Cancer: क्या AI बदल देगा कैंसर का इलाज? ऑन्कोलॉजिस्ट ने बताया कितना बदल चुका है भविष्य
Cancer Treatment: कभी जो तकनीक सिर्फ फिल्मों और साइंस फिक्शन में दिखाई देती थी, आज वही AI कैंसर की पहचान और इलाज में डॉक्टरों की मदद कर रही है। सीनियर ऑन्कोलॉजिस्ट्स ने कैंसर के इलाज में AI की भूमिका के बारे में विस्तार से बताया है।

कैंसर की पहचान और इलाज के क्षेत्र में तेजी से बड़े बदलाव हो रहे हैं। आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कैंसर की स्क्रीनिंग, डायग्नोसिस और इलाज के तरीके को पूरी तरह बदल रहा है। AI आधारित डायग्नोस्टिक क्लीनिक और आशा कार्यकर्ता ग्रामीण इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में मदद कर रहे हैं। AI तकनीक से लैस आधुनिक पैथोलॉजी लैब्स अब पहले की तुलना में ज्यादा सटीक और तेज कैंसर डायग्नोसिस कर पा रही हैं। पिछले पांच वर्षों में ऑन्कोलॉजी में AI का विकास लगभग हर दिन नई गति से आगे बढ़ा है।
कभी “मेडिसिन में AI” सिर्फ साइंस फिक्शन जैसा लगता था, जहां एल्गोरिद्म स्कैन पढ़ते हैं और मशीनें बीमारी का अनुमान लगाती हैं। लेकिन आज यह क्लीनिक, अस्पताल और डायग्नोस्टिक सेंटरों में आम हो चुका है, यहां तक कि आशा कार्यकर्ताओं की विजिट में भी इसका इस्तेमाल हो रहा है। चूंकि कैंसर की पहचान से इलाज शुरू होने तक की देरी मरीज की स्थिति को प्रभावित करती है, इसलिए यह “खामोश क्रांति” बेहद महत्वपूर्ण है।
सबसे आम सवाल यह पूछा जाता है कि “क्या AI डॉक्टरों की जगह ले लेगा?” इसका जवाब है— हां भी और नहीं भी। AI का उपयोग करने वाले डॉक्टर, 10 साल पहले के डॉक्टरों की तुलना में बीमारी को बेहतर तरीके से संभाल सकते हैं। वहीं जो डॉक्टर AI का उपयोग नहीं करेंगे, वे पीछे रह सकते हैं। हालांकि AI डॉक्टरों की जगह लेने के बजाय उनकी क्षमता को बढ़ाता है ताकि वे मरीजों को बेहतर देखभाल दे सकें।
जहां इंसानी आंखें चूक सकती हैं, वहां AI मददगार
AI और डीप लर्निंग ने रेडियोलॉजी में तुरंत फायदे दिए हैं। पहले रेडियोलॉजिस्ट थकान और अधिक काम के दबाव के कारण छोटे नोड्यूल या शुरुआती मेटास्टेसिस को पहचानने में कठिनाई महसूस करते थे। बड़े अस्पतालों में रोजाना सैकड़ों स्कैन पढ़ने पड़ते हैं। ऐसे में AI एक अतिरिक्त “रीडर” की तरह काम करता है और डॉक्टरों के निर्णय को सपोर्ट करता है, जिससे मरीज और डॉक्टर दोनों की सुरक्षा बढ़ती है।
AI आधारित मैमोग्राफी से ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती घावों को जल्दी पहचानने में मदद मिल रही है। मशीन लर्निंग की मदद से उन महिलाओं के लिए व्यक्तिगत स्क्रीनिंग प्रोग्राम भी बनाए जा रहे हैं जिनमें ब्रेस्ट कैंसर का खतरा ज्यादा है। न्यूक्लियर मेडिसिन में AI PET/CT स्कैन की सटीकता बढ़ाने और छोटे मेटास्टेटिक कैंसर की पहचान करने में उपयोग हो रहा है, जिससे सही स्टेजिंग और बेहतर इलाज तय करना आसान हो रहा है।
पैथोलॉजी में बड़ा बदलाव
आज AI आधुनिक पैथोलॉजी का अहम हिस्सा बन चुका है। AI सिस्टम डिजिटल बायोप्सी स्लाइड्स को स्कैन करके उन हिस्सों की पहचान करते हैं जहां कैंसर हो सकता है। अमेरिका की FDA ने डिजिटल स्लाइड्स के जरिए प्रोस्टेट कैंसर पहचानने वाले पहले AI सॉफ्टवेयर को मंजूरी भी दे दी है।
भविष्य में AI सिर्फ यह नहीं बताएगा कि “कैंसर है या नहीं”, बल्कि कोशिकाओं की संरचना और मॉलिक्यूलर विशेषताओं को देखकर यह भी अनुमान लगाएगा कि बीमारी कितनी गंभीर हो सकती है और कौन सा इलाज सबसे ज्यादा असरदार रहेगा, यहां तक कि इम्यूनोथेरेपी का रिस्पॉन्स भी। इनवेसिव ब्रेस्ट कैंसर के मरीजों में AI आधारित डिजिटल पैथोलॉजी मॉडल अब पारंपरिक तरीकों जितना, बल्कि कई बार उससे बेहतर, सर्वाइवल प्रेडिक्शन देने लगे हैं।
तेज और ज्यादा सटीक प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी
