क्या पैरेंट्स को बच्चे का दोस्त बनकर रहना चाहिए? पेरेंटिंग कोच ने बताया परवरिश का सही तरीका!
पेरेंटिंग कोच रेनू गिरधर कहती हैं कि बच्चे आपके दोस्त नहीं होते और यह बात कड़वी जरूर है, लेकिन सच है। दोस्ती बराबरी पर चलती है, जहां कोई नियम नहीं होते और ना ही जवाबदेही होती है। वहीं माता-पिता की भूमिका जिम्मेदारी से जुड़ी होती है।

पेरेंटिंग एक बड़ी जिम्मेदारी है। इसके जरिए ही बच्चे का भविष्य या तो संवर जाता है या बिगड़ जाता है। हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा खुश रहे, उनसे खुलकर बात करे और कभी उनसे दूर ना जाए। इसी चाह में कई बार माता-पिता यह सोचने लगते हैं कि अगर वे बच्चे के सबसे अच्छे दोस्त बन जाएंगे, तो रिश्ता और मजबूत हो जाएगा। लेकिन पेरेंटिंग कोच रेनू गिरधर बताती हैं कि यह सोच सुनने में अच्छी लगती है, पर हकीकत में यह हमेशा सही नहीं होती। बच्चे को दोस्त नहीं, बल्कि ऐसे माता-पिता चाहिए जो प्यार के साथ सही दिशा दिखाएं, सही और गलत का फर्क सिखाएं और जरूरत पड़ने पर सख्ती भी दिखा सकें। यही संतुलन बच्चे के जीवन को सही राह पर ले जाता है।
बच्चे दोस्त नहीं होते, इस सच को समझना जरूरी है
पेरेंटिंग कोच रेनू गिरधर कहती हैं कि बच्चे आपके दोस्त नहीं होते और यह बात कड़वी जरूर है, लेकिन सच है। दोस्ती बराबरी पर चलती है, जहां कोई नियम नहीं होते और ना ही जवाबदेही होती है। वहीं माता-पिता की भूमिका जिम्मेदारी से जुड़ी होती है। जब माता-पिता हर बात पर हां कहते हैं और हर गलती पर हंसकर टाल देते हैं, तो बच्चा यह नहीं सीख पाता कि उसकी बाउंड्री लाइन क्या है। धीरे-धीरे उसे लगता है कि जो मन करे वही सही है। यह आदत आगे चलकर उसके व्यवहार और फैसलों पर बुरा असर डाल सकती है।
बाउंड्रीज तय करना जरूरी है
पेरेंटिंग कोच बताती हैं कि बच्चों को सबसे ज्यादा जरूरत होती है क्लियर बाउंड्रीज की। बाउंड्रीज बच्चे को सुरक्षा का एहसास देती हैं। जब माता-पिता यह तय करते हैं कि क्या सही है और क्या गलत, तो बच्चा खुद को सुरक्षित महसूस करता है। गलत बात पर 'ना'कहना पेरेंटिंग का अहम हिस्सा है। यह 'ना' बच्चे को समझाता है कि हर इच्छा पूरी होना जरूरी नहीं है। यही समझ आगे चलकर उसे पेशेंस, सेल्फ कंट्रोल और रिस्पॉन्सबिलिटी सिखाती है।
अनुशासन के जरिए प्यार दिखाना
पेरेंटिंग कोच के अनुसार, प्यार सिर्फ लाड़-प्यार से नहीं दिखाया जाता। असली प्यार अनुशासन में भी छिपा होता है। जब माता-पिता नियम बनाते हैं, समय पर सोने-जागने की आदत डालते हैं या गलत व्यवहार पर रोक लगाते हैं, तो यह सख्ती नहीं बल्कि देखभाल होती है। बच्चे उस समय नाराज हो सकते हैं, आंखें घुमा सकते हैं या दरवाजा पटक सकते हैं, लेकिन बच्चे के ये इमोशंस अस्थायी होती हैं। इन नियमों से ही बच्चे का चरित्र मजबूत बनता है।
आज की नाराजगी बनेगी कल की समझ
रेनू गिरधर समझाती हैं कि माता-पिता को बच्चे की हर नाराजगी से डरने की जरूरत नहीं है। आज बच्चा आपके नियमों से नाराज होगा लेकिन जब वह बड़ा होगा, तो वही नियम उसे सही लगेंगे। तब उसे समझ आएगा कि माता-पिता का 'ना' दरअसल प्यार था, तय की गई सीमाएं उसकी सुरक्षा थीं और अनुशासन उसका मार्गदर्शन था। यही अनुभव उसे जीवन में सही फैसले लेने में मदद करेगा।
माता-पिता कैसे बनें, दोस्त नहीं बल्कि मार्गदर्शक
पेरेंटिंग कोच रेनू गिरधर का मानना है कि माता-पिता का काम दोस्त बनना नहीं, बल्कि मार्गदर्शक बनना है। ऐसा मार्गदर्शक जो सुने भी, समझाए भी और जरूरत पड़ने पर सख्त भी हो। बच्चे से खुलकर बात करें लेकिन अपनी जिम्मेदारी न भूलें। जब माता-पिता इस संतुलन को समझ लेते हैं, तब बच्चा ना सिर्फ एक अच्छा इंसान बनता है, बल्कि बड़े होकर अपने माता-पिता को सबसे सच्चा दोस्त भी मानता है।
लेखक के बारे में
Anmol Chauhan परिचय एवं प्रोफेशनल पहचान
अनमोल चौहान लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में टकंटेंट प्रोड्यूसर हैं। वह लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए हेल्थ, रिलेशनशिप, फैशन, ट्रैवल और कुकिंग टिप्स से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए रीडर-सेंट्रिक और सरल भाषा में उपयोगी जानकारी प्रस्तुत करना उनके लेखन की खास पहचान है।
करियर की शुरुआत
अनमोल ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत 2024 में लाइव हिन्दुस्तान से की। बतौर फ्रेशर, वह डिजिटल मीडिया के कंटेंट फॉर्मेट, रीडर बिहेवियर और सर्च ट्रेंड्स को समझते हुए लाइफस्टाइल और फूड से जुड़े प्रैक्टिकल विषयों पर काम कर रही हैं, जिनमें डेली कुकिंग टिप्स, आसान रेसिपी आइडियाज़ और किचन हैक्स शामिल हैं।
शैक्षणिक पृष्ठभूमि
अनमोल चौहान ने दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास और राजनीति विज्ञान में स्नातक (BA) की पढ़ाई की है। इसके बाद उन्होंने भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) से हिंदी पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया। इस अकादमिक पृष्ठभूमि ने उन्हें सामाजिक समझ, फैक्ट-बेस्ड रिपोर्टिंग और जिम्मेदार पत्रकारिता की मजबूत नींव दी।
लेखन शैली और दृष्टिकोण
अनमोल का मानना है कि लाइफस्टाइल जर्नलिज्म का उद्देश्य सिर्फ ट्रेंड बताना नहीं, बल्कि रोजमर्रा में काम आने वाली, भरोसेमंद और आसानी से अपनाई जा सकने वाली जानकारी देना होना चाहिए। उनकी स्टोरीज में हेल्थ, फूड और लाइफस्टाइल से जुड़े विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया जाता है।
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