिए पार्टनर से खुलकर बातचीत करने की सलाह देती हैं। उनका कहना है कि महिलाओं को अपने पार्टनर को बताना चाहिए कि आपके शरीर में क्या बदल रहा है, आपको किस चीज से थकान या चिड़चिड़ापन होता है, आपको पार्टनर से किस तरह का साथ चाहिए। 40 के उम्र के बाद की महिलाओं को समाधान से ज्यादा पार्टनर की समझ की जरूरत होती है। याद रखें, जब संवाद ईमानदार होता है, तो रिश्ते मजबूत होते हैं।
खुद से करें प्यार- सबसे जरूरी रिश्ता
मेनोपॉज महिलाओं को सबसे जरूरी सबक यह सिखाता है कि सेल्फ-लव कोई लग्जरी नहीं बल्कि हर व्यक्ति की जरूरत होती है। यह वह समय है जब आप पहली बार अपने शरीर की आवाज सच में सुनती हैं। पर्याप्त नींद, संतुलित पोषण, हल्की एक्सरसाइज और सबसे ज़रूरी खुद को 'ना' कहने की आजादी देना। जब आप खुद से जुड़ती हैं, तभी किसी और से गहराई से जुड़ पाती हैं।
सलाह
मेनोपॉज से गुजर रही महिलाओं को यह समझना जरूरी है कि 40 के बाद का प्यार पहले जैसा नहीं होता और यही इसकी खूबसूरती है। यह प्यार कम शोर करता है, लेकिन ज्यादा सच्चा होता है। कम नाटकीय लेकिन ज्यादा टिकाऊ। अगर आप इस दौर में हैं और महसूस कर रही हैं कि आपका प्यार 'अलग' हो गया है, तो खुद को दोष न दें। आप असफल नहीं हुई हैं, आप रीडिफाइन कर रही हैं और कभी-कभी, प्यार की आई मैच्योरिटी यही होती है, जो हमें शांति देती है, न कि बेचैनी। मेनोपॉज कोच कहती हैं कि, हर उम्र का प्यार अपनी जगह सही होता है।
लेखक के बारे में
Manju Mamgain
शॉर्ट बायो
मंजू ममगाईं पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर काम कर रही हैं।
परिचय एवं अनुभव
मंजू ममगाईं वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिख रही हैं। बीते साढ़े 6 वर्षों से इस महत्वपूर्ण भूमिका में रहते हुए उन्होंने न केवल डिजिटल कंटेंट के बदलते स्वरूप को करीब से देखा है, बल्कि यूजर बिहेवियर और पाठकों की बदलती रुचि को समझते हुए कंटेंट को नई ऊंचाइयों तक भी पहुंचाया है। पत्रकारिता के तीनों मुख्य स्तंभों— टीवी, प्रिंट और डिजिटल में कुल 18 वर्षों का लंबा अनुभव उनकी पेशेवर परिपक्वता का प्रमाण है।
करियर का सफर (प्रिंट की गहराई से डिजिटल की रफ्तार तक)
एचटी डिजिटल से पहले मंजू ने 'आज तक' (इंडिया टुडे ग्रुप), 'अमर उजाला' और 'सहारा समय' जैसे देश के शीर्ष मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। 'आज तक' में लाइफस्टाइल और एस्ट्रोलॉजी सेक्शन को लीड करने का उनका अनुभव आज भी उनकी रिपोर्टिंग में झलकता है। वे केवल खबरें नहीं लिखतीं, बल्कि पाठकों के साथ एक 'कनेक्ट' भी पैदा करती हैं।
शैक्षणिक पृष्ठभूमि और विशेषज्ञता:
दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी (ऑनर्स) और भारतीय विद्या भवन से मास कम्युनिकेशन करने वाली मंजू, साल 2008 से ही मेडिकल रिसर्च और हेल्थ विषयों पर अपनी लेखनी चला रही हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत जटिल वैज्ञानिक तथ्यों और मेडिकल रिसर्च को 'एक्सपर्ट-वेरिफाइड' मेडिकल एक्सप्लेनर स्टोरीज के रूप में सरल भाषा में प्रस्तुत करना है। स्वास्थ्य से जुड़ी उनकी हर खबर डॉक्टरों द्वारा प्रमाणित होती है, जो डिजिटल युग में विश्वसनीयता की कसौटी पर खरी उतरती है।
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उनका पत्रकारीय जुनून केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। वे आधुनिक जीवन की भागदौड़ में रिलेशनशिप की जटिलताएं, ब्यूटी ट्रेंड्स, फैशन, ट्रैवलिंग और फूड जैसे विषयों को भी एक्सपर्ट के नजरिए से कवर करती हैं। मंजू का मानना है कि डिजिटल युग में एक पत्रकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी 'फैक्ट-चेकिंग' और प्रमाणिक जानकारी प्रदान करना है, ताकि पाठक जागरूक और बेहतर जीवन निर्णय ले सकें।
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