AI अब कैंसर के इलाज को सिर्फ शरीर के हिस्से के आधार पर नहीं, बल्कि ट्यूमर की बायोलॉजी और जेनेटिक म्यूटेशन के आधार पर तय करने में मदद कर रहा है। AI आधारित जीनोमिक रिपोर्ट्स, डिजिटल पैथोलॉजी और क्लीनिकल डेटा को जोड़कर व्यक्तिगत इलाज की योजना तेजी से तैयार की जा रही है।
AI दवाओं की खोज को भी तेज कर रहा है। यह हजारों मॉलिक्यूल्स में से सही टारगेट पहचान सकता है, कैंसर कोशिकाओं पर दवाओं की प्रभावशीलता जांच सकता है और पुरानी दवाओं के नए उपयोग खोज सकता है। रिसर्चर्स AI की मदद से यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि कौन से मरीज इम्यूनोथेरेपी से फायदा पाएंगे। पांच साल पहले तक यह सब सिर्फ एक कल्पना जैसा था।
भारत की अपनी AI उपलब्धियां
भारत में AI आधारित कैंसर मॉडल सिर्फ पश्चिमी देशों की तकनीकों की नकल नहीं हैं। उदाहरण के लिए, बेंगलुरु की कंपनी Niramai ने “Thermalytix” नाम का AI आधारित थर्मल इमेजिंग टूल बनाया है, जो ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग में मदद करता है। यह बिना रेडिएशन के काम करता है, मौके पर रेडियोलॉजिस्ट की जरूरत नहीं पड़ती और इसे अलग-अलग जगहों पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
हाल ही में पंजाब सरकार के सहयोग से इस तकनीक के जरिए 15,000 महिलाओं की स्क्रीनिंग की गई। इनमें से ज्यादातर महिलाओं ने पहले कभी ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग नहीं करवाई थी। AI ने महिलाओं को जोखिम के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा और शुरुआती चरण में कैंसर की पहचान करने में मदद की।
दिल्ली में आशा कार्यकर्ता महिलाओं के घर जाकर उनकी जीवनशैली और पारिवारिक इतिहास से जुड़ी जानकारी इकट्ठा करती हैं। AI आधारित टूल इन जानकारियों का विश्लेषण करके हाई-रिस्क महिलाओं की पहचान करता है जिन्हें मैमोग्राफी की जरूरत होती है।
दक्षिण भारत में सर्वाइकल कैंसर के लिए VIA (Visual Inspection with Acetic Acid) इमेजिंग आधारित डीप लर्निंग टूल विकसित किए गए हैं, जो महिलाओं की सही पहचान करने में मदद करते हैं और अनावश्यक इलाज से बचाते हैं।
पुणे के पास ग्रामीण इलाकों में AI आधारित मैमोग्राफी वैन भी चलाई जा रही हैं। MedCognetics और Health Within Reach Foundation ने मिलकर ऐसा सिस्टम बनाया है जो हाई-रिस्क मैमोग्राम को प्राथमिकता से चिन्हित करता है। पहले साल में ही AI ने सैकड़ों संदिग्ध मामलों की पहचान की, जिनमें से कई महिलाओं में कैंसर की पुष्टि शुरुआती स्टेज में हो गई।
भारत ने AI रेगुलेशन की दिशा में बढ़ाया बड़ा कदम
भारत ने हाल ही में कैंसर इलाज में AI को रेगुलेट करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया है। Central Drugs Standard Control Organization (CDSCO) ने AI आधारित कैंसर डिटेक्शन सॉफ्टवेयर और डायग्नोस्टिक टूल्स को Class C मेडिकल डिवाइस की श्रेणी में रखा है। ये मध्यम से उच्च जोखिम वाले डिवाइस माने जाते हैं।
अब किसी भी AI टूल को कैंसर पहचानने के लिए इस्तेमाल करने से पहले उसे वैज्ञानिक जांच और सुरक्षा मानकों से गुजरना होगा। यह कदम बेहद जरूरी है क्योंकि बिना उचित जांच के AI आधारित फैसले मरीजों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं।
AI की सीमाएं भी समझना जरूरी
AI जितना शक्तिशाली है, उसकी सीमाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। ज्यादातर AI मॉडल पश्चिमी और शहरी आबादी के डेटा पर ट्रेन किए गए हैं। ऐसे में भारतीय मरीजों के मामलों में गलत वर्गीकरण का खतरा बना रहता है। भारत में अभी बड़े और विविध मेडिकल डेटासेट्स की कमी है। साथ ही डिजिटल पैथोलॉजी, जीनोमिक डेटा और इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड्स जैसी जानकारी बेहद संवेदनशील होती है। इसलिए डेटा सुरक्षा, एन्क्रिप्शन और मरीज की सहमति बेहद जरूरी है।
इसके अलावा कई AI मॉडल “ब्लैक बॉक्स” की तरह काम करते हैं। यानी वे फैसला तो दे देते हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं करते कि उस फैसले तक कैसे पहुंचे। इसलिए AI की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ाना जरूरी है।
