
12 से 16 साल की उम्र के बच्चों को कितनी आजादी देना सही है? जानें एक्सपर्ट की राय
12 से 16 साल की एज में बच्चों को आजादी की जरूरत तो होती है, लेकिन उसी के साथ सही गाइडेंस और सीमाएं तय करना भी बहुत जरूरी है। चलिए जानते हैं इस उम्र में बच्चों को कितनी फ्रीडम देना सही है।
12 से 16 साल की उम्र बच्चों के जीवन का वो समय होता है, जब वे खुद को समझने और अपनी पहचान बनाने की कोशिश करते हैं। इस दौरान ना तो वो पूरी तरह बच्चे रहते हैं और ना ही मैच्योर होते हैं। ऐसे में वे अपने फैसले खुद लेना चाहते हैं, अपनी जिंदगी को अपने हिसाब से जीना चाहते हैं और चाहते हैं कि फैमिली में उनकी बात को अहमियत दी जाए। इस एज के बच्चों के पेरेंट्स के लिए भी यह काफी मुश्किल वक्त होता है। क्योंकि यही वह समय होता है जब पेरेंट्स के लिए यह तय करना सबसे मुश्किल हो जाता है कि बच्चे को कितनी आज़ादी दी जाए, जिससे बच्चों को फ्रीडम भी मिले और सही रास्ता भी दिखाया जा सके। पेरेंटिंग कोच पुष्पा शर्मा कहती हैं कि 12 से 16 साल की एज में बच्चों को आजादी की जरूरत तो होती है, लेकिन उसी के साथ सही गाइडेंस और सीमाएं तय करना भी बहुत जरूरी है। चलिए जानते हैं उनके मुताबिक इस उम्र में बच्चों को कितनी फ्रीडम देना सही है।

फ्रीडम कोई अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का इनाम है
पेरेंटिंग कोच पुष्पा शर्मा कहती हैं कि बच्चों को आजादी तभी देनी चाहिए जब वे उसकी जिम्मेदारी उठाना सीख जाएं। यानी फ्रीडम कोई राइट नहीं बल्कि एक रिवॉर्ड है। अगर बच्चा अपना स्कूल वर्क ईमानदारी से करता है, समय का सही उपयोग करता है और घर के बेसिक रूल्स को फॉलो करता है, तो उसे धीरे-धीरे डिसीजन मेकिंग में शामिल करना चाहिए। जब बच्चा जिम्मेदारी के साथ फ्रीडम को संभालना सीख जाता है, तो वह अपने जीवन के फैसलों में भी बेहतर सोच विकसित करता है।
बच्चों की राय सुनें, लेकिन सीमाएं तय रखें
12 से 16 साल की उम्र में बच्चे अक्सर सोचते हैं कि उन्हें सब कुछ समझ आने लगा है। वे अपनी राय पर ज्यादा भरोसा करते हैं और पेरेंट्स की बातों को चुनौती भी देने लगते हैं। इस स्टेज पर पेरेंट्स का धैर्य बहुत मायने रखता है। पुष्पा शर्मा कहती हैं कि बच्चों की ओपिनियन को इग्नोर ना करें। उनकी बात ध्यान से सुनें, उन्हें यह महसूस कराएं कि उनकी राय की कीमत है। लेकिन साथ ही, यह भी स्पष्ट रखें कि अंतिम निर्णय अभी भी आपका होगा। इससे बच्चा सीखता है कि उसकी बात मायने रखती है, लेकिन सीमाएं भी जरूरी हैं।
सही संतुलन ही सबसे बड़ी समझदारी है
पेरेंटिंग कोच पुष्पा शर्मा कहती है कि 12 से 16 साल के एज ग्रुप के बच्चे ना तो पूरी तरह बच्चे रहते हैं और न ही पूरी तरह बड़े बनते हैं। ऐसे में पैरेंट्स को सख्ती और नरमी के बीच एक बैलेंस बनाए रखना चाहिए। बच्चे को गाइड करें, लेकिन उसे अपनी गलतियों से सीखने का स्पेस भी दें। पुष्पा शर्मा कहती हैं कि अगर पेरेंट्स बच्चों को समझदारी से फ्रीडम देंगे, तो वे आत्मविश्वासी, जिम्मेदार और इमोशनली स्ट्रॉन्ग बनकर आगे बढ़ेंगे।

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Anmol Chauhanलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




