गाजियाबाद में मोबाइल गेम की लत ने ली 3 बहनों की जान, एक्सपर्ट ने बताएं आदत छुड़ाने के 5 तरीके
Tips To Protect Kids From Smartphone Overuse : जब स्क्रीन का आकर्षण सनक में बदल जाता है, तो वह न केवल मानसिक सेहत को खराब करता है बल्कि कई बार जानलेवा भी साबित हो सकता है। पेरेंट्स की नींद उड़ाने वाली इस दुखद घटना को सुनने के बाद जानते हैं मोबाइल की लत दूर करने के 5 असरदार टिप्स।

हाल ही में गाजियाबाद से आई एक दिल दहला देने वाली खबर ने माता-पिता को एक बार फिर झकझोर कर रख दिया है, जहां मोबाइल गेमिंग की लत ने देखते ही देखते एक ही परिवार की तीन मासूम बहनों की जान ले ली। यह दर्दनाक हादसा महज एक घटना नहीं, बल्कि उस 'डिजिटल महामारी' की चेतावनी है जो हमारे बच्चों के बचपन को खामोशी से निगल रही है। जब स्क्रीन का आकर्षण सनक में बदल जाता है, तो वह न केवल मानसिक सेहत को खराब करता है बल्कि कई बार जानलेवा भी साबित हो सकता है। पेरेंट्स की नींद उड़ाने वाली इस दुखद घटना को सुनने के बाद बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. एस. इंधुमाथी थायम्मल ने बच्चों को मोबाइल की लत से बाहर निकालने के लिए कुछ जरूरी टिप्स दिए हैं।
क्या हैं बच्चे के स्क्रीन पर निर्भरता के संकेत
रेनबो चिल्ड्रेन हॉस्पिटल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. एस. इंधुमाथी थायम्मल कहते हैं कि बच्चों की मोबाइल की लत को दूर करे के लिए सबसे पहले उनके पैटर्न को समझना जरूरी होता है। बच्चा कितनी देर स्क्रीन देख रहा है, क्या देख रहा है, और जब मोबाइल या टैबलेट हटाया जाता है तो उसका व्यवहार कैसा होता है, इन बातों पर ध्यान दें। अगर बिना स्क्रीन के चिड़चिड़ापन बढ़ता है, बाहर खेलने या दूसरी गतिविधियों में रुचि कम हो जाती है, नींद खराब होने लगती है, शारीरिक गतिविधि घट जाती है या ध्यान लगाने में दिक्कत आती है, तो यह स्क्रीन पर निर्भरता के संकेत हो सकते हैं। धीरे-धीरे यह ध्यान अवधि कम होने और किसी काम में गहराई से जुड़ने की क्षमता पर भी असर डाल सकता है।
पेरेंट्स के लिए क्या है सलाह
मोबाइल की लत दूर करने के लिए पेरेंट्स को चाहिए कि वो सबसे पहले बच्चे के लिए स्पष्ट और व्यवहारिक सीमाएं तय करें। अचानक स्क्रीन पूरी तरह बंद करने की जगह, एक तय रूटीन बनाएं जिसमें सीमित और निगरानी में स्क्रीन टाइम हो, और कुछ खास पलों में जैसे खाने के समय, सोने से पहले, और परिवार के साथ समय बिताते वक्त पूरी तरह नो-स्क्रीन टाइम हो। नियमित दिनचर्या बच्चों को सुरक्षित महसूस कराती है, जो अचानक लगाए गए प्रतिबंधों से ज्यादा प्रभावी होती है।
ज्यादा स्क्रीन देखने से बच्चे के विकास पर पड़ता है बुरा असर
पेरेंट्स को यह समझना चाहिए कि ज्यादा स्क्रीन देखने का बच्चे के विकास पर बुरा असर पड़ता है। छोटे बच्चों को ज्यादा स्क्रीन एक्सपोजर उनकी भाषा और सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि वे असली दुनिया के अनुभवों से बेहतर सीखते हैं। लंबे समय तक बैठे रहने की आदत बच्चों में मोटापे का कारण भी बन सकती है।
