
क्या है ह्यूमन पैपिलोमा वायरस और कैसे बनता है सर्वाइकल कैंसर का खतरा, आसानी से समझिए
Cervical Cancer Awareness Month 2026 : लोगों को इस गंभीर बीमारी के प्रति जागरूक करने के लिए हर साल जनवरी माह में सर्वाइकल कैंसर अवेयरनेस मंथ मनाया जाता है। फोर्टिस अस्पताल की ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. विनीता गोयल से जानते हैं कि आखिर एचपीवी क्या होता है और यह सर्वाइकल कैंसर का कारण कैसे बनता है।
सर्वाइकल कैंसर (गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर) विश्व स्तर पर महिलाओं को प्रभावित करने वाला चौथा और आम कैंसर है, जो गर्भाशय के निचले हिस्से (सर्विक्स) में होता है। इस कैंसर का मुख्य कारण HPV (ह्यूमन पैपिलोमा वायरस) संक्रमण है। लोगों को इस गंभीर बीमारी के प्रति जागरूक करने के लिए हर साल जनवरी माह में सर्वाइकल कैंसर अवेयरनेस मंथ मनाया जाता है। इस खास मौके पर हमने फोर्टिस अस्पताल की ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. विनीता गोयल से यह जानने की कोशिश की, कि आखिर एचपीवी होता क्या है और यह सर्वाइकल कैंसर का कारण कैसे बनता है।
क्या है ह्यूमन पैपिलोमा वायरस?
ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) एक सामान्य वायरल संक्रमण है, जो दुनिया भर में बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित करता है। एचपीवी कोई एक वायरस नहीं, बल्कि वायरसों का एक बड़ा परिवार है, जिसमें लगभग 100 प्रकार के वायरस शामिल हैं। यह संक्रमण मुख्य रूप से यौन संपर्क के माध्यम से फैलता है। अधिकांश मामलों में एचपीवी संक्रमण के कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते, जिससे व्यक्ति को पता भी नहीं चलता कि वह संक्रमित है।
सर्वाइकल कैंसर के प्रमुख कारण
एचपीवी के सभी प्रकार खतरनाक नहीं होते। हालांकि, कुछ उच्च जोखिम वाले प्रकार विशेष रूप से एचपीवी 16 और 18 अधिक गंभीर होते हैं और सर्वाइकल (गर्भाशय ग्रीवा) कैंसर के प्रमुख कारण माने जाते हैं। ये वायरस गर्भाशय ग्रीवा की कोशिकाओं को संक्रमित करते हैं और समय के साथ उनमें असामान्य बदलाव पैदा कर सकते हैं।
अधिकांश लोगों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) एचपीवी वायरस को 1 से 2 वर्षों के भीतर नष्ट कर देती है, जिससे किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता। लेकिन लगभग 5 प्रतिशत मामलों में यह वायरस शरीर में बना रहता है। ऐसे मामलों में यह गर्भाशय ग्रीवा की कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुंचा सकता है।
लंबे समय तक बना रहता है एचपीवी संक्रमण
जब एचपीवी संक्रमण लंबे समय तक बना रहता है, तो यह गर्भाशय ग्रीवा की कोशिकाओं में असामान्य परिवर्तन शुरू कर देता है। ये बदलाव धीरे-धीरे होते हैं और आमतौर पर कोई लक्षण नहीं देते। यदि समय पर इनका पता न चले, तो 5 से 20 वर्षों की अवधि में ये असामान्य कोशिकाएं सर्वाइकल कैंसर में बदल सकती हैं। यही कारण है कि सर्वाइकल कैंसर को एक 'धीरे विकसित होने वाला लेकिन रोके जा सकने वाला' कैंसर माना जाता है।
सर्वाइकल कैंसर से बचाव
सर्वाइकल कैंसर से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका एचपीवी टीकाकरण है। बच्चों को कम उम्र में यह टीका लगवाने से भविष्य में एचपीवी संक्रमण और उससे होने वाले कैंसर का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है। 9 से 12 वर्ष की आयु में एचपीवी वैक्सीन की केवल 2 खुराकें पर्याप्त होती हैं। वहीं, 13 से 25 वर्ष की आयु में यह टीका 3 खुराकों में लिया जाना चाहिए।
समय पर जांच
टीकाकरण के साथ-साथ समय पर जांच भी अत्यंत आवश्यक है। सर्वाइकल कैंसर की शुरुआती अवस्था का पता नियमित जांच से लगाया जा सकता है। 30 वर्ष की आयु के बाद सभी महिलाओं को वर्ष में एक बार पैप स्मीयर या एचपीवी जांच करवाने की सलाह दी जाती है। इससे बीमारी को शुरुआती चरण में पहचानकर प्रभावी उपचार संभव हो पाता है।

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