
सावधान! क्या आप भी पुरानी चोट से परेशान हैं? जानिए सालों बाद भी क्यों सताता है पुरानी चोट का दर्द
शरीर का घाव भर जाता है, तब भी नसों और कोशिकाओं के स्तर पर उस दर्द का एक 'डिजिटल प्रिंट' बाकी बना रहता है, जो सालों बाद भी आपको उस पुरानी चोट की याद दिलाता रहता है।
अकसर कई बार चोट तो ठीक हो जाती है, लेकिन उसके दर्द का 'अहसास' लंबे समय तक बना रहता है। क्या आपने कभी गौर किया है कि सालों पुरानी मोच या हड्डी की चोट का दर्द, मौसम बदलने या भारी काम करने पर अचानक दोबारा उठने लगता है? विज्ञान की दुनिया में इसे 'बोन मेमोरी' कहा जाता है। यह सिर्फ आपके मन का वहम नहीं है, बल्कि आपके जोड़ों और ऊतकों (tissues) के भीतर दर्ज एक गहरा जैविक सच है। दरअसल, हमारे जोड़ केवल हड्डियों का ढांचा नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसी 'हार्ड ड्राइव' की तरह काम करते हैं जो अतीत के हर आघात और सूजन को अपने भीतर स्टोर कर लेती है। जब शरीर का घाव भर जाता है, तब भी नसों और कोशिकाओं के स्तर पर उस दर्द का एक 'डिजिटल प्रिंट' बाकी बना रहता है, जो सालों बाद भी आपको उस पुरानी चोट की याद दिलाता रहता है। मेदांता अस्पताल के ऑर्थोपेडिक्स डॉ. अशोक राजगोपाल से जानने की कोशिश करते हैं आखिर क्या होती है 'बोन मेमोरी' और क्यों सालों पुराना दर्द मौसम बदलते ही दोबारा परेशान करने लगता है।
क्या होती है 'बोन मेमोरी'
डॉ. अशोक राजगोपाल कहते हैं कि व्यक्ति को जब किसी जोड़ में चोट लगती है जैसे मोच, फ्रैक्चर या डिसलोकेशन तो शरीर उसे ठीक करने में लग जाता है। आमतौर पर हमें लगता है कि प्लास्टर उतरने, दर्द कम होने और फिजियोथेरेपी पूरी होने के बाद जोड़ पहले जैसा हो जाएगा। लेकिन कई बार सालों बाद भी चोट वाला जोड़ लंबे समय तक दर्द करता है, उस जगह अकड़न बनी रहती है या पहले जितना मजबूत नहीं लगता। ऐसा लगता है जैसे जोड़ को उस चोट की 'याद' रह गई हो। यह केवल एहसास नहीं है, बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण होते हैं। जिसे साइंस में सरल शब्दों में 'बोन मेमोरी' के नाम से जाना जाता है।
बोन मेमोरी और जोड़ों के दर्द के पीछे का विज्ञान
जब हमें चोट लगती है, तो हमारे शरीर का नर्वस सिस्टम और इम्यून सिस्टम सक्रिय हो जाता है। रिकवरी के बाद भी, उस हिस्से की कोशिकाएं (Cells) 'हाइपर-सेंसिटिव' मोड में रह सकती हैं। मस्तिष्क उस हिस्से को भविष्य के खतरों से बचाने के लिए अतिरिक्त संवेदनशील बना देता है। इसके अलावा हड्डी या कार्टिलेज के ठीक होने के बाद भी उसका सूक्ष्म ढांचा पहले जैसा लचीला नहीं रहता।
जोड़ चोट को कैसे 'याद' रखते हैं?
जोड़ एक जटिल मशीन की तरह होते हैं। जिनका चोट लगने पर संतुलन बिगड़ सकता है। ऐसा होने पर सबसे पहले, कार्टिलेज (हड्डियों के सिरों पर मौजूद चिकनी परत) को सूक्ष्म नुकसान हो सकता है, जो पूरी तरह ठीक नहीं होता और आगे चलकर ऑस्टियोआर्थराइटिस का कारण बन सकता है।
दूसरा, नसें ज्यादा संवेदनशील हो जाती हैं और हल्की हरकत पर भी दर्द का संकेत देने लगती हैं।
तीसरा, ठीक होने की प्रक्रिया में स्कार टिश्यू बनता है, जो सामान्य टिश्यू से कम लचीला होता है और जोड़ की गति को सीमित कर सकता है।
इसके अलावा, मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं या लिगामेंट थोड़े ढीले रह सकते हैं, जिससे जोड़ में अस्थिरता और बार-बार दर्द हो सकता है।
किन लोगों में यह समस्या ज्यादा होती है?
-गंभीर चोट या जोड़ की सतह तक फ्रैक्चर होने पर
-घुटना, कूल्हा, टखना जैसे वजन उठाने वाले जोड़
-बढ़ती उम्र
-पहले से गठिया, डायबिटीज या खराब स्वास्थ्य
-चोट के बाद सही तरह से फिजियोथेरेपी नहीं लेने वाले लोग
'बोन मेमोरी' के लक्षण और देखभाल
इस समस्या में जोड़ में अकड़न, हल्का-सा लगातार दर्द, आवाज आना (क्लिक या घिसने जैसी), कमजोरी या अस्थिरता महसूस हो सकती है। ऐसे में ऑर्थोपेडिक डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। जांच के लिए एक्स-रे या एमआरआई की जरूरत पड़ सकती है।
इलाज में फिजियोथेरेपी, दर्द कम करने वाली दवाएं या इंजेक्शन, वजन नियंत्रण और रोजमर्रा की गतिविधियों में बदलाव शामिल होते हैं। कुछ मामलों में सर्जरी की जरूरत भी पड़ सकती है। सबसे जरूरी है चोट के बाद सही और पूरी रिकवरी।
सलाह- 'बोन मेमोरी' यह समझने में मदद करती है कि जोड़ की चोट का असर लंबे समय तक क्यों बना रहता है। जोड़ ठीक हो सकते हैं, लेकिन वे चोट को पूरी तरह भूलते नहीं हैं। समय पर सही इलाज और डॉक्टर की सलाह से आप दर्द कम कर सकते हैं और अपने जोड़ों को लंबे समय तक स्वस्थ रख सकते हैं, ताकि आप सक्रिय और बेहतर जीवन जी सकें।

लेखक के बारे में
Manju Mamgain
शॉर्ट बायो
मंजू ममगाईं पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर काम कर रही हैं।
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मंजू ममगाईं वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिख रही हैं। बीते साढ़े 6 वर्षों से इस महत्वपूर्ण भूमिका में रहते हुए उन्होंने न केवल डिजिटल कंटेंट के बदलते स्वरूप को करीब से देखा है, बल्कि यूजर बिहेवियर और पाठकों की बदलती रुचि को समझते हुए कंटेंट को नई ऊंचाइयों तक भी पहुंचाया है। पत्रकारिता के तीनों मुख्य स्तंभों— टीवी, प्रिंट और डिजिटल में कुल 18 वर्षों का लंबा अनुभव उनकी पेशेवर परिपक्वता का प्रमाण है।
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