बिस्तर छोड़ने की जल्दबाजी कहीं पड़ न जाए भारी! जानें नींद से जागते ही तुरंत जमीन पर क्यों नहीं रखने चाहिए पैर

Jan 20, 2026 12:29 am ISTManju Mamgain लाइव हिन्दुस्तान
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डॉ. विनीत बंगा के अनुसार, नींद से जागने के तुरंत बाद की वह कुछ मिनटों की अवधि हमारे न्यूरॉन्स और रक्तचाप (Blood Pressure) के लिए सबसे नाजुक होती है, और यहीं पर हमारी सदियों पुरानी परंपराएं एक रक्षा कवच की तरह काम करती हैं।

बिस्तर छोड़ने की जल्दबाजी कहीं पड़ न जाए भारी! जानें नींद से जागते ही तुरंत जमीन पर क्यों नहीं रखने चाहिए पैर

आपने अकसर घर के बड़े-बुर्जुगों को सुबह बिस्तर छोड़ते ही सीधा जमीन पर पैर ना रखने की सलाह देते हुए कई बार सुना होगा। क्या आप जानते हैं यह कोई महज भारतीय परंपरा या कोई धार्मिक रिवाज का हिस्सा नहीं है बल्कि यह 'बायोलॉजिकल क्लॉक' को साधने की गहरी कला है। बता दें, यह उस प्राचीन विज्ञान का हिस्सा है जो जानता था कि नींद की गहराई से जागृति के संसार में कदम रखना शरीर के लिए किसी बड़े 'सिस्टम रीबूट' से कम नहीं होता है। हमारे पूर्वजों ने इस प्रक्रिया को आध्यात्मिक अनुशासन का चोला पहनाया ताकि आम इंसान अपने शरीर की सूक्ष्म ऊर्जाओं और चेतना के संतुलन को अनजाने में नुकसान न पहुंचा सकें। आज, जब आधुनिक चिकित्सा विज्ञान मानव शरीर के जटिल तंत्रों को परत-दर-परत खोल रहा है, तो यह स्पष्ट हो गया है कि ये रीति-रिवाज़ असल में हमारी नसों और मस्तिष्क की सुरक्षा के लिए बनाए गए बेहतरीन 'सेफ्टी प्रोटोकॉल्स थे। इसी वैज्ञानिक कड़ी को जोड़ते हुए, फोर्टिस फरीदाबाद के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. विनीत बंगा ने इस विषय को तंत्रिका तंत्र और चिकित्सा विज्ञान के दृष्टिकोण से स्पष्ट किया है।उनके अनुसार, नींद से जागने के तुरंत बाद की वह कुछ मिनटों की अवधि हमारे न्यूरॉन्स और रक्तचाप (Blood Pressure) के लिए सबसे नाजुक होती है, और यहीं पर हमारी सदियों पुरानी परंपराएं एक रक्षा कवच की तरह काम करती हैं।

नींद से जागने के तुरंत बाद पैर जमीन पर क्यों नहीं रखने चाहिए?

'स्लीप-वेक इनर्शिया'

डॉ. विनीत बंगा के अनुसार, जब हम गहरी नींद में होते हैं, तो हमारा शरीर पैरासिम्पैथेटिक सिस्टम (Parasympathetic System) के नियंत्रण में होता है, जिसका काम आराम और मरम्मत करना है। जागते ही मस्तिष्क को तुरंत सिम्पैथेटिक सिस्टम की ओर स्विच करना पड़ता है। डॉ. बंगा के अनुसार, यह बदलाव किसी कंप्यूटर को रीबूट करने जैसा है—जैसे सॉफ्टवेयर लोड होने में समय लेता है, वैसे ही हमारे मस्तिष्क को भी पूरी तरह 'एक्टिव' होने के लिए कुछ मिनटों की जरूरत होती है। जागते समय शरीर में कोर्टिसोल (Cortisol) हार्मोन का स्तर अचानक बढ़ने लगता है, जो हमें सतर्कता और ऊर्जा देने का काम करता है। हालांकि, इस दौरान हमारा रक्तचाप नियंत्रण और न्यूरोलॉजिकल तालमेल अभी भी 'अधूरा' ही होता है। यदि आप आंख खुलते ही झटके से बिस्तर छोड़ते हैं, तो शरीर का समन्वय (Coordination) बिगड़ सकता है। यही वह समय है जब कई लोगों को चक्कर आना, सिर में भारीपन या असमंजस (Confusion) महसूस होता है। जो विशेष रूप से बुज़ुर्गों या संवेदनशील व्यक्तियों के लिए तनावपूर्ण हो सकता है।

