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शराब-जुए जैसी होती है ज्यादा काम करने की लत, रिसर्च में सामने आई चौंकाने वाली बात

दुनियाभर में बहुत सारी रिसर्च होती रहती हैं। जिनके जरिए शोधकर्ता नई और चौंकाने वाली बातों का पता लगाते हैं। ऐसी ही रिसर्च में पता चला है कि ज्यादा काम करना किसी शराब या जुआ खेलने जैसी ही लत है।

शराब-जुए जैसी होती है ज्यादा काम करने की लत, रिसर्च में सामने आई चौंकाने वाली बात
Aparajitaलाइव हिन्दुस्तान,नई दिल्लीThu, 07 Dec 2023 04:12 PM
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कॉफी हो सकती है कारगर
याददाश्त से जुड़ी बीमारियां अल्जाइमर और डिमेंशिया तेजी से दुनिया भर के उम्रदराज आबादी को अपना शिकार बना रही है। पर, अभी तक इस बीमारी का कोई इलाज नहीं मिल सका है। इस दिशा में यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सेस के शोधकर्ताओं ने एक नई खोज की है। उनका मानना है कि कॉफी ग्राउंड्स (कॉफी बीन्स के इस्तेमाल के बाद बचा हुआ हिस्सा) में इस बीमारी का इलाज छुपा हो सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि कैफीन-एसिड आधारित कार्बन क्वॉन्टम डॉट्स से इस बीमारी का इलाज शायद संभव हो, जिसे कॉफी ग्राउंड्स से प्राप्त किया सकता है। इस क्वॉन्टम डॉट्स में मस्तिष्क की डैमेज होती कोशिकाओं को सुरक्षा देने की क्षमता हो सकती है। इस अध्ययन की रिपोर्ट एन्वॉयर्नमेंटल रिसर्च नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुई है।

पालतू जानवर प्रभावित नहीं करते आपकी बेहतरी
आम धारणा है कि पालतू जानवर रखने से घरवाले खुश और सकारात्मक भावों से भरपूर रहते हैं। पर, हाल में हुए एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इन दोनों के बीच कोई नाता नहीं पाया। पालतू जानवर रखने वाले व्यक्ति के स्वभाव आदि पर जानवर के रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता। मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी, अमेरिका के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में यह जरूर पाया कि पालतू जानवर को रखने से घरवालों की जीवन की क्षमता में इजाफा जरूर हुआ। 767 लोगों पर किए गए ऑनलाइन सर्वे में यह बात सामने आई है। सर्वे की रिपोर्ट पर्सनैलिटी एंड सोशल साइकोलॉजी बुलेटिन नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुई है।

काम की ऐसी लत!
आपके आसपास भी एकाध वर्कोहोलिक लोग तो होंगे ही। वर्कोहोलिक यानी जिसे काम करने की लत हो। एक नए अध्ययन में पाया गया है वर्कोहोलिक व्यक्ति का मूड अपनी पसंद का काम करने के दौरान भी खराब रहता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि वर्कोहोलिक होना भी शराब पीने या जुआ खेलने की किसी लत के समान ही है। इटली के यूनिवर्सिटी ऑफ बोलोग्ना के शोधकर्ताओं के द्वारा किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है। 139 लोगों पर किए गए इस अध्ययन की रिपोर्ट ऑक्यूपेशनल हेल्थ साइकोलॉजी नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुई है।

रिपोर्ट कार्ड नहीं देती है सही रिपोर्ट
हम अकसर पढ़ाई में अपने बच्चे की प्रगति का पैमाना रिपोर्ट कार्ड को मानकर चलते हैं। पर, गैलप और लर्निंग हीरोज नाम की संस्था द्वारा अमेरिका में किए गए सर्वे में पाया गया है कि अभिभावक अपने बच्चे के शैक्षणिक विकास पर शायद पूरी नजर नहीं रख पा रहे हैं क्योंकि रिपोर्ट कार्ड में अच्छे ग्रेड के बावजूद विभिन्न विषयों के बारे में बच्चे में वैसी समझ नहीं पाई गई। इसका परिणाम यह होता कि जहां जरूरत होती है, वहां भी अभिभावक बच्चे की मदद नहीं कर पाते। अमेरिका के दो हजार से भी ज्यादा अभिभावकों पर किए गए सर्वे के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है।

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