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आओ थोड़ी बेवकूफियां करते हैं

jeene ki rah

हंसना जरूरी है और मूर्खता की इतनी किस्में हैं कि एक ही समय में पहला शख्स दूसरे को मूर्ख कह रहा होता है और तीसरा, दूसरे को। एक ही बात एक ढंग से बेवकूफी लगती है, दूसरी तरह से समझदारी और तीसरे ढंग से सोचने पर कोई बात ही नजर नहीं आती। मसलन, मैं अगर खुद को मूर्ख कहती हूं, तो यह कहना मूर्खता भी हो सकती है और मेरी समझदारी भी। और तीसरा कह सकता है कि कुछ कहने या समझने की कोशिश करना ही मूर्खता है। * कुल मिलाकर, बेवकूफियों की सीमाएं अनंत हैं। कभी हम बेवकूफियां कर रहे होते हैं तो कभी दूसरे। कभी हम टांग खिंचाई कर रहे होते हैं तो कभी हमारी होती है। बस समस्या यह होती है कि हमें खुद पर हुआ मजाक बर्दाश्त नहीं होता। एक तरफ हम दूसरों की नादानी पर हंसने का कोई मौका नहीं छोड़ते। दूसरी ओर, हंसी का रुख अपनी ओर होते ही हमारी आवाज धीमी हो जाती है और मुस्कान सिमटने लगती है। कई बार बात बिगड़ जाती है। छोटी सी किसी बात को मुद्दा बनाकर हम उलझते रह जाते हैं। मन में गांठें बंध जाती हैं और फिर खुलकर हंसने और हंसाने से बचने लगते हैं। 

थोड़ी नादानी अच्छी है! .

नई सोच या नया विचार पहली नजर में मूर्खता ही नजर आता है। पर जब काम शुरू होता है तो और ही कमाल हो जाता है। हमारी कितनी ही कामयाबियों का रास्ता, पहली नजर में बेवकूफी लगने वाली बातों से ही होकर निकलता है। बावजूद, हम दूसरों की हंसी या मूर्ख कहलाए जाने के डर से कुछभी नया करने या सोचने से ही बचने लगते हैं। वहीं जब समझदार बने रहने का दबाव नहीं होता तो हमारे सोचने और काम करने का तरीका ही बदल जाता है। शोध कहते ही हैं कि मजाक के समय हम सबसे अधिक रचनात्मक होते हैं। खासकर अपनी हंसी खुद उड़ाने का हुनर हमें आसानी से दूसरों के करीब ले आता है। नए माहौल को हल्का कर देता है। मोटिवेशनल स्पीकर रॉबिन शर्मा कहते हैं, ‘हमें हर दिन कुछ नया करना चाहिए। खुद को थोड़ा पागलपन करने की छूट देना, खुद पर हंसना हमें हल्का बनाए रखता है।' जानना कोई गलती नहीं है। जानने का नाटक करना मूर्खता है। यह मानना बेवकूफी है कि प्रशंसा या प्यार उन्हें मिलता है, जो गलती नहीं करते, हमेशा सही होते हैं। जबकि हमेशा सही कोई नहीं होता।

मनोविज्ञानी प्रैम गॉट कहती हैं,‘बस इतना समझें कि मजाक में कोई गलती हो जाए तो उस पर अडे़ न रहें। सहज और विनम्र हो जाएं।' हालांकि यह विवेक जरूरी है कि हम किस बात का मजाक उड़ा रहे हैं। चार्ली चैप्लिन ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- मैं जितना गिरने का अभिनय करता, लोग उतना ही खिलखिलाकर हंसने लगते। कम उम्र से ही समझ आ गया कि दूसरों को गिरते, हारते व गलती करते हुए देखना हमें हंसाता है। 

फोटो खिंचवाते समय नकली हंसी भले ही अटपटी लगे, पर फोटो सुंदर बन जाती है। पार्क में जोर-जोर से हंसने की कसरत करते लोग भले अजीब लगते हों, पर यह हंसना उनको तरोताजा कर देता है। शरीर के हर कोने तक ऑक्सीजन और खून का संचार बढ़ा देता है। जब कुछ मिनटों का हंसने का नाटक इतना फायदेमंद होता है तो असल में हंसते रहना, कितना अच्छा होगा। तो ख्ुाद को कुछनया करने, नए ढंग से करने की छूट देते रहें। खुद पर भी हंसें, दूसरों को भी हंसना सिखाएं। .

बेवकूफ हमेशा दूसरा होता है। अपनी बेवकूफियां दिखती नहीं या फिर हम उन्हें छिपाने में जुटे रह जाते हैं। दूसरों की हंसी उड़ाते हैं, पर जब खुद पर आती है तो जरा सी बात पर बिलख उठते हैं। हालांकियह मूर्खता ज्यादातर सभी करते हैं। असल समझदार वो है, जो मजाक सहना सीख लेता है, उड़ाना नहीं। 

असल जिंदगी में भी ज्यादातर लोगों की हंसी के विषय दूसरों की मजबूरी, हताशा और बीमारी होते हैं। ऐसी बातों पर अपनी मूर्खता जाहिर करने से हमें जरूर बचना चाहिए। और यह दुनिया अगर ईश्वर का एक लतीफा है तो हमें उसे सुंदर लतीफा बनाने की ही कोशिश करनी चाहिए। हर किसी व्यक्ति में हंसने-खिलखिलाने की एक भूख है। अगर आप हंसी-मजाक में ही कुछ नया करते रहते हैं, तो दुनिया आपकी उन बेवकूफियों से भी प्यार करेगी। * -पूनम जैन 

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  • Web Title:Lets do some stupid things