आंध्र की पुलासा मछली 20 हजार रुपये तक बिकती है, दामाद को खिलाने की परंपरा के पीछे क्या है वजह?
भारत की सबसे महंगी मछलियों में से एक है पुलासा मछली, जो आंध्र प्रदेश में खूब खाई जाती हैं। वहां कहावत है कि इसे खाने के लिए मंगलसूत्र, शादी के गहने भी बेच देने चाहिए और इसके स्वाद को चखने के लिए लोग बेताब रहते हैं। चलिए आपको पुलासा मछली से जुड़ी खास बातें बताते हैं।

नॉन-वेज लवर्स मछली खाना खूब पसंद करते हैं। मछली हल्की होती है और कई पोषक तत्वों से भरपूर भी। भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग किस्म की मछलियां खाईं जाती हैं, जैसे पश्चिम बंगाल में इलिश मछली तो आंध्र प्रदेश में पुलासा मछली के लोग दीवाने हैं। आंध्र प्रदेश में बिकने वाली पुलासा मछली पारंपरिक भोज का अहम हिस्सा मानी जाती है। लेकिन पुलासा मछली की दीवानगी इस तरह है कि ये भारत की सबसे महंगी मछली मानी जाती है और इसकी कीमत करीब 20 हजार रुपये तक पहुंच जाती है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं आखिर ये इतनी खास और महंगी क्यों है?
पुलासा आखिर क्यों है इतनी खास और महंगी
इस मछली की लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि तेलुगु में एक प्रसिद्ध कहावत है- "पुस्तेलु अम्मैना पुलासा तिनावाली", जिसका अर्थ है, "पुलासा खाने के लिए जरूरत पड़े तो अपना मंगलसूत्र या शादी के गहने भी बेच देने चाहिए। पश्चिम बंगाल की इलीश की तरह ही पुलासा मछली को भी नए दामाद की दावत में खास तौर पर परोसा जाता है और इसका स्वाद इतना लाजवाब होता है कि हर कोई इसे खाना चाहता है। बंगाल की इलीश और आंध्र की पुलासा एक ही प्रजाति से आती हैं लेकिन लंबी दूरी तय करने की वजह से पुलासा का स्वाद ज्यादा अच्छा होता है। जुलाई से सितंबर के बीच इसका सीजन रहता है और इसके बाद ये मछली नहीं मिलती, यही कारण है कि लोग इसे खाने के लिए बेताब रहते हैं और इस मछली के लिए हजारों रुपये खर्च कर देते हैं। जो पुलासा मछली सबसे बड़ी होती है, उसकी बोली 20 हजार रुपये तक लगती है और वैसे इसकी कीमत 5 से 15 हजार रुपये के बीच रहती है।
समुद्र से गोदावरी नदी तक का सफर
पुलासा मछली का स्वाद इसलिए भी खास होता है क्योंकि यह मछली बंगाल की खाड़ी वाले खारे पानी से गोदावरी नदी के मीठे पानी तक का लंबा सफर तय करती है। समुद्र में इसे इलिसा (Ilisa) कहा जाता है और जब ये नदी में आ जाती है, तब पुलासा कहलाती है। इस लंबी यात्रा के दौरान इसके स्वाद और बनावट में बड़ा बदलाव आता है, जो इसे भारत की सबसे महंगी मौसमी डेलिकेसी में शामिल कर देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जो मछली जितना लंबा चलती है, वह उतनी पौष्टिक और स्वादिष्ट हो जाती है। ऐसा मान लीजिए कि ये मछली की एक्सरसाइज होती है और उसी से वह हष्ट-पुष्ट रहती है।
नदी में क्यों आती है ये मछली
समुद्र का खारा पानी छोड़कर पुलासा मछली गोदावरी नदी में अंडे देने के लिए आती है। ताज कोरोमंडल के एग्जीक्यूटिव सू-शेफ रवि वर्मा श्रीवास्तव का कहना है कि पुलासा मीठे पानी में अंडे देने आती है। इस दौरान इसके शरीर में फैट का कई प्रतिशत बदल जाता है और स्वाद पूरी तरह अलग हो जाता है। देखने में हिलसा और पुलासा लगभग एक जैसी लगती हैं, लेकिन स्वाद चखते ही फर्क साफ पता चलेगा। आंध्र प्रदेश में जब भी कोई तीज-त्योहार होता है या फिर किसी के घर दामाद आने वाला होता है, तब पुलासा मछली को बनाने की परंपरा है। हालांकि, वहां लोग फ्रोजन मछली खरीदना पसंद नहीं करते हैं, ऐसे में सिर्फ सीजन के दौरान ही इसे खा सकते हैं।
पुलासा पुलुसु है आंध्र की फेमस डिश
आंध्र प्रदेश में पुलासा पुलुसु पारंपरिक करी ही बनाकर लोग खाते हैं और इसके अलावा वहां मछली के साथ कोई अलग एक्सपेरिमेंट करके डिश नहीं बनाई जाती। पारंपरिक तरीके से पुलासा पुलुसु को धीमी आंच पर पूरी रात पकाया जाता है। इसे तैयार होने में लगभग 16 से 17 घंटे लगते हैं। अगले दिन तक मछली के बारीक कांटें नरम हो जाते हैं और करी का स्वाद और लाजवाब हो जाता है। इस पारंपरिक करी में इमली, अदरक-लहसुन का पेस्ट, हरी मिर्च और कुटी हुई लौंग का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे इसका स्वाद बढ़ता है। शेफ का कहना है कि इस डिश का असली हीरो खुद पुलासा मछली है। अगर आप भी कभी जुलाई से सितंबर के बीच आंध्र प्रदेश जाएं, तो पुलासा मछली का स्वाद जरूर चखें।
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