क्या उंगलियां चटकाने से वाकई कमजोर होती हैं हड्डियां? जानें मिथक और सच्चाई
क्या आप असल में जानते हैं आखिर उंगलियों को चटकाने पर आवाज क्यों आती है। क्या वाकई ये हड्डियों को किसी तरह का कोई नुकसान पहुंचाती हैं।

अकसर लोग बैठे-बैठे सुस्ती भगाने के लिए अपनी उंगलियों के नकल्स को स्ट्रेच करके पॉप की आवाज सुनना एंजॉय करते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से वो कुछ देर के लिए ही सही लेकिन फ्रेश महसूस करते हैं। लेकिन इसके विपरीत कुछ लोग इस आदत को जोड़ों के लिए नुकसानदेह मानते हैं और इसे भविष्य में आर्थराइटिस से जोड़कर देखते हैं। लेकिन क्या आप असल में जानते हैं आखिर उंगलियों को चटकाने पर आवाज क्यों आती है। क्या वाकई ये हड्डियों को किसी तरह का कोई नुकसान पहुंचाती हैं। इन सवालों के जवाब और इससे जुड़े सच और मिथक की सच्चाई जानने के लिए हमने बात की सीके बिरला हॉस्पिटल (गुरुग्राम) के हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण टिट्टल से।
मिथक 1: उंगलियां चटकाने से आर्थराइटिस हो जाता है।
सच: इसका कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं है। लंबे समय तक की गई कई स्टडी में पाया गया है कि जो लोग उंगलियां चटकाते हैं और जो नहीं चटकाते हैं-दोनों में आर्थराइटिस होने के खतरे में कोई फर्क नहीं है। दरअसल, आर्थराइटिस के असली रिस्क फैक्टर जेनेटिक्स, उम्र, सूजन, लगातार एक ही तरह का जॉइंट स्ट्रेस और कुछ मेडिकल स्थितियां हैं, ना कि उंगलियां चटकाना। भले ही उंगलियां चटकाने से आर्थराइटिस तो नहीं होता लेकिन डॉक्टरों की मानें तो यह आदत कभी-कभी उंगलियों में हल्की सूजन, ग्रिप कम होना या आसपास के टिश्यू को नुकसान पहुंचा सकती है।
मिथक 2: उंगलियां चटकाने से जोड़ों के अंदर कुछ 'टूट' रहा होता है।
सच: इस मिथक की सच्चाई यह है कि उंगलियां चटकाने पर आवाज हड्डियों के टूटने की नहीं, बल्कि गैस बबल्स की होती है। हमारे हाथ, घुटने और रीढ़ जैसे कई जोड़ों में सिनोवियल फ्लूइड (synovial fluid) नाम का एक द्रव होता है। जब आप जॉइंट को खींचते या स्ट्रेच करते हैं, तो इसके अंदर प्रेशर बदलता है और गैस के छोटे-छोटे बुलबुले बनकर फटते हैं। उसी फटने की आवाज को हम 'पॉप' समझते हैं। इस प्रक्रिया को कैविटेशन (cavitation) कहा जाता है और ये पूरी तरह सुरक्षित होती है। हड्डियों, लिगामेंट या कार्टिलेज पर इसका कोई बुरा असर नहीं पड़ता है।
मिथक 3: सिर्फ खराब जोड़ों से आवाज आती है।
सच: बिल्कुल नहीं, स्वस्थ जॉइंट भी क्रैक कर सकते हैं। कई बार यह लिगामेंट के हड्डी के ऊपर से स्लाइड होने, टेंडन शिफ्ट होने या प्रेशर बदलने की वजह से होता है। स्क्वाट करते समय, स्ट्रेच करते हुए या लंबे समय तक बैठे रहने के बाद उठते समय यह आवाज आना बहुत आम है। जब तक आवाज के साथ दर्द, सूजन या अकड़न नहीं है आमतौर पर चिंता की बात नहीं होती।
कब हो सकती है यह आवाज परेशानी की वजह?
ज्यादातर मामलों में यह सामान्य है, लेकिन कुछ स्थितियों में ध्यान देना जरूरी हो जाता है-
1. आवाज के साथ दर्द
ऐसा होने पर घुटने के लिगामेंट की चोट, कार्टिलेज घिसना (जैसे ऑस्टियोआर्थराइटिस) या मेनिस्कस टियर जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
2. बार-बार सूजन या जॉइंट लॉक होना
यह किसी अंदरूनी समस्या, जैसे चोट (लिगामेंट टियर), गठिया (आर्थराइटिस), संक्रमण (सेप्टिक आर्थराइटिस), या कार्टिलेज के क्षतिग्रस्त होने का संकेत हो सकता है, जो संरचनात्मक क्षति की ओर इशारा करता है, जिसमें डॉक्टर को दिखाना चाहिए।
3. गिरने या चोट लगने के बाद आवाज आने लगना
अगर आपको जोड़ों से गिरने या चोट लगने के बाद चटकने की आवाज आती है तो ऐसी स्थिति में डॉक्टरी जांच करवाना जरूरी है।
4. बहुत ज्यादा ढीले (hypermobile) जॉइंट वाले लोग
ऐसे लोग अनजाने में ही जोड़ों को बार-बार क्रैक कर देते हैं। यह सीधे नुकसानदेह नहीं है, लेकिन आगे चलकर जॉइंट स्ट्रेन का खतरा बढ़ा सकता है।
सलाह- गर्दन या कमर को जोर से झटका देकर क्रैक करना खासकर खतरनाक हो सकता है। ऐसा करने से मांसपेशियों में खिंचाव या नसों में ऐंठन हो सकती हैं। अगर आपको बैक या नेक क्रैक करने से राहत मिलती है, तो बेहतर है कि स्ट्रेचिंग, एर्गोनॉमिक बदलाव, गर्म सिकाई या प्रोफेशनल फिजियोथेरेपी जैसे सुरक्षित तरीके अपनाएं। जोड़ों का क्रैक होना ज्यादातर मामलों में बिल्कुल हानिरहित है और इससे आर्थराइटिस नहीं होता। ये आवाजें बस जॉइंट फ्लूइड में प्रेशर बदलने की वजह से आती हैं। लेकिन अगर आवाज दर्द के साथ आए, बार-बार आए, या किसी चोट के बाद शुरू हो तो डॉक्टर को दिखाना समझदारी है।

लेखक के बारे में
Manju Mamgain
शॉर्ट बायो
मंजू ममगाईं पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर काम कर रही हैं।
परिचय एवं अनुभव
मंजू ममगाईं वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिख रही हैं। बीते साढ़े 6 वर्षों से इस महत्वपूर्ण भूमिका में रहते हुए उन्होंने न केवल डिजिटल कंटेंट के बदलते स्वरूप को करीब से देखा है, बल्कि यूजर बिहेवियर और पाठकों की बदलती रुचि को समझते हुए कंटेंट को नई ऊंचाइयों तक भी पहुंचाया है। पत्रकारिता के तीनों मुख्य स्तंभों— टीवी, प्रिंट और डिजिटल में कुल 18 वर्षों का लंबा अनुभव उनकी पेशेवर परिपक्वता का प्रमाण है।
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