पीली ही नहीं नीली भी होती है हल्दी, जानें फायदे और कैसे है नॉर्मल हल्दी से अलग
Health Benefits Of Blue Haldi : नीली या काली हल्दी अपनी दुर्लभता और बेमिसाल औषधीय गुणों के कारण आयुर्वेद में एक खास जगह रखती है। यह न केवल दिखने में अनोखी है, बल्कि गंभीर बीमारियों से लड़ने की इसकी क्षमता इसे किसी जादुई जड़ी-बूटी से कम नहीं बनाती।

आमतौर पर भोजन का स्वाद और रंगत निखारने के लिए लोग पीली हल्दी का इस्तेमाल करते हैं। हल्दी सिर्फ खाने का स्वाद ही नहीं बढ़ाती बल्कि सेहत से जुड़े कई फायदे भी देती है। लेकिन क्या आप जानते हैं हल्दी का रंग सिर्फ पीला ही नहीं होता है। जी हां, प्रकृति के खजाने में छिपे कई रहस्यों में नीली हल्दी का नाम भी शामिल है। नीली या काली हल्दी अपनी दुर्लभता और बेमिसाल औषधीय गुणों के कारण आयुर्वेद में एक खास जगह रखती है। यह न केवल दिखने में अनोखी है, बल्कि गंभीर बीमारियों से लड़ने की इसकी क्षमता इसे किसी जादुई जड़ी-बूटी से कम नहीं बनाती। अगर आप भी सेहत से जुड़े इसके जादुई फायदों के बारे में जानना चाहते हैं तो फोर्टिस हॉस्पिटल (मानेसर) की एडिशनल डायरेक्टर इंटरनल मेडिसिन डॉ. स्वाति माहेश्वरी से जानते हैं।
डॉ. स्वाति माहेश्वरी कहती हैं कि ब्लू टरमरिक, जिसे वैज्ञानिक रूप से Curcuma caesia कहा जाता है, भारत में पाई जाने वाली हल्दी की एक दुर्लभ प्रजाति है। यह नीली हल्दी सामान्य रसोई में उपयोग होने वाली पीली हल्दी से अलग होती है। इसका रंग (राइजोम) नीले-काले रंग का होता है और इसका उपयोग मुख्य रूप से पारंपरिक चिकित्सा में किया जाता है। यह खुशबूदार, प्रभावशाली और रोजमर्रा में भोजन पकाने के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती। इसकी औषधीय क्रिया सामान्य हल्दी (Curcuma longa) से काफी भिन्न होती है। नीली हल्दी के लाभ इसके एसेंशियल ऑयल में है, जबकि सामान्य हल्दी करक्यूमिन रिच होती है। यही अंतर इनके प्रभावों को अलग बनाते हैं।
नीली हल्दी के फायदे
अधिक प्रभावी दर्दनाशक और ऐंठन-रोधी क्रिया
नीली हल्दी में कैंफर, बोर्नियोल, सिनेओल और आर्ट-टर्मेरोन पाए जाते हैं, जो विशेषकर मांसपेशियों के दर्द, नसों के दर्द (न्यूराल्जिया), पेट में ऐंठन और चोट के बाद होने वाले दर्द में तेजी से राहत दे सकते हैं। यह प्रभाव करक्यूमिन की तुलना में अधिक असरदार हो सकता है। ऐसा इसलिए,क्योंकि करक्यूमिन धीरे-धीरे जीन स्तर पर सूजन कम करने का काम करता है।
श्वसन तंत्र और ब्रोंकोडायलेटर लाभ
सिनेओल और वाष्पशील तेलों के कारण, पारंपरिक रूप से नीली हल्दी को अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, साइनस जाम और पुरानी खांसी में अधिक प्रभावी माना गया है। सामान्य हल्दी में सूजन-रोधी गुण तो हैं, लेकिन उसमें ब्रोंकोडायलेटर (श्वासनली फैलाने वाला) और म्यूकोलिटिक (बलगम पतला करने वाला) प्रभाव कम असरदार होता है।
त्वचा के लिए फायदेमंद
नीली हल्दी में एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं। इसके पेस्ट का उपयोग घावों को जल्दी भरने, खुजली और त्वचा के संक्रमण को ठीक करने में किया जाता है।
कैसे इस्तेमाल करें नीली हल्दी? (How Tom Use Blue Turmeric)
-रोज 1/2 से 1 चम्मच हल्दी पाउडर दूध या पानी में मिलाकर लें।
-चाय बनाकर पी सकते हैं।
-पेस्ट बनाकर जोड़ों पर लगाएं।
-सलाद या सब्जी में मिलाएं।
सलाह- नीली हल्दी खासतौर पर दीर्घकालिक सूजन, मेटाबॉलिक सिंड्रोम, हृदय सुरक्षा या लंबे समय तक एंटीऑक्सीडेंट उपयोग के मामलों में सामान्य हल्दी का विकल्प नहीं है। नीली हल्दी (Curcuma caesia) मुख्य रूप से दर्द, ऐंठन, सांस लेने में तकलीफ (श्वसन अवरोध), और एंटीमाइक्रोबियल सहयोग के लिए उपयोग की जाने वाली एक शक्तिशाली औषधीय जड़ी-बूटी है। इसका उपयोग सावधानीपूर्वक और विशेषज्ञ मार्गदर्शन में करना उचित है।
लेखक के बारे में
Manju Mamgain
शॉर्ट बायो
मंजू ममगाईं पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर काम कर रही हैं।
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