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डिलीवरी के बाद मां के लिए जानलेवा हो सकती है ये समस्या, जरूरी है देखभाल

  • लैंसेट नाम की पत्रिका द्वारा किए गए अध्ययन में मुताबिक भारत में हर साल लगभग चार करोड़ महिलाएं बच्चे के जन्म के बाद होने वाली सेहत से जुड़ी समस्याओं से जूझती हैं। कौन-कौन सी हैं ये समस्याएं और कैसे करें इनका सामना, बता रही हैं डॉ. नीतू गाबा

Kajal Sharma हिन्दुस्तानFri, 21 June 2024 05:49 PM
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नौ माह की गर्भावस्था और घंटों चलने वाले प्रसव के बाद बच्चे को जन्म देना आसान काम नहीं है। इस दौरान एक महिला का शरीर कई तरह की चुनौतियों का सामना करता है और बदलावों से गुजरता है। विशेषज्ञों की मानें तो लेबर पेन के दौरान प्रत्येक घंटे एक महिला का शरीर 200 से 600 कैलोरी तक बर्न करता है, जो जिम में एक घंटे तक कठिन व्यायाम करने के बराबर है। इतनी कठिनाइयों और चुनौतियों के बाद नई मां तुरंत अपने नवजात बच्चे की देखभाल के लिए शारीरिक व मानसिक रूप से तैयार नहीं हो पाती है। प्रसव से पहले और बाद में नई मां को स्वास्थ्य से संबंधित कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, पर बच्चे को जन्म देने के बाद मिली खुशी में नई मां की सभी समस्याएं छुप-सी जाती हैं। उनकी ओर किसी का ध्यान नहीं जा पाता क्योंकि सभी का ध्यान शिशु की ओर चला जाता है। लेकिन इस दौरान पति को अपनी पत्नी का पूरा ध्यान रखना और उसकी जरूरतों को समझना जरूरी होता है। नई मां को सेहत से जुड़ी किन चुनौतियों को लेकर सतर्क रहना चाहिए, आइए जानें:

अवसाद है आम समस्या

बच्चे को जन्म देने के बाद मां को अवसाद होने की आशंका बहुत ज्यादा होती है। भारत में लगभग 22 प्रतिशत नई मांएं इस समस्या से जूझती हैं। इस स्थिति में उन्हें उदासीर्, ंचता और थकान का अनुभव होता है। प्रसवोत्तर अवसाद यानी पोस्टपार्टम अवसाद आमतौर पर बच्चे को जन्म देने के कुछ हफ्तों के बाद शुरू होता है, लेकिन कभी-कभी यह और देर से एक साल बाद तक शुरू हो सकता है। इसके लिए शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव, अवसाद की पुरानी समस्या और जीवन में तनावपूर्ण घटनाओं और सपोर्ट की कमी जिम्मेदार हो सकते हैं। लगातार उदासी बने रहना, विभिन्न गतिविधियों में मन न लगना, शिशु के साथ स्नेह विकसित करने में कठिनाई और शिशु या खुद को नुकसान पहुंचाने का विचार मन में आना इस अवसाद के लक्षण हैं। पोस्टपार्टम अवसाद को नियंत्रित करने के लिए मेडिकल प्रोफेशनल्स की मदद लेनी पड़ती है, साथ ही परिवार और दोस्तों का सहयोग भी इसके लिए जरूरी होता है। साथ ही दवाओं और सपोर्ट समूहों का सहयोग भी जरूरी होता है।

स्तनपान की चुनौतियां

स्तनपान एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। लेकिन जन्म देने के बाद नई मां को इसमें अकसर चुनौती का सामना करना पड़ता है। स्तनपान से जुड़ी कुछ समस्याओं में निप्पल में होने वाला दर्द, मैस्टाइटिस (स्तन का संक्रमण) और दूध का कम मात्रा में निर्माण है। स्तनपान की समस्या के लक्षणों में स्तनपान कराते वक्त दर्द होना, शिशु का वजन न बढ़ना और स्तनों का फूलना शामिल हैं। इन समस्याओं को नियंत्रित करने के लिए स्तनपान कंस्लटेंट या मेडिकल प्रोफेशनल से परामर्श लेना चाहिए। यह याद रखना जरूरी है कि स्तनपान का सफर हर मां के लिए अलग-अलग होता है और मां व शिशु को स्वस्थ रखने के लिए विशेषज्ञों में परामर्श लेने और आवश्यक उपाय करने में कोई हर्ज नहीं।

जानलेवा हो सकती है यह समस्या

बच्चे के जन्म के बाद कई महिलाओं को होने वाला रक्तस्राव कई दफा जानलेवा साबित हो सकता है। इस स्थिति में प्रसव के बाद महिला को भारी रक्तस्राव होता है। आमतौर से ऐसा प्रसव के पहले 24 घंटों के अंदर होता है, लेकिन प्रसव के 12 हफ्ते बाद तक यह हो सकता है। यह स्थिति प्रसव में लंबा समय लगने, कई बच्चों को एक साथ जन्म देने या प्लेसेंटा की समस्याओं के कारण हो सकती है। भारी रक्तस्राव, चक्कर आना, हृदय की गति बहुत तेज होना, रक्तचाप अचानक कम हो जाना आदि इसके लक्षण है। इसे रोकने के लिए तुरंत डॉक्टरी परामर्श लेना चाहिए। इसके इलाज में दवाइयां, खून चढ़ाना और गंभीर मामलों में सर्जरी शामिल हैं। यदि जन्म देने के बाद मां को इनमें से कोई भी लक्षण महसूस हो, तो फौरन डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

पेल्विक फ्लोर से जुड़ी परेशानियां

पेल्विक फ्लोर विकार एक आम समस्या है, जो जन्म देने के बाद मांसपेशियां कमजोर हो जाने के कारण उत्पन्न होती है। इस स्थिति में पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियों को आराम देने और मूत्र या मलत्याग करने के लिए उनमें तालमेल बनाने की क्षमता कम हो जाती है। पेल्विस में ब्लाडर, गर्भाशय, प्रोस्टेट, और रेक्टम आदि अंग होते हैं। ये सपोर्ट संरचना की तरह काम करते हैं, जिससे पूरा शरीर ठीक रहता है। पेल्विक फ्लोर विकारों के आम लक्षणों में पेशाब निकल जाना, भारीपन महसूस होना, मलत्याग करने में दिक्कत होना आदि शामिल हैं। पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियां की जांच के लिए डॉक्टर शारीरिक परीक्षण कर सकते हैं। इसके इलाज के कुछ उपायों में केगेल जैसे पेल्विक फ्लोर व्यायाम शामिल हैं। इसके अलावा फिजिकल थेरेपी और कुछ मामलों में सर्जरी द्वारा भी इलाज किया जा सकता है।

(लेखिका मणिपाल हॉस्पिटल, द्वारका में गाइनेकोलॉजी विभाग में कंसल्टेंट हैं)

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