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बेकार चीजें इकट्ठा करना है शौक तो संभल जाएं, हो सकती है एक मानसिक समस्या

पुरानी और बेकार पड़ी वस्तुओं का अनावश्यक संग्रह करने की आदत होर्डिंग डिसॉर्डर नामक मनोवैज्ञानिक समस्या हो सकती है। अगर आपको भी ऐसी आदत है तो अभी से सचेत हो जाएं। कैसे इस लत से खुद को निकालें, बता रही ह

बेकार चीजें इकट्ठा करना है शौक तो संभल जाएं, हो सकती है एक मानसिक समस्या
Aparajitaहिन्दुस्तान,नई दिल्लीFri, 16 Feb 2024 01:13 PM
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आपने अपने आसपास कुछ ऐसे लोगों को जरूर देखा होगा, जो सफाई के दौरान कोई भी पुराना सामान अपने घर से नहीं हटाते और अनुपयोगी वस्तुओं को भी बहुत सहेज कर रखते हैं। मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययनों के अनुसार होर्डिंग डिसॉर्डर नामक गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्या से त्रस्त होने पर व्यक्ति में ऐसे लक्षण दिखाई देते हैं। पूरी दुनिया में कामकाजी आबादी के 2.5 % लोग और 7% बुजुर्ग इस समस्या से जूझ रहे हैं। दरअसल यह एक तरह का ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर है, जो एंग्जाइटी से संबंधित है।    

कैसे पहचानें लक्षण
पुरानी चीजों से बहुत गहरा और अनावयश्क रूप से भावनात्मक लगाव, अगर कोई दूसरा व्यक्ति इनकी रखी वस्तुओं को हाथ भी लगाता है तो ये उससे नाराज हो जाते हैं। होर्डिंग डिसऑर्डर से पीड़ित लोग अपनी रखी वस्तुओं की हमेशा निगरनी कर रहे होते हैं क्योंकि इनके मन में यह डर होता है कि कहीं वे चीजें खो न जाएं। इस समस्या से ग्रस्त लोगों के मन में हमेशा यह आशंका बनी रहती है कि भविष्य में अमुक वस्तु की जरूरत पड़ सकती है और इसी वजह से वे कोई भी बेकार या पुरानी चीज फेंकने को तैयार नहीं होते, बल्कि उसे संभालकर सुरक्षित स्थान पर रख देते हैं।

क्या है नुकसान
ऐसी आदत की वजह से व्यक्ति की जीवनशैली अस्त-व्यस्त हो जाती है, घर हमेशा गंदा और बिखरा रहता है, मन तनावग्रस्त और चिंतित रहता है। निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है। सामाजिक जीवन पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। इस समस्या से पीड़ित व्यक्ति आसपास के लोगों से मिलने और उनके साथ बातचीत करने से कतराने लगते हैं और उसका मन हमेशा उदास रहता है। जीवन में कुछ नया करने का उत्साह खत्म हो जाता है क्योंकि उसका मन हमेशा पुरानी वस्तुओं और अतीत की यादों में ही उलझा रहता है। इसलिए वह भविष्य के लिए कोई नयी योजना बनाने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाते।

क्यों होता है ऐसा
जिनका बचपन बहुत अभावग्रस्त होता है, उन्हें अपनी चीजों के साथ बहुत ज्यादा लगाव होता है, चाहे वे कितनी ही पुरानी और बेकार क्यों न हो जाएं वे उसे फेंकने या किसी जरूरतमंद को देने के लिए तैयार नहीं होते। जिनके मन में असुरक्षा की भावना होती है, वे सग-संबंधियों से कहीं ज्यादा वस्तुओं पर भरोसा करते हैं और अपनी रखी चीजें किसी को देने के लिए तैयार नहीं होते। आनुवांशिकता भी इसकी एक बड़ी वजह है। अगर माता-पिता में ऐसे लक्षण हों तो इस बात की आशंका हमेशा बनी रहती है कि उनकी संतान को भी होर्डिंग डिसॉर्डर की समस्या हो सकती है। जिन्हें अपनी खरीदी या अपने हाथों से बनाई गई चीजों से बहुत लगाव होता है, वे किसी भी हाल में उन्हें फेंकने या दूसरों देने के लिए तैयार नहीं होते, जिससे कई बार यह समस्या गंभीर रूप धारण कर लेती है।

क्या है उपचार   
खुद के द्वारा किए प्रयासों के बावजूद व्यक्ति की मनोदशा में कोई सुधार न आए तो क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट से सलाह लेनी चाहिए। आमतौर पर कॉग्नेटिव बिहेवियर थेरेपी की मदद से मरीज के विचारों को बदलने की कोशिश की जाती है। कुछ मरीजों में अवसाद के भी लक्षण दिखाई देते हैं, उनके उपचार के लिए दवाओं की भी मदद ली जाती है। 

परिवार की जिम्मेदारी
अगर किसी व्यक्ति होर्डिंग डिसऑर्डर की समस्या हो तो उसके परिवार के सदस्यों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे धैर्य के साथ उसका उपचार कराएं। इस समस्या से पीड़ित व्यक्ति के व्यवहार में चिड़चिड़ापन आ जाता है, इसलिए अगर आपके परिवार में कोई ऐसा व्यक्ति है तो उसकी बातें ध्यान से सुनें और उसे प्यार से समझाएं। हो सकता है कि वह एक बार में आपकी सलाह न माने, ऐसे में आप अपना धैर्य बनाए रखें और उसे तार्किक ढंग से अपनी बात समझाने की कोशिश करें।

कैसे करें बचाव
अगर आपको अपने व्यक्तित्व में ऐसे लक्षण नजर आते हैं, तो अभी से ही सचेत हो जाएं। ऐसे में तार्किक ढंग से यह सोचने की कोशिश करें कि अगर कोई वस्तु पिछले छह महीने से उपयोग में नहीं लाई गई है तो निकट भविष्य में भी उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। फिर दिल मजबूत करके उसे किसी जरूरतमंद को दे दीजिए। अपने घर में यह नियम बना लें कि कोई भी नया सामान खरीदने से पहले घर में रखी कुछ पुरानी चीजों को हटा देंगी। अपनी इस आदत के बारे में दोस्तों से खुलकर बातचीत करें, इससे समस्या का समाधान तलाशना आसान हो जाएगा।

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