बंटवारे के दर्द से निकला दुनिया का सबसे लाजवाब स्वाद, पढ़ें बटर चिकन का रोचक इतिहास
Interesting History Of Butter Chicken : बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि दुनियाभर में पसंद की जाने वाली यह टेस्टी डिश किसी फाइव स्टार होटल या रेस्त्रां में तसल्ली से तैयार नहीं की गई है बल्कि इस लजीज डिश का इतिहास 1947 के बंटवारे के दर्द और संघर्ष से जुड़ा हुआ है।

नॉनवेज पसंद करने वाले लोगों के लिए बटर चिकन महज एक डिश नहीं, बल्कि स्वाद का वो अहसास है, जिसका नाम सुनते ही उनके मुंह में पानी भर जाता है। लच्छे पराठों के साथ मखमली मक्खन ग्रेवी और जूसी चिकन के टुकड़ों की खुशबू किसी का भी दिल जीत लेती है। हालांकि बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि दुनियाभर में पसंद की जाने वाली यह टेस्टी डिश किसी फाइव स्टार होटल या रेस्त्रां में तसल्ली से तैयार नहीं की गई है बल्कि इस लजीज डिश का इतिहास 1947 के बंटवारे के दर्द और संघर्ष से जुड़ा हुआ है।
पेशावर की गलियों से दिल्ली के दरियागंज तक का सफर
भारत-पाकिस्तान के बंटवारे से पहले बटर चिकन को भारत के पेशावर (अब पाकिस्तान में) बनाया गया था। यहां एक ढाबे में तीन दोस्त कुंदन लाल गुजराल, कुंदन लाल जागी और ठाकुर दास काम किया करते थे। लेकिन 1947 में देश के बंटवारे के दौरान लाखों लोगों की तरह ये तीनों भी अपना सब कुछ छोड़कर भारत आ गए। अपने भविष्य को चिंता को देखते हुए तीनों दोस्तों ने मिलकर पुरानी दिल्ली के दरियागंज में एक छोटी सी जगह किराए पर लेकर अपने पेशावर के ढाबे 'मोती महल' की नींव रखी।
मजबूरी से निकला 'मास्टरपीस'
हैरानी की बात यह है कि बटर चिकन किसी बड़ी प्लानिंग के बाद निकली कोई स्पेशल रेसिपी नहीं थी। बल्कि यह नुकसान से बचने का एक जुगाड़ थी। दरअसल, उस समय में लोगों के बीच तंदूरी चिकन की रेसिपी को बेहद पसंद किया जाता था। लेकिन इस डिश के साथ समस्या यह थी कि अगर तंदूर में पका हुआ चिकन समय पर नहीं बिकता था, तो वह सूखकर सख्त हो जाता था।
नुकसान को स्वाद में बदला
कुंदन लाल गुजराल को खाना फेंकना बिल्कुल पसंद नहीं था। उन्होंने सोचा कि क्यों न इस सूखे हुए चिकन को किसी ग्रेवी में डालकर दोबारा नरम बनाया देखा जाए। उन्होंने टमाटर की प्यूरी, ढेर सारा मक्खन, फ्रेश क्रीम और कुछ हल्के मसालों का एक गाढ़ा घोल तैयार किया। जब उन्होंने सूखे हुए तंदूरी चिकन के टुकड़ों को इस मखमली सॉस में पकाया, तो चिकन फिर से जूसी और नरम हो गया और यहीं से जन्म हुआ बटर चिकन यानी 'मुरग मखनी' का।
नेहरू से लेकर माउंटबेटन तक थे दीवाने
देखते ही देखते मोती महल का यह स्वाद दिल्ली की पहचान बन गया। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी इस डिश को इतना पसंद करते थे कि उन्होंने कई विदेशी मेहमानों को यहां दावत के लिए बुलाया। लेडी माउंटबेटन से लेकर शाह ईरान तक, हर कोई इस डिश का कायल हो गया।
असली बटर चिकन की पहचान
-पारंपरिक बटर चिकन में प्याज का इस्तेमाल नहीं होता है। इसका मुख्य आधार सिर्फ टमाटर और मक्खन होता है।
-इसकी खुशबू के पीछे भुनी हुई कसूरी मेथी का बड़ा हाथ होता है।
-चिकन पहले तंदूर में पका होना चाहिए ताकि उसमें 'स्मोकी फ्लेवर' जोड़ा जा सके।
लेखक के बारे में
Manju Mamgain
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मंजू ममगाईं पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर काम कर रही हैं।
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