
डिलीवरी के बाद बच्चे की नहीं मां की देखभाल भी है जरूरी? एक्सपर्ट ने बताएं कारण
प्रसव के बाद का समय (Postpartum) केवल बच्चे के लिए ही नहीं, बल्कि उस स्त्री के शरीर और मन के लिए भी पुनर्निर्माण का दौर होता है। वह कोई जादू की छड़ी नहीं है जो रातों-रात ठीक हो जाएगी; वह एक घाव है जिसे भरने के लिए वक्त, पोषण और अपार संवेदनशीलता की जरूरत होती है।
आपने अकसर लोगों को कहते हुए सुना होगा कि एक बच्चे के जन्म के साथ मां का भी दूसरा जन्म होता है। लेकिन कई बार बच्चे के पैदा होते ही मां की देखभाल और इलाज में लापरवाही होने लगती है। पूरा ध्यान सिर्फ नवजात की देखभाल पर केंद्रित होकर रह जाता है। मां से उम्मीद की जाती है कि वह अपने आप ठीक हो जाएगी। लेकिन सच यह है कि डिलीवरी के बाद का समय महिला की जिंदगी का सबसे नाजुक दौर होता है। हम भूल जाते हैं कि प्रसव के बाद का समय (Postpartum) केवल बच्चे के लिए ही नहीं, बल्कि उस स्त्री के शरीर और मन के लिए भी पुनर्निर्माण का दौर होता है। वह कोई जादू की छड़ी नहीं है जो रातों-रात ठीक हो जाएगी; वह एक घाव है जिसे भरने के लिए वक्त, पोषण और अपार संवेदनशीलता की जरूरत होती है। सीके बिरला अस्पताल की स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉ. तृप्ति रहेजा कहती हैं कि डिलीवरी के बाद के पहले छह हफ्तों में शरीर, हार्मोन और मन, तीनों में तेजी से बदलाव होते हैं। इस दौरान इंफेक्शन, ज्यादा खून बहना, खून की कमी, हाई ब्लड प्रेशर, थायरॉइड की दिक्कत और मानसिक तनाव जैसी समस्याओं का खतरा बना रहता है। कई बार ये परेशानियां अस्पताल से घर आने के बाद शुरू होती हैं, इसलिए फॉलो-अप बेहद जरूरी होता है।
शुरुआत में हल्की लगती हैं ये समस्याएं
डिलीवरी के बाद होने वाली कई दिक्कतें शुरुआत में हल्की लगती हैं, इसलिए नजरअंदाज हो जाती हैं। लगातार थकान, चक्कर आना, दर्द, असामान्य डिस्चार्ज या मन का भारी रहना, इन सबको अक्सर नॉर्मल मान लिया जाता है। अगर समय पर डॉक्टर को न दिखाया जाए, तो ये छोटी समस्याएं आगे चलकर बड़ी बन सकती हैं।
मानसिक सेहत
डिलीवरी के बाद महिला की मानसिक सेहत पर भी ध्यान देना बेहद जरूरी होता है। डिलीवरी के कई हफ्तों या महीनों बाद भी पोस्टपार्टम डिप्रेशन या एंग्जायटी हो सकती है। समाज का दबाव, शर्म और जानकारी की कमी की वजह से कई महिलाएं मदद नहीं ले पातीं। सही समय पर पहचान और भावनात्मक सहारा मां और बच्चे, दोनों के लिए बहुत जरूरी होता है।
स्तनपान में परेशानी
स्तनपान में परेशानी, शरीर में पोषक तत्वों की कमी, वजन में बदलाव और पेट व पेल्विक मांसपेशियों की कमजोरी जैसी दिक्कतों के लिए भी डॉक्टर की सलाह जरूरी होती है। नियमित पोस्ट-डिलीवरी चेकअप से डॉक्टर यह देख पाते हैं कि शरीर ठीक से रिकवर कर रहा है या नहीं। साथ ही गर्भनिरोध, शारीरिक संबंधों से जुड़ी बातें और धीरे-धीरे एक्सरसाइज शुरू करने की सही जानकारी भी मिलती है।
डायबिटीज-बीपी का बढ़ सकता है खतरा
मां की सेहत का असर आगे की जिंदगी पर भी पड़ता है। अगर डिलीवरी के बाद सही देखभाल न मिले, तो भविष्य में डायबिटीज, हाई बीपी, मोटापा और डिप्रेशन जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए बच्चे के जन्म के बाद मां की देखभाल में निवेश करना, असल में उसकी पूरी जिंदगी की सेहत में निवेश है।
सलाह- डिलीवरी के साथ इलाज खत्म नहीं होना चाहिए, बल्कि वहीं से सही देखभाल की शुरुआत होनी चाहिए। एक स्वस्थ समाज की नींव स्वस्थ मां पर टिकी होती है, और पोस्टपार्टम देखभाल को मजबूत करना महिलाओं की सेहत सुधारने की सबसे अहम कड़ी है।

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Manju Mamgainलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




