क्या गुजिया भारतीय मिठाई है या विदेश से आई? जानिए होली की थाली तक पहुंचने का इसका पूरा इतिहास
होली का त्योहार बिना गुजिया के अधूरा माना जाता है। मावा, मेवा, मैदा के साथ मीठी गुजिया हर किसी को खाना पसंद है। लेकिन क्या गुजिया भारतीय मिठाई है या विदेश से आई है। चलिए इसके पूरे इतिहास के बारे में जानते हैं।

होली के त्योहार पर जिस मिठाई का सबसे अधिक इंतजार होता है, वह है गुजिया। कुरकुरी परत में छिपा मावा, सूखे मेवे और इलायची की खुशबू इसे सिर्फ एक डिश नहीं, बल्कि परंपरा का स्वाद बनाती है। गुजिया सिर्फ एक तरह से नहीं बनती, बल्कि कई अलग ढंग से इसे तैयार किया जाता है। सिर्फ यही नहीं भारत के अलग-अलग राज्यों में इसके कई नाम भी हैं, जो शायद आपको न पता हो। लेकिन क्या आपने सोचा है गुजिया पूरी तरह भारतीय है या इसकी जड़ें विदेश से जुड़ी हैं? आखिर ये होली के लिए इतनी स्पेशल क्यों बन गई और इसे बनाने की शुरुआत कहां और कैसे हुई। चलिए आपको गुजिया से जुड़ा पूरा इतिहास बताते हैं-
प्राचीन भारतीय ग्रंथों में उल्लेख
खाद्य इतिहासकारों के अनुसार, प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में “घृतपक्व” और “कर्णिका” जैसे व्यंजनों का जिक्र मिलता है, जिनमें आटे की परत में मीठी भरावन भरकर घी में तला जाता था। प्रसिद्ध खाद्य इतिहासकार केटी अचाया की किताब इंडियन फूड: ए हिस्टोरिकल कम्पेनियन में भारतीय व्यंजनों के बारे में उल्लेख करते हुए बताया है कि भरी हुई मिठाइयों की परंपरा भारत में सदियों पुरानी है। हालांकि गुजिया शब्द का सीधा उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन उसकी संरचना से मिलते-जुलते व्यंजन मौजूद थे।
मुगल काल और शाही रसोई का प्रभाव
मुगल काल में भारतीय मिठाइयों में मावा, केसर और सूखे मेवों का प्रयोग किया जाता था। प्रसिद्ध पाक-लेखिका तरला दलाल ने भी अपनी रेसिपी पुस्तकों में गुजिया को उत्तर भारत की पारंपरिक होली मिठाई बताया है, जिसका मौजूदा स्वरूप समय के साथ विकसित हुआ। मुगल काल की शाही रसोई की वजह इसकी भरावन में कई बदलाव किए गए और नया स्वाद मिला। भरावन में खूब सारे मेवे, खोया, सूजा का उपयोग होने लगा।
विदेशी स्वीट्स से समानता
दुनिया के कई हिस्सों में भरी हुई पेस्ट्री जैसे व्यंजन मिलते हैं। मिडिल एशिया का ‘सम्बूसा’, यूरोप का ‘टर्नओवर’ या लैटिन अमेरिका का ‘एम्पनाडा’। खाद्य लेखिका Colleen Taylor Sen ने अपनी किताब Feasts and Fasts: A History of Food in India में लिखा है कि बिजनेस और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कारण कई व्यंजनों के रूप अलग-अलग देशों में विकसित हुए। ऐसा हो सकता है कि स्टफिंग वाली पेस्ट्री से गुजिया का आइडिया आया हो लेकिन मैदा, मावा, मेवा के साथ बनने वाली खास गुजिया का इतिहास पूरी तरह से भारतीय है और इसे यही पर बनाने की शुरुआत हुई है।
होली से गुजिया क्यों जुड़ी
होली का त्योहार रंगों और मिठास का प्रतीक माना जाता है, और इसी मिठास का सबसे लोकप्रिय रूप है गुजिया। उत्तर भारत में सदियों से होली के अवसर पर गुजिया बनाने की परंपरा चली आ रही है। माना जाता है कि प्राचीन काल में आटे की परत में मीठी भरावन भरकर घी में तलने की विधि प्रचलित थी, जिसे समय के साथ गुजिया का रूप मिला। मध्यकाल में मावा, सूखे मेवे और इलायची जैसी समृद्ध सामग्री जुड़ने से इसका स्वाद और भी खास हो गया। होली वसंत ऋतु के आगमन का पर्व है। इस मौसम में ऊर्जा देने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करने की परंपरा रही है। गुजिया में इस्तेमाल होने वाला खोया, मेवे और नारियल शरीर को ताकत देने वाले तत्व माने जाते हैं। यही कारण है कि यह मिठाई केवल स्वाद ही नहीं, बल्कि मौसमी जरूरतों से भी जुड़ी रही है।
गुजिया के कई नाम
गुजिया को हम इसी नाम से जानते हैं लेकिन भारत के अलग-अलग राज्यों में इसके कई नाम प्रचलित हैं और इस नाम से भी उसे जाना जाता है। गुजिया को उत्तर भारत जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली में गुजिया ही कहते हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र में करंजी, गुजरात में घुघरा, बिहार में पेडकिया, छत्तीसगढ़ में कुलसी, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कज्जिकायालु, कर्नाटक में करजिका / करंजी और ओडिशा में काकरा पिठा कहा जाता है।
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