मोबाइल की लत छुड़ाने में मदद कर सकते हैं ये 5 टिप्स
-बच्चों को मोबाइल से दूर करने के लिए आप उन्हें कुछ अच्छे विकल्प दे सकते हैं जैसे बाहर खेलना, किताबें पढ़ना, पेंटिंग, बोर्ड गेम्स या उनकी रुचि से जुड़ी गतिविधियां, स्क्रीन की जरूरत को अपने आप कम कर देती हैं।
-माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्य भी अपनी आदतों पर ध्यान दें। अगर घर में बड़े लोग लगातार फोन पर लगे रहते हैं, तो बच्चे भी वही सीखते हैं। पूरे परिवार में संतुलित स्क्रीन टाइम वाला माहौल बनाए रखना जरूरी है।
-डांटने की जगह बच्चे से बातचीत करें। ज्यादा स्क्रीन टाइम का नींद, मूड, पढ़ाई और सेहत पर क्या असर पड़ता है, यह समझाएं। साथ ही, गलत या उम्र के हिसाब से अनुचित कंटेंट से होने वाले नुकसान पर भी बात करें। बच्चों को नियम बनाने में शामिल करने से वो विरोध करने की जगह जिम्मेदारी लेना सीखेंगे।
-कई बार बच्चे बोरियत, अकेलेपन या भावनात्मक खालीपन को भरने के लिए स्क्रीन की ओर जाते हैं। साथ समय बिताना, उनकी बातें सुनना और मजबूत रिश्ता बनाना स्क्रीन के लिए उनकी निर्भरता को कम कर सकता है।
-धैर्य, नियमितता और सकारात्मक प्रयासों से बच्चों को डिजिटल दुनिया और असली जिंदगी के बीच संतुलन बनाना सिखाया जा सकता है, जो उनके मानसिक और शारीरिक विकास के लिए बेहद जरूरी है।
लेखक के बारे में
Manju Mamgain
शॉर्ट बायो
मंजू ममगाईं पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर काम कर रही हैं।
परिचय एवं अनुभव
मंजू ममगाईं वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिख रही हैं। बीते साढ़े 6 वर्षों से इस महत्वपूर्ण भूमिका में रहते हुए उन्होंने न केवल डिजिटल कंटेंट के बदलते स्वरूप को करीब से देखा है, बल्कि यूजर बिहेवियर और पाठकों की बदलती रुचि को समझते हुए कंटेंट को नई ऊंचाइयों तक भी पहुंचाया है। पत्रकारिता के तीनों मुख्य स्तंभों— टीवी, प्रिंट और डिजिटल में कुल 18 वर्षों का लंबा अनुभव उनकी पेशेवर परिपक्वता का प्रमाण है।
करियर का सफर (प्रिंट की गहराई से डिजिटल की रफ्तार तक)
एचटी डिजिटल से पहले मंजू ने 'आज तक' (इंडिया टुडे ग्रुप), 'अमर उजाला' और 'सहारा समय' जैसे देश के शीर्ष मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। 'आज तक' में लाइफस्टाइल और एस्ट्रोलॉजी सेक्शन को लीड करने का उनका अनुभव आज भी उनकी रिपोर्टिंग में झलकता है। वे केवल खबरें नहीं लिखतीं, बल्कि पाठकों के साथ एक 'कनेक्ट' भी पैदा करती हैं।
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उनका पत्रकारीय जुनून केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। वे आधुनिक जीवन की भागदौड़ में रिलेशनशिप की जटिलताएं, ब्यूटी ट्रेंड्स, फैशन, ट्रैवलिंग और फूड जैसे विषयों को भी एक्सपर्ट के नजरिए से कवर करती हैं। मंजू का मानना है कि डिजिटल युग में एक पत्रकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी 'फैक्ट-चेकिंग' और प्रमाणिक जानकारी प्रदान करना है, ताकि पाठक जागरूक और बेहतर जीवन निर्णय ले सकें।
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