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बच्चे को आत्मविश्वास से भर देंगी आपकी पॉजिटिव बातें, एक्सपर्ट से जानें क्या करना है

एक अभिभावक के रूप में अगर हम बच्चे में पॉजिटिव नजरिया विकसित करने में सफल हो जाएं, तो वे अपनी जिंदगी के हर लक्ष्य को आसानी से प्राप्त कर सकेंगे। कैसे करें यह काम, बता रही हैं विनीता

बच्चे को आत्मविश्वास से भर देंगी आपकी पॉजिटिव बातें, एक्सपर्ट से जानें क्या करना है
Kajal Sharmaहिंदुस्तान,नई दिल्लीFri, 23 Feb 2024 04:30 PM
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यह काम बहुत मुश्किल है, मुझसे नहीं हो पाएगा। इस बार परीक्षा में मुझे अच्छे नंबर नहीं मिले, हमेशा मेरे ही साथ ऐसा क्यों होता है? बातचीत के दौरान जब भी आपका बच्चा ऐसे नकारात्मक वाक्यों का प्रयोग करे तो आप उसे समझाएं कि ऐसा सोचना गलत है। अगर इरादे मजबूत हों तो जीवन में कुछ भी हासिल करना संभव है। अगर हम बच्चों में सकारात्मक नजरिया विकसित करें तो इससे उनके व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास संभव होता है।

खूबियों को पहचानें
हर बच्चा अपने आप में खास होता है। सभी के व्यक्तित्व में खूबियों के साथ कुछ खामियां भी होती हैं। अगर कोई गणित में कमजोर होता है, तो खेल में हमेशा आगे रहता है, कोई म्यूजिक और डांस जैसी गतिविधि में हमेशा आगे रहता है, लेकिन वह परीक्षा में ज्यादा अंक नहीं ला पाता। कोई भी स्टूडेंट हर क्षेत्र में अव्वल हो यह संभव नहीं। ऐसे में पेरेंट्स की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे बच्चे के गुणों को पहचान कर उन्हें निखारने की कोशिश करें। बच्चे की रुचि जिस कार्य में है, उसे उसी खास फील्ड में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। उस पर किसी ऐसी एक्टिविटी में शामिल होने का दबाव न बनाएं, जो उसे नापसंद हो। ऐसा करने से उसे असफलता मिलेगी, जो उसके लिए निराशा का कारण बन जाएगी और इससे बच्चे का आत्मविश्वास कमजोर पड़ सकता है।

नजरअंदाज करें कुछ बातें
अपने बच्चे से इस बात की उम्मीद करना गलत है कि वह हर फील्ड में अव्वल हो, ठीक नहीं। अच्छी आदतों के साथ हर बच्चे में कुछ कमजोरियां भी होती हैं। मान लीजिए अगर वह डांस या म्यूजिक में आगे नहीं बढ़ पा रहा तो इसके लिए जबरन उस पर दबाव न बनाएं, बल्कि सहज ढंग से उसे उसकी रुचि के क्षेत्र में आगे बढ़ने का मौका दें। छोटी-छोटी गलतियों के लिए बच्चे के साथ बेवजह ज्यादा रोक-टोक न करें, बल्कि उसकी कुछ खामियों को जानबूझकर नजरअंदाज करने की कोशिश करें। इससे वह निडर होकर सीखने और आगे बढ़ने की कोशिश करेगा। 

हमेशा आत्मविश्वास बढ़ाएं
हो सकता है कि कामयाबी के साथ कभी-कभी आपके बच्चे को नाकामी भी हासिल हो, ऐसे में आप निराश न हों बल्कि उसे समझाएं कि असफलता भी जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। अगर तुम एक बार नाकाम हो गए इसका मतलब यह नहीं है कि तुम अयोग्य या पढ़ाई में कमजोर हो। पूरी मेहनत के साथ तैयारी करके तुम्हें दोबारा कोशिश करनी चाहिए। अगर तुम प्रयास जारी रखोगे, तो तुम्हें निश्चित रूप से सफलता मिलेगी। ऐसी सकारात्मक बातों से बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ता है।

अपनाएं सकारात्मक पेरेंटिंग
यह काम तुमसे नहीं हो सकता, तुम हो ही लापरवाह, तुम हर बार एक ही गलती दोहराते हो, बच्चों के साथ बातचीत के दौरान ऐसे नकारात्मक वाक्यों के प्रयोग से बचें। बल्कि, आप उनसे ऐसा कह सकते हैं कि कोई बात नहीं, गलती होना स्वाभाविक है, अगर तुम दोबारा कोशिश करोगे तो तुम्हें सफलता जरूर मिलेगी। अगर आप बच्चे को यह एहसास दिलाएंगे कि आपको उस पर पूरा भरोसा है कि वह पूरी ईमानदारी से पढ़ाई में मेहनत करेगा तो जरूर कामयाब होगा। आपकी ऐसी सकारात्मक बातों से उसका मनोबल बढ़ेगा और पूरे उत्साह के साथ पढ़ाई में जुट जाएगा।

तुलना से बचें
कुछ अभिभावक अनजाने में पड़ोसियों, दोस्तों या रिश्तेदारों के बच्चों से अपने बच्चे की तुलना करने लगते हैं। उनकी यह आदत बहुत नुकसानदेह साबित होती है। इससे बच्चे के मन में हीन भावना पनपने लगती है। उसे ऐसा लगता है कि मेरे सारे दोस्त मुझसे ज्यादा अच्छे हैं और मैं ही सबसे पीछे रह जाता हूं। अपने बारे में ऐसी नकारात्मक बातें सोचने के कारण उसके मन में स्थायी रूप से निराशा की भावना घर कर जाती है। अगर आप अपने बच्चे को आशावादी बनाना चाहती हैं तो तुलना की आदत से हमेशा दूर रहें।

जरूरी है सराहना
आपका बच्चा जब भी कोई प्रयास करे या उसे मामूली सफलता मिले तो उसे शाबाशी देना और उसकी तारीफ करना न भूलें। इससे बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ेगा। वह हमेशा कुछ बेहतर करने के लिए प्रेरित होगा, उसके मन में स्वयं के प्रति यह आशा बनी रहेगी कि मुझे मेरी मेहनत का फल जरूर मिलेगा। 

पारिवारिक माहौल का असर
अमेरिका के कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक जिन परिवारों का माहौल खुशनुमा होता है और माता-पिता सकारात्मक नजरिया अपनाते हैं, वहां पलने वाले बच्चे भी आशावादी और खुशमिजाज होते हैं। इस शोध में 250 परिवारों को शामिल किया गया था। अध्ययन में शामिल 85.3% परिवारों का ऐसा मानना था कि उन्होंने अपने बच्चों की परवरिश के दौरान बातचीत के लिए सकारात्मक वाक्यों का इस्तेमाल किया, इसे उनके बच्चों के व्यवहार में भी सकारात्मक बदलाव नजर आया और वे हर घटना को आशावादी नजरिये से देखने लगे। इसके विपरीत जिन परिवारों में पेरेंट्स बच्चे की परवरिश को लेकर ज्यादा तनावग्रस्त थे, उनके बच्चे भी नाखुश और निराश थे। 

(चाइल्ड एंड क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट गगनदीप कौर से बातचीत पर आधारित)

 

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