'अमीर खुसरो' की कलम से आज के तंदूर तक, जानें क्या है नान का शाही इतिहास

Mar 11, 2026 12:23 am ISTManju Mamgain लाइव हिन्दुस्तान
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आज हम जिस नान को बड़े चाव से अपनी पसंदीदा सब्जी या ग्रेवी के साथ खाते हैं, वह कभी शाही दरबारों की शान हुआ करता था। जिसकी जड़ें भारत से बाहर प्राचीन ईरान (फारस)और मध्य एशिया तक फैली हुई हैं।

'अमीर खुसरो' की कलम से आज के तंदूर तक, जानें क्या है नान का शाही इतिहास

दाल मखनी हो या शाही पनीर, खाने का असली लुत्फ उसके साथ परोसे गए नान के साथ ही आता है। बता दें, नान कोई आज या कल की होटल- रेस्त्रां से निकली हुई रेसिपी नहीं है। नान का इतिहास काफी पुराना और बेहद दिलचस्प है। आज हम जिसे बड़े चाव से अपनी पसंदीदा सब्जी या ग्रेवी के साथ खाते हैं, वह कभी शाही दरबारों की शान हुआ करता था। जिसकी जड़ें भारत से बाहर प्राचीन ईरान (फारस)और मध्य एशिया तक फैली हुई हैं।

नान का सफर: फारस से हिंदुस्तान तक

नान फारसी भाषा का शब्द है, जिसका मतलब 'रोटी' होता है। भारत में नान 13वीं से 16वीं शताब्दी के आसपास आया। जिसका जिक्र प्रसिद्ध कवि और संगीतकार अमीर खुसरो के दस्तावेजों में मिलता है। खुसरों ने नान को दिल्ली के शाही दरबारों में 'नान-ए-तनुक' और 'नान-ए-तनुरी' के रूप में पेश किया था। वहीं कुछ इतिहासकार मानते हैं कि नान की जड़ें लगभग 2500 साल पुरानी हैं, जो प्राचीन मेसोपोटामिया (आधुनिक इराक) से जुड़ी हो सकती हैं, जहां सबसे पुराने तंदूर (मिट्टी के ओवन) मिले थे।

मुगल काल का शाही नाश्ता: भारत में नान का सबसे पहला लिखित इतिहास लगभग 1300 ईस्वी का है, जब इसे दिल्ली सल्तनत के शासकों द्वारा पेश किया गया था। मुगल शासन के दौरान नान सिर्फ एक साधारण रोटी नहीं थी। इसे खास तौर पर सुबह के नाश्ते में कीमे या कबाब के साथ परोसा जाता था। नान के साथ ही तंदूर में पकाने का एक नया हुनर भी फारसी शासकों के साथ भारत आया