जो काम तकनीक कभी नहीं कर सकती
AI कभी किसी डरे हुए परिवार के साथ बैठकर उनकी भावनाओं को नहीं समझ सकता। यह तय नहीं कर सकता कि कोई मरीज कीमोथेरेपी से मानसिक रूप से कितना टूट चुका है। यह किसी का हाथ पकड़कर भरोसा नहीं दे सकता। AI का असली मकसद डॉक्टरों का समय बचाना है ताकि वे मरीजों के साथ ज्यादा मानवीय और व्यक्तिगत समय बिता सकें। चाहे AI कितना भी आगे बढ़ जाए, मरीज और डॉक्टर के बीच भरोसे की जगह कोई मशीन नहीं ले सकती।
भारत को आगे क्या करना होगा
अगर AI को भारत में बड़े स्तर पर सफल बनाना है तो पूरे देश से बेहतर और विविध मेडिकल डेटा इकट्ठा करना होगा। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों को इसमें शामिल करना जरूरी है। साथ ही डॉक्टरों, नर्सों और टेक्नोलॉजिस्ट्स को AI को समझने और उसकी सीमाओं को पहचानने की ट्रेनिंग देनी होगी। मरीजों और समुदायों को भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाना जरूरी है ताकि तकनीक पर भरोसा बना रहे।
कैंसर के खिलाफ एक ज्यादा बराबरी वाली लड़ाई
आज ग्रामीण भारत की कोई महिला जब स्वास्थ्य शिविर में जाती है, तो हो सकता है कि उसे पता भी न हो कि AI उसके लिए चुपचाप काम कर रहा है — उसके जोखिम का आकलन कर रहा है, रिपोर्ट तैयार कर रहा है और उसकी जांच की तस्वीरें दूर बैठे विशेषज्ञों तक पहुंचा रहा है। यह अब कल्पना नहीं, बल्कि आज की सच्चाई है। ऑन्कोलॉजी का भविष्य इंसानी संवेदनाओं और बुद्धिमान मशीनों के सहयोग में छिपा है, जहां तकनीक और डॉक्टर मिलकर कैंसर के खिलाफ ज्यादा बेहतर और बराबरी वाली लड़ाई लड़ेंगे।
(डॉ वरुण गोयल Dr. Varun Goel राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर, रोहिणी, नई दिल्ली में सीनियर कंसल्टेंट मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट तथा डे-केयर कीमोथेरेपी सेवाओं के प्रिंसिपल को-ऑर्डिनेटर हैं।)
लेखक के बारे में
Anmol Chauhanअनमोल चौहान लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में टकंटेंट प्रोड्यूसर हैं। वह लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए हेल्थ, रिलेशनशिप, फैशन, ट्रैवल और कुकिंग टिप्स से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए रीडर-सेंट्रिक और सरल भाषा में उपयोगी जानकारी प्रस्तुत करना उनके लेखन की खास पहचान है।
करियर की शुरुआत
अनमोल ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत 2024 में लाइव हिन्दुस्तान से की। बतौर फ्रेशर, वह डिजिटल मीडिया के कंटेंट फॉर्मेट, रीडर बिहेवियर और सर्च ट्रेंड्स को समझते हुए लाइफस्टाइल और फूड से जुड़े प्रैक्टिकल विषयों पर काम कर रही हैं, जिनमें डेली कुकिंग टिप्स, आसान रेसिपी आइडियाज़ और किचन हैक्स शामिल हैं।
शैक्षणिक पृष्ठभूमि
अनमोल चौहान ने दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास और राजनीति विज्ञान में स्नातक (BA) की पढ़ाई की है। इसके बाद उन्होंने भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) से हिंदी पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया। इस अकादमिक पृष्ठभूमि ने उन्हें सामाजिक समझ, फैक्ट-बेस्ड रिपोर्टिंग और जिम्मेदार पत्रकारिता की मजबूत नींव दी।
लेखन शैली और दृष्टिकोण
अनमोल का मानना है कि लाइफस्टाइल जर्नलिज्म का उद्देश्य सिर्फ ट्रेंड बताना नहीं, बल्कि रोजमर्रा में काम आने वाली, भरोसेमंद और आसानी से अपनाई जा सकने वाली जानकारी देना होना चाहिए। उनकी स्टोरीज में हेल्थ, फूड और लाइफस्टाइल से जुड़े विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया जाता है।
विशेषज्ञता के क्षेत्र
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रिलेशनशिप और इमोशनल वेल-बीइंग
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फैशन और एथनिक स्टाइलिंग
ट्रैवल और सीजनल डेस्टिनेशन


