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तीन साल की उम्र के बाद क्यों जरूरी है आंखों की नियमित जांच, जानिए कैसे पहचानें बच्चे की नजरें हैं कमजोर

अध्ययन के मुताबिक देश में हर साल 30 हजार से ज्यादा बच्चे आंखों में धुंधली रोशनी की शिकायत करते हैं। ऐसे में जानिए क्यों जरूरी है तीन साल की उम्र के बाद आंखों की नियमित जांच, बता रही हैं डॉ. सुमा गणेश

तीन साल की उम्र के बाद क्यों जरूरी है आंखों की नियमित जांच, जानिए कैसे पहचानें बच्चे की नजरें हैं कमजोर
Avantika Jainहिन्दुस्तान,नई दिल्लीSat, 10 Feb 2024 09:16 AM
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छोटी उम्र और मोटे-मोटे चश्मे...गैजेट्स के जिंदगी में बढ़ते दखल और खानपान के मामलों में बढ़ते नखरों की वजह से अब यह आम बात हो चुकी है। पर, आंखों से जुड़ी परेशानियां सिर्फ आंखों की कमजोर रोशनी तक सीमित नहीं है। इसका असर बच्चे के सीखने की क्षमता पर भी पड़ता है। आंखों की कमजोर रोशनी के कारण कई बच्चों के लिए कागज पर महीन छपाई और यहां तक कि ब्लैकबोर्ड पर पढ़ना भी मुश्किल हो जाता है। इससे विकास पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और  बच्चे को ऐसा महसूस होता है कि वे पिछड़ रहे हैं। 

जरूरी है जल्द डॉक्टरी परामर्श
एक बच्चे के जीवन के पहले तीन वर्ष उसके समग्र विकास के लिए बहुत अहम होते हैं, जब उनके व्यक्तित्व के विकास की नींव तैयार होती है। अपने जीवन के पहले तीन वर्षों के दौरान बच्चा सबसे न्यूरल  सर्किट ग्रहण करता है, जो कुछ नया सीखने और अच्छी सेहत के लिए जरूरी है। कम उम्र में ही डॉक्टरी मदद से आंखों की रोशनी कमजोर होने के बावजूद बच्चे को यह सिखाया जा सकता है कि वह अपने हाथ और आंखों के बीच कैसे बेहतर सामंजस्य स्थापित करे। आंखों से जुड़े व्यायाम की मदद से आंखों की मांसपेशियों को मजबूत बनाया जा सकता है। 

जरूरी है आंखों की सालाना जांच
जैसे छुटपन में नियमित अंतराल पर बच्चे का टीकाकारण जरूरी है, ठीक वैसे ही सालाना बाल नेत्र रोग विशेषज्ञ के पास ले जाकर उसके आंखों की जांच भी जरूरी है। डॉक्टर बच्चे की दृष्टि की जांच करके पता लगाएगा कि क्या उसकी दूर की या पास की नजर कमजोर है? क्या उसे चश्मे की जरूरत है? डॉक्टरी जांच से यह समझने में भी मदद मिलेगी कि क्या बच्चे को धुंधला नजर आता है या उसे पढ़ने में दिक्कत हो रही है?  इन सभी परेशानियों को चश्मे की मदद से दूर किया जा सकता है। नियम यह है कि हर बच्चे की तीन साल की उम्र में आंखों की जांच करवानी चाहिए। दोनों आंखों में चश्मे के नंबर में अंतर या भेंगापन या मोतिर्यांबद के कारण, अगर जल्दी इलाज न किया जाए तो नजर कमजोर हो सकती है।

सही नजर से बढ़ेगा आत्मविश्वास
हर किसी को हर चीज के लिए बेहतर नजर की जरूरत होती है। चाहे वह चलना हो, पढ़ना हो, कमरे में रखी किसी वस्तु को उसकी दूरी के आधार पर पहचानना हो या फिर यहां तक कि अपने आस-पास के लोगों को पहचानने के लिए भी। बेहतर दृष्टि के साथ बच्चा बेहतर देख सकता है। अगर बच्चा बेहतर देखने में सक्षम होगा तो वह स्कूल में ब्लैकबोर्ड पर दिए गए निर्देशों को देख सकेगा और होमवर्क ठीक से करना शुरू कर देगा। वो कक्षा में होने वाली चर्चाओं में भी भाग लेगा और बेहतर प्रदर्शन करने में सक्षम होगा। जैसे ही बच्चे की दृष्टि ठीक होगी तो उसका आत्मविश्वास  स्वाभाविक रूप से बढ़ जाएगा।
(लेखिका डॉ. श्रॉफ चैरिटी आई हॉस्पिटल में बाल चिकित्सा उत्कृष्टता केंद्र की अध्यक्ष हैं)

कैसे पहचानें बच्चे की नजरें हैं कमजोर?
1.  जब भी आपका बच्चा बहुत दूर की चीज देखने के लिए आंखें सिकोड़ता है या दूर की चीज को देखने के लिए सिर को घुमाता है या बार-बार पलकें  झपकाता है या ऐसा करने पर उसकी आंखों में बहुत ज्यादा पानी आता है तो ये सभी इस बात के लक्षण हैं कि बच्चा स्पष्ट रूप से नहीं देख पा रहा है।


2.  हाथ-आंख का समन्वय बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन कमजोर आंखों के कारण यह समन्वय प्रभावित हो सकता है। सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित बहुत से बच्चे या जिनके जन्म के समय किसी कारण से मस्तिष्क प्रभावित हुआ हो, उनके आंखों और हाथों का समन्वय ठीक नहीं होता है। इन बच्चों को पढ़ने-लिखने में दिक्कतें पेश आती हैं। ये सीधी लाइन में नहीं लिख पाते और चलते समय गिर भी जाते हैं। इन सभी लक्षणों से पता चलता है कि बच्चे को दृष्टि संबंधी कोई समस्या है जो मस्तिष्क के विकास से संबंधित है। ऐसी स्थिति को प्रारंभिक चरण में ही संभाला जाना चाहिए।


3. जब आपके बच्चे की दृष्टि खराब या सीमित होती है तो इससे उसके परीक्षा का परिणाम भी प्रभावित हो सकता है। ऐसे बच्चे तेज दिमाग के होने के बावजूद परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं और धीरे-धीरे हीन भावना व कमजोर आत्मविश्वास के शिकार हो जाते हैं। कमजोर रोशनी के कारण बच्चा चेहरे के भावों को समझने में अक्षम हो सकता है।

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