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लंच के बाद क्यों आती है नींद? डॉक्टर ने कहा, आलस नहीं ये है बड़ी वजह

लंच के बाद क्यों आती है नींद? डॉक्टर ने कहा, आलस नहीं ये है बड़ी वजह

संक्षेप:

डॉक्टरों की मानें तो दोपहर के भोजन के बाद महसूस होने वाली यह सुस्ती सिर्फ आपकी कल्पना या आलस नहीं बिल्कुल नहीं है। वास्तव में, यह भोजन करने के बाद, खासकर भारी या अधिक भोजन करने के बाद, शरीर में होने वाले वास्तविक शारीरिक परिवर्तनों के कारण होती है।

Jan 13, 2026 06:44 pm ISTManju Mamgain लाइव हिन्दुस्तान
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दोपहर के भोजन के बाद नींद से भारी होती पलकें, झपकी लेने की तीव्र इच्छा, दिमाग का सुस्त पड़ जाना और प्रेरणा में अचानक कमी आना- कुछ ऐसी समस्याएं हैं, जिससे अकसर ज्यादातर लोग दोपहर का भोजन करने के बाद चुपचाप जूझते रहते हैं। हालांकि इसके पीछे छिपा कारण पूछने पर लोग इसे आलस्य या इच्छाशक्ति की कमी से जोड़कर देखते हैं, लेकिन डॉक्टरों की मानें तो दोपहर के भोजन के बाद महसूस होने वाली यह सुस्ती सिर्फ आपकी कल्पना या आलस नहीं बिल्कुल नहीं है। वास्तव में, यह भोजन करने के बाद, खासकर भारी या अधिक भोजन करने के बाद, शरीर में होने वाले वास्तविक शारीरिक परिवर्तनों के कारण होती है।

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क्या कहते हैं एक्सपर्ट ?

शारदा केयर हेल्थसिटी के सीनियर कंसल्टेंट और जनरल मेडिसिन्स डॉ. नीरज कुमार कहते हैं कि कई लोगों ने यह अनुभव किया होगा कि दोपहर का भोजन करने के कुछ समय बाद आंखें खुली रखना मुश्किल हो जाता है, सिर भारी लगने लगता है और काम करने में मन नहीं लगता। अक्सर इसे आलस या काम से बचने की आदत मान लिया जाता है, लेकिन वास्तव में इसके पीछे शरीर की प्राकृतिक कार्यप्रणाली काम कर रही होती है। यह स्थिति किसी बीमारी का संकेत नहीं, बल्कि शरीर का एक सामान्य जैविक प्रतिक्रिया पैटर्न है।

पाचन प्रक्रिया

डॉ. नीरज कुमार बताते हैं कि भोजन करने के बाद शरीर की प्राथमिकता पाचन प्रक्रिया हो जाती है। जैसे ही हम खाना खाते हैं, पेट और आंतों को भोजन पचाने के लिए अधिक ऊर्जा और रक्त की आवश्यकता होती है। इसका असर यह होता है कि दिमाग तक जाने वाली ऊर्जा कुछ समय के लिए कम महसूस होती है, जिससे सुस्ती और नींद जैसा एहसास होता है। यह शरीर का स्वाभाविक तरीका है, जिसमें वह अपनी ऊर्जा को जरूरी कार्यों की ओर मोड़ता है।

सर्कैडियन रिदम

इसके अलावा, हमारी बॉडी क्लॉक यानी सर्कैडियन रिदम भी इसमें अहम भूमिका निभाती है। दिन के समय शरीर की ऊर्जा एक समान नहीं रहती। दोपहर के समय, खासकर दो से चार बजे के बीच, शरीर की सतर्कता स्वाभाविक रूप से थोड़ी कम होती है। जब इस समय भारी भोजन किया जाता है, तो थकान का एहसास और अधिक बढ़ जाता है।

खाने की प्रकृति

खाने की प्रकृति भी बहुत मायने रखती है। अत्यधिक तला-भुना, मीठा या बहुत अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट रिच फूड खाने से ब्लड शुगर में तेजी से बदलाव होता है। शुरुआत में थोड़ी ऊर्जा महसूस होती है, लेकिन कुछ ही समय में शुगर का स्तर गिरने लगता है, जिससे सुस्ती और थकान बढ़ जाती है। वहीं संतुलित भोजन शरीर को लंबे समय तक स्थिर ऊर्जा देता है।

नींद की कमी

नींद की कमी भी एक बड़ा कारण है। जो लोग रात में पूरी नींद नहीं लेते हैं, उनका शरीर दोपहर में उस कमी को पूरा करने की कोशिश करता है। ऐसे में भोजन के बाद नींद आना और भी स्वाभाविक हो जाता है। लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहना और शारीरिक गतिविधि की कमी भी इस समस्या को बढ़ाती है।

जीवनशैली में बदलाव जरूरी

डॉ. नीरज कुमार के अनुसार, इस स्थिति से निपटने के लिए जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलाव काफी मददगार हो सकते हैं। दोपहर के भोजन में हल्का और संतुलित आहार लें, जिसमें प्रोटीन, फाइबर और हरी सब्जियां शामिल हों। बहुत भारी भोजन करने से बचें। खाने के बाद तुरंत बाद लेटने की जगह 5–10 मिनट की हल्की वॉक करें। इससे पाचन बेहतर होगा और सुस्ती कम महसूस होगी।

पर्याप्त पानी

साथ ही, दिन भर पर्याप्त पानी पीना और रात में 7–8 घंटे की अच्छी नींद लेना भी जरूरी है। यदि इसके बावजूद अत्यधिक नींद, कमजोरी या थकान बनी रहती है, तो यह किसी स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकता है और ऐसे में डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।

अंत में, यह समझना जरूरी है कि दोपहर के खाने के बाद नींद आना हमेशा आलस नहीं होता। यह शरीर का एक संकेत है, जिसे सही खानपान और दिनचर्या से संतुलित किया जा सकता है।

Manju Mamgain

लेखक के बारे में

Manju Mamgain

शॉर्ट बायो
मंजू ममगाईं पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर काम कर रही हैं।


परिचय एवं अनुभव
मंजू ममगाईं वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिख रही हैं। बीते साढ़े 6 वर्षों से इस महत्वपूर्ण भूमिका में रहते हुए उन्होंने न केवल डिजिटल कंटेंट के बदलते स्वरूप को करीब से देखा है, बल्कि यूजर बिहेवियर और पाठकों की बदलती रुचि को समझते हुए कंटेंट को नई ऊंचाइयों तक भी पहुंचाया है। पत्रकारिता के तीनों मुख्य स्तंभों— टीवी, प्रिंट और डिजिटल में कुल 18 वर्षों का लंबा अनुभव उनकी पेशेवर परिपक्वता का प्रमाण है।

करियर का सफर (प्रिंट की गहराई से डिजिटल की रफ्तार तक)
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