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कामकाजी मांओं की सबसे बड़ी चिंता का लगा पता, मोटापे से जुड़ा है कनेक्शन; रिसर्च में दावा

हमारी दुनिया में हम से जुड़ी क्या खबरें हैं? हमारे लिए उपयोगी कौन-सी खबर है? किसने अपनी उपलब्धि से हमारा सिर गर्व से ऊंचा उठा दिया? ऐसी तमाम जानकारियां हर सप्ताह आपसे यहां साझा करेंगी, जयंती रंगनाथन।

Manju Mamgain हिन्दुस्तानFri, 21 June 2024 03:08 PM
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जिंदगी कैसे जी जाए? आराम से? एक ही ढर्रे पर? आज के युवा कहेंगे, यह भी कोर्ई जिंदगी है। एकरसता से ऊब होती है। वो जिंदगी ही क्या जिसमें जोखिम ना हो। कौन लेता है ज्यादा जोखिम? स्त्री या पुरुष? यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया और एडिथ कोवन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की है। आमतौर पर यह माना जाता है कि महिलाओं के मुकाबले पुरुष अधिक रिस्क लेते हैं। इस अध्ययन में भी यही बात सामने आई कि महिलाओं के मुकाबले पुरुष 36 प्रतिशत अधिक जोखिम लेते हैं। इस रिसर्च से जुड़ी हैना गॉडमैन का कहना है, ‘सड़क हो या घर के बाहर, पुरुषों को रोमांच पसंद आता है। यह बात भी सही है कि रोमांचक जिंदगी जीने में अब युवतियां भी आगे आ रही हैं। पिछले दस सालों में उनकी भागीदारी 13 प्रतिशत बढ़ी है। 

इस रिसर्च में लगभग 1030 लोगों ने भाग लिया। यह देखा गया कि सड़क पर लोग गाड़ी कैसे चलाते हैं, सड़क कैसे पार करते हैं और साइकिल कैसे चलाते हैं। अध्ययन में यह भी देखा गया कि किस तबके के लोग ज्यादा खतरा मोल लेते हैं? अमीर या गरीब? इस रिसर्च के नतीजों के मुताबिक आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति ज्यादा खतरे उठाता है और कई बार अपनी जिंदगी की परवाह नहीं करता। रिसर्च के मुताबिक, ‘सेक्सुअल सिलेक्शन का सिद्धांत यह अनुमान लगाता है कि पुरुष, अपने प्रजनन (खासकर जवानी) के दिनों में महिलाओं के मुकाबले ज्यादा जोखिम वाले काम करते हैं। माना जाता है, जोखिम लेने की आदत से अच्छे जीन और बेहतर साथी का अनुमान लगाया जाता है।

लड़कियां खूब बन रही हैं इंजीनियर

ज्वॉइंट एडमिशन बोर्ड की सब कमिटी द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि आईआईटी, जेईई परीक्षाओं में अब उत्तीर्ण करने वाली लड़कियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पिछले चार सालों में यह संख्या लगभग तिगुनी हो गई है। इस खबर से यह भी साबित होता है कि लड़कियां अब हर क्षेत्र में अपनी जगह बना रही हैं। अध्ययन के मुताबिक छोटे शहर की लड़कियां भी तेजी से इंजीनियरिंग जैसे फील्ड में अपनी जगह बना रही हैं। फिलहाल दक्षिण भारत की लड़कियों की हिस्सेदारी उत्तर भारत की लड़कियों के मुकाबले 16 प्रतिशत अधिक है। इस अध्ययन के नतीजों में यह भी कहा गया है कि पुरुष प्रधान क्षेत्र माने जाने वाले क्षेत्रों में लड़कियों का दखल बढ़ रहा है। आईआईटी के अलावा दूसरे इंजीनियरिंग संस्थानों में भी पिछले दस सालों में लड़कियों की भागीदारी बढ़ी है।

कामकाजी मांओं की बढ़ रही है चिंता

दुनिया भर में कामकाजी मांओं को दोहरी जिंदगी जीनी पड़ती है, इस बात से हम सब वाकिफ हैं। पिछले दिनों अमेरिका के डेलॉइट यूनिवर्सिटी में हुए एक रिसर्च के मुताबिक पिछले तीन सालों में कामकाजी मांओं की सबसे बड़ी चिंता है कि उसका बच्चा मोटा हो रहा है। महामारी के बाद से मांओं की सोच में बड़ा परिवर्तन आया है। इस सर्वे में भाग लेने वाली 6337 मांओं में से 4652 मांओं ने कहा कि उनके बच्चे मोटापे के शिकार हो रहे हैं और उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे उन्हें संतुलित आहार कैसे खाने को दें। इस सर्वे में शामिल 53 प्रतिशत मांओं ने कहा कि बच्चों का आहार उनकी चिंता का बहुत बड़ा विषय है। पुणे के सिंबायोसिस यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉक्टर लता आंजरेकर कहती हैं, ‘इस समय बच्चों में मोटापा एक महामारी बन गया है। इसकी चिंता हर किसी को करनी चाहिए। स्कूलों में जंक फूड पर पूरी तरह से रोक लगा देना चाहिए। घरों में भी बच्चों को मैदे की बनी कोई चीज खाने के लिए नहीं देनी चाहिए।’

लौट आएगी सुनने की क्षमता

वैसे यह खबर इंग्लैंड की है। पर, उम्मीद है कि जल्दी ही यह तकनीक हमारे देश में भी पहुंचेगी। डेली मेल में प्रकाशित इस खबर के मुताबिक जन्म से बहरे बच्चे भी एक सर्जरी के बाद सुनने लगेंगे। वहां डॉक्टरों ने ऐसी सर्जरी की है, जिसमें वे बच्चे के डीएनए में पाए जाने वाली विषमताओं को ढूंढ कर उसका इलाज कर पाएंगे। इसके तहत वहां एक दस साल के बचपन से बधिर बच्चे का इलाज किया गया, जो अब आराम से सब सुन पा रहा है। इस इलाज को ले कर डॉक्टर बेहद आशान्वित हैं कि आगे वे जन्मजात बीमारियों का इलाज कर पाएंगे।

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