
क्या बच्चों को एडल्ट गानों पर डांस करने देना सही है? हर पैरेंट्स को सुननी चाहिए साइकोलॉजिस्ट की ये बात!
Parenting Tips: बच्चे जो देखते और सुनते हैं, उसे जल्दी अपना लेते हैं। इसलिए ये सोचना जरूरी है कि क्या एडल्ट गानों की भावनाएँ बच्चों की उम्र के लिए ठीक हैं या नहीं। साइकोलॉजिस्ट अरूबा कबीर ने इसे लेकर अपनी राय दी है।
आजकल के बच्चे बहुत स्मार्ट हो गए है। बड़ों को कॉपी करना वो बखूबी जानते है। अपने कई बार देखा होगा कि छोटे-छोटे बच्चे, एडल्ट गानों पर स्टेप बाय स्टेप परफॉर्मेंस देते हैं। यही नहीं उनके चेहरे के एक्सप्रेशन भी गाने से बिल्कुल मेल खाते हैं। लेकिन अब सवाल है कि क्या यह बच्चों के लिए सही है? क्या एडल्ट सॉन्ग पर बच्चों को डांस के लिए मोटिवेट करना पेरेंट्स का सही कदम है? दरअसल इसके पीछे कुछ बातें हैं जिन्हें समझना हर पेरेंट्स के लिए बहुत जरूरी है। बच्चे जो देखते और सुनते हैं, उसे जल्दी अपना लेते हैं। गाने और डांस उनके मन पर सीधा असर डालते हैं। इसलिए ये सोचना जरूरी है कि क्या एडल्ट गानों की भावनाएँ बच्चों की उम्र के लिए ठीक हैं या नहीं। साइकोलॉजिस्ट और थेरेपिस्ट अरूबा कबीर ने इसे लेकर अपनी राय दी है। आइए जानते हैं उनका क्या कहना है।
बच्चों के इमोशंस को समझना है जरूरी
साइकोलॉजिस्ट अरूबा कबीर के मुताबिक बच्चे अपनी उम्र में खुश होना, खेलना, जिज्ञासा रखना, थोड़ा गुस्सा होना या कभी-कभी उदास होना, बस इतने ही इमोशंस को अच्छी तरह समझ पाते हैं। यही उनकी छोटी दुनिया होती है। लेकिन जब उन्हें एडल्ट के इमोशन से भरे हुए गानों पर डांस कराया जाता है, जिनमें दर्द, जुदाई, दिल टूटना वगैरह होता है, तो वे बस उनकी नकल करते हैं। उन्हें इन बातों का असली मतलब पता नहीं होता, फिर भी वे उन्हें अपने शरीर, चेहरे के हाव भाव के जरिए दोहराते हैं।
एक्टिंग और असली इमोशंस का मिक्स होना है प्रॉब्लम
जब बच्चा एडल्ट सॉन्ग के बड़े-बड़े इमोशंस को कॉपी करता है, जिन्हें वह अच्छी तरह समझ भी नहीं पाता है तो इसकी वजह से बच्चों में एक कन्फ्यूजन सी होने लगती है। ऐसे में बच्चा अपने दिल के सच्चे इमोशंस को महसूस करने की जगह 'दिखाने' पर ध्यान देने लगता है। धीरे-धीरे उसे लगता है कि बड़ों जैसा दिखना ज्यादा जरूरी है। इन सब चीजों का असर यह होता है कि बच्चों के मन के असली इमोशंस अच्छे से ग्रो नहीं कर पाते।
भविष्य में उनका बिहेवियर भी प्रभावित होता है
थेरेपिस्ट कहती हैं कि बच्चे ये मैच्योर इमोशन समझते नहीं हैं, लेकिन उनका ब्रेन वो एक्सप्रेशन, बॉडी लेंग्वेज, इंटेंसिटी और नैरेटिव को एब्जॉर्ब कर लेता है। ऐसे बच्चे बड़े हो कर अक्सर ऐसे एडल्ट बनते हैं, जो दुख को रोमांटिसाइज करते हैं, उन्हें लगता है प्यार का मतलब ही दर्द है। वो कहीं ना कहीं हार्टब्रेक को अपनी पर्सनेलिटी समझने लगते हैं, बिना रिलेशनशिप के अधूरा महसूस करते हैं और अपनी सेल्फ वर्थ दूसरे को खुश करने से नापने लगते हैं। ये सब सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि ये सब पहले से ही उनके दिमाग में बैठा दिया जाता है।
कला का तेज असर
डांस, संगीत और कला बच्चों के लिए बहुत अच्छी चीजें हैं, लेकिन इनका असर बहुत जल्दी होता है। बच्चे इसे बहुत तेजी से सीखते हैं। अगर उन्हें उनकी उम्र के हिसाब से हल्के-फुल्के और खुश करने वाले गाने दिए जाएं, तो वे अपनी भावनाएँ सही तरीके से समझना सीखते हैं। इससे उनका भरोसा भी बढ़ता है और वे अपने मन को समझ भी पाते हैं। इसलिए कोशिश करनी चाहिए कि बच्चों को एडल्ट सॉन्ग की जगह उनके उम्र के अकॉर्डिंग सॉन्ग पर डांस करने के लिए मोटिवेट करें।
बच्चों के लिए सही चुनाव
बचपन बहुत कीमती होता है। इस उम्र में उन्हें वही चीजें मिलनी चाहिए जो उनकी दुनिया के हिसाब से हो। खुशी, खेल, मासूमियत और लाइट इमोशंस, के दायरे में ही उन्हें रहने दे। उन पर बेवजह बड़े-बड़े इमोशंस का बोझ ना डालें।

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Anmol Chauhanलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