वेगस नर्व की चुनौती

नींद के दौरान रक्तचाप स्वाभाविक रूप से कम रहता है। जागने और खड़े होने पर रक्त निचले अंगों की ओर खिंचता है, जिससे मस्तिष्क तक पर्याप्त रक्त पहुंचाने के लिए शरीर को तुरंत प्रतिक्रिया करनी पड़ती है। यह प्रक्रिया ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम द्वारा नियंत्रित होती है, जिसमें वेगस नर्व की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। डॉ. बंगा बताते हैं कि अचानक स्थिति बदलने से यह तंत्र क्षणिक रूप से दबाव में आ सकता है, जिससे चक्कर या ऑर्थोस्टेटिक हाइपोटेंशन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, चिंता विकार या ऑटोनॉमिक डिसफंक्शन से ग्रस्त लोगों में यह प्रभाव अधिक स्पष्ट हो सकता है। धीरे-धीरे उठने से वेगस नर्व और हृदय गति के बीच बेहतर संतुलन बनता है और तंत्रिका तंत्र पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता।

माइंडफुल अवेकनिंग'के लिए टिप्स

नींद से जागने की सही प्रक्रिया है कि जो तंत्रिका तंत्र को क्रमिक रूप से सक्रिय होने का समय दें। जागते ही 30–60 सेकंड तक लेटे रहकर गहरी और धीमी सांस लेना वेगस टोन को संतुलित करता है। इसके बाद हल्की स्ट्रेचिंग, गर्दन और रीढ़ की कोमल गतियां तथा कुछ देर बैठे रहना, रक्तचाप और हृदय गति को स्वाभाविक रूप से स्थिर करता है।

प्राकृतिक रोशनी के संपर्क में आना शरीर की सर्कैडियन रिदम को संतुलित करता है और मानसिक स्पष्टता बढ़ाता है। इसके विपरीत, तुरंत मोबाइल फोन देखने जैसी तेज मानसिक उत्तेजना तंत्रिका तंत्र पर अतिरिक्त तनाव डाल सकती है। नियमित रूप से अपनाई गई यह सरल दिनचर्या लंबे समय में तनाव सहनशीलता, हृदय स्वास्थ्य और तंत्रिका संतुलन को बेहतर बना सकती है।

जागते ही जमीन पर पैर न रखने की परंपरा यह दर्शाती है कि हमारे पूर्वजों की जीवनशैली केवल आस्था पर आधारित नहीं थी, बल्कि शरीर की जैविक प्रक्रियाओं की गहरी समझ पर टिकी थी। आध्यात्मिक अनुशासन और वैज्ञानिक तर्क का यह संगम आज भी हमें बेहतर स्वास्थ्य और संतुलित जीवन की दिशा दिखाता है।

Manju Mamgain

लेखक के बारे में

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शॉर्ट बायो
मंजू ममगाईं पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर काम कर रही हैं।


परिचय एवं अनुभव
मंजू ममगाईं वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिख रही हैं। बीते साढ़े 6 वर्षों से इस महत्वपूर्ण भूमिका में रहते हुए उन्होंने न केवल डिजिटल कंटेंट के बदलते स्वरूप को करीब से देखा है, बल्कि यूजर बिहेवियर और पाठकों की बदलती रुचि को समझते हुए कंटेंट को नई ऊंचाइयों तक भी पहुंचाया है। पत्रकारिता के तीनों मुख्य स्तंभों— टीवी, प्रिंट और डिजिटल में कुल 18 वर्षों का लंबा अनुभव उनकी पेशेवर परिपक्वता का प्रमाण है।

करियर का सफर (प्रिंट की गहराई से डिजिटल की रफ्तार तक)
एचटी डिजिटल से पहले मंजू ने 'आज तक' (इंडिया टुडे ग्रुप), 'अमर उजाला' और 'सहारा समय' जैसे देश के शीर्ष मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। 'आज तक' में लाइफस्टाइल और एस्ट्रोलॉजी सेक्शन को लीड करने का उनका अनुभव आज भी उनकी रिपोर्टिंग में झलकता है। वे केवल खबरें नहीं लिखतीं, बल्कि पाठकों के साथ एक 'कनेक्ट' भी पैदा करती हैं।

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दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी (ऑनर्स) और भारतीय विद्या भवन से मास कम्युनिकेशन करने वाली मंजू, साल 2008 से ही मेडिकल रिसर्च और हेल्थ विषयों पर अपनी लेखनी चला रही हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत जटिल वैज्ञानिक तथ्यों और मेडिकल रिसर्च को 'एक्सपर्ट-वेरिफाइड' मेडिकल एक्सप्लेनर स्टोरीज के रूप में सरल भाषा में प्रस्तुत करना है। स्वास्थ्य से जुड़ी उनकी हर खबर डॉक्टरों द्वारा प्रमाणित होती है, जो डिजिटल युग में विश्वसनीयता की कसौटी पर खरी उतरती है।

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