हफ्ते में होते हैं 7 दिन पर छुट्टी रविवार को ही क्यों? बेहद रोचक है संघर्ष से सुकून तक के सफर की कहानी

Feb 27, 2026 07:28 pm ISTManju Mamgain लाइव हिन्दुस्तान
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मिलों की चहारदीवारी में दम तोड़ती इंसानियत को सुकून का एक दिन दिलवाने के लिए 7 साल की लंबी लड़ाई लड़ी गई है। रविवार का इतिहास, कोई आराम की दास्तां नहीं बल्कि अपने हकों के लिए खड़े होने की एक गौरवशाली क्रांति के रूप में जाना जाता है।

हफ्ते में होते हैं 7 दिन पर छुट्टी रविवार को ही क्यों? बेहद रोचक है संघर्ष से सुकून तक के सफर की कहानी

पूरे सप्ताह मन लगाकर कड़ी मेहनत करने के बाद संडे का दिन हर व्यक्ति की लाइफ में सुकून और चैन की नींद लेकर आता है। रविवार वह खास दिन है, जब आप अपने परिवार के साथ कुछ पल हंसी-खुशी के गुजारने के साथ अगले पूरे हफ्ते अच्छा काम करने के लिए मन में ऊर्जा भरते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं संडे का यह सुकून हमें मुफ्त में नहीं मिला है। इसके लिए नारायण मेघाजी लोखंडे जैसे नायकों को कड़े संघर्ष से होकर गुजरना पड़ा है। आज जिस रविवार को हम अपना हक समझते हैं वो कभी हफ्ते के सातों दिन काम करने वाले मजदूरों के लिए एक ख्वाब हुआ करता था। मिलों की चहारदीवारी में दम तोड़ती इंसानियत को सुकून का एक दिन दिलवाने के लिए 7 साल की लंबी लड़ाई लड़ी गई है। रविवार का इतिहास, कोई आराम की दास्तां नहीं बल्कि अपने हकों के लिए खड़े होने की एक गौरवशाली क्रांति के रूप में जाना जाता है।

रविवार कैसे बना स्थायी साप्ताहिक अवकाश

1. ब्रिटिश शासन और धार्मिक कारण

भारत में ब्रिटिश काल के दौरान रविवार की छुट्टी की शुरुआत हुई। दरअसल, ईसाई धर्म के लोग हर हफ्ते रविवार को प्रार्थना करने चर्च जाया करते थे। इसलिए उन्होंने अपने लिए रविवार के दिन को अवकाश की दिन घोषित किया था। लेकिन भारतीय मजदूरों के लिए चीजें एक जैसी नहीं थी। उन्हें हफ्ते के सातों दिन काम करना पड़ता था। उनके लिए परिवार के साथ समय बिताने और आराम करने के लिए कोई दिन नहीं रखा गया था।

2. नारायण मेघाजी लोखंडे का संघर्ष

भारत में रविवार की छुट्टी दिलाने का श्रेय नारायण मेघाजी लोखंडे को जाता है। नारायण मेघाजी लोखंडे को भारतीय श्रम आंदोलन का जनक माना जाता है। लोखंडे जी का मानना था कि जिस तरह अंग्रेज अपनी प्रार्थना के लिए रविवार की छुट्टी लेते हैं, उसी तरह भारतीय मजदूरों को भी एक दिन अपने परिवार, समाज और आराम के लिए मिलना चाहिए। उन्होंने अपनी इस मांग को लेकर अंग्रेजों के सामने कड़ा विरोध जताया। उनका यह संघर्ष पूरे 7 साल तक चला। सात साल के कड़े संघर्ष और मजदूरों की एकजुटता के आगे ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और उन्होंने 10 जून 1890 को आधिकारिक तौर पर रविवार को साप्ताहिक छुट्टी घोषित कर दी।

3. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के मानकों के अनुसार मजदूरों को मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए हफ्ते में कम से कम 24 घंटे का निरंतर आराम मिलना अनिवार्य है। धीरे-धीरे दुनिया के लगभग सभी देशों ने रविवार को ही 'यूनिवर्सल हॉलिडे' के रूप में स्वीकार कर लिया।

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लेखक के बारे में

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शॉर्ट बायो
मंजू ममगाईं पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर काम कर रही हैं।


परिचय एवं अनुभव
मंजू ममगाईं वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिख रही हैं। बीते साढ़े 6 वर्षों से इस महत्वपूर्ण भूमिका में रहते हुए उन्होंने न केवल डिजिटल कंटेंट के बदलते स्वरूप को करीब से देखा है, बल्कि यूजर बिहेवियर और पाठकों की बदलती रुचि को समझते हुए कंटेंट को नई ऊंचाइयों तक भी पहुंचाया है। पत्रकारिता के तीनों मुख्य स्तंभों— टीवी, प्रिंट और डिजिटल में कुल 18 वर्षों का लंबा अनुभव उनकी पेशेवर परिपक्वता का प्रमाण है।

करियर का सफर (प्रिंट की गहराई से डिजिटल की रफ्तार तक)
एचटी डिजिटल से पहले मंजू ने 'आज तक' (इंडिया टुडे ग्रुप), 'अमर उजाला' और 'सहारा समय' जैसे देश के शीर्ष मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। 'आज तक' में लाइफस्टाइल और एस्ट्रोलॉजी सेक्शन को लीड करने का उनका अनुभव आज भी उनकी रिपोर्टिंग में झलकता है। वे केवल खबरें नहीं लिखतीं, बल्कि पाठकों के साथ एक 'कनेक्ट' भी पैदा करती हैं।

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