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सोशल मीडिया के इस्तेमाल से किशोर हो रहे मानसिक समस्याओं का शिकार, स्टडी में आए चौंकाने वाले खुलासे

Study: हाल ही में हुए कुछ स्टडी में सोशल मीडिया के इस्तेमाल से 9-17 साल के बच्चे भी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से घिर रहे हैं। वहीं बच्चों से ज्यादा जंकफूड का सेवन युवा वर्ग कर रहा है।

सोशल मीडिया के इस्तेमाल से किशोर हो रहे मानसिक समस्याओं का शिकार, स्टडी में आए चौंकाने वाले खुलासे
Aparajitaहिंदुस्तान,नई दिल्लीSat, 25 Nov 2023 04:37 PM
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गिरफ्त में ले रही यह लत
इंटरनेट अब लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा हो गया है, लेकिन यह चिंताजनक है। एक सर्वे के मुताबिक देश के 9-17 वर्ष की आयु के आधे से अधिक भारतीय युवा प्रतिदिन 3 घंटे से अधिक समय सोशल मीडिया और ऑनलाइन र्गेंमग पर बिताते हैं।  इस सर्वे में देश के करीब 50,000 माता-पिता शामिल थे। सर्वे में पाया गया कि 9 से 17 वर्ष की आयु के दस में से प्रत्येक छठा युवा प्रतिदिन तीन घंटे से अधिक सोशल मीडिया या र्गेंमग प्लेटफॉर्म पर बिताते हैं। अकेले महाराष्ट्र से 17 फीसदी माता-पिता ने कहा कि उनके बच्चे हर दिन छह घंटे से अधिक समय तक ऑनलाइन रहते हैं। यही जवाब देश के 22 फीसदी उत्तरदाताओं ने भी दिए। केवल 10 फीसदी माता-पिता ने कहा कि सोशल मीडिया या र्गेंमग पर समय बिताने के बाद उनका बच्चा खुश महसूस करता है। अध्ययन से यह भी बात सामने आई है कि सोशल मीडिया सकारात्मक प्रभावों की तुलना में अधिक नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है।  सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोकल सर्कल्स के एक अन्य सर्वे से पता चला है कि सोशल मीडिया के साथ लंबे समय तक जुड़ाव से आक्रामकता, अधीरता, अतिसक्रियता और अवसाद जैसे मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों की आशंका बढ़ जाती है।

मोटापा डालता है प्रेग्नेंसी पर असर
मोटापा उम्र के किसी भी दौर में फायदेमंद नहीं। हाल ही में हुए एक अध्ययन के मुताबिक प्रेग्नेंसी के शुरुआती दौर में बढ़ा हुआ वजन प्रेग्नेंसी के अंत में उच्च रक्तचाप और प्रीक्लेम्पसिया और भविष्य में दिल से जुड़ी बीमारियों के खतरे को बढ़ा देता है। पहली बार मां बनने वाली 4,200 महिलाओं पर किए गए अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है। अध्ययन में पाया गया कि प्रेग्नेंसी की पहली तिमाही में मोटापे की शिकार महिलाओं को सामान्य वजन वाली महिलाओं की तुलना में प्रेग्नेंसी की अंतिम तिमाही में उच्च रक्तचाप से जुड़ी समस्या होने का खतरा ज्यादा था। इस अध्ययन की रिपोर्ट सर्कुलेशन रिसर्च नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुई है।

ऐप है इस काम में कारगर
जिस वक्त आप जो काम कर रहे हैं, उस काम में अपना पूरा ध्यान लगाना मांइडफुलनेस कहलाता है। विभिन्न अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि माइंडफुलनेस से बच्चों को बहुत फायदा होता है। उनकी ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बेहतर होती है, मानसिक सेहत अच्छी रहती है और साथ ही स्वभाव भी अच्छा होता है। यही वजह है कि विभिन्न स्कूलों में बच्चों को इसका प्रशिक्षण भी दिया जाता है। कोविड के दौरान एमआईटी के शोधकर्ताओं द्वारा इस संदर्भ में किए गए एक अध्ययन में पाया गया ऐप के माध्यम से माइंडफुलनेस का अभ्यास भी बच्चों के लिए फायदेमंद होता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि ऐप के माध्यम से माइंडफुलनेस की ट्रेनिंग ज्यादा बच्चों को जो दी जा सकेगी। इस अध्ययन की रिपोर्ट पीएलओएस मैग्जीन में प्रकाशित हुई है।

बच्चों से ज्यादा युवा खा रहे हैं जंक फूड
बच्चों से ज्यादा युवा जंक फूड यानी अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स की लत के शिकार बन रहे हैं। अमेरिका, ब्राजील और स्पेन के शोधकर्ताओं के अध्ययन के अनुसार 14 फीसदी वयस्कों और 12 फीसदी बच्चों में जंक फूड की दीवानगी बेहद गंभीर खतरे की ओर इशारा करती है। यही वजह है कि आज का युवा हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। यह अध्ययन 36 देशों में प्रकाशित 281अध्ययनों के विश्लेषण पर आधारित है। शोधकर्ताओं के अनुसार कई अध्ययनों में यह सामने आया है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की वजह से मोटापा, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप , टाइप-2 मधुमेह और कैंसर तक का जोखिम बढ़ जाता है। इन उत्पादों की वैश्विक खपत बढ़ रही है। जहां यूके और अमेरिका में यह औसत आहार का आधे से अधिक हिस्सा बन चुके हैं, वहीं भारत जैसे  देशों में भी इनकी खपत तेजी से बढ़ रही है। शोध के नतीजे द ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुए हैं।
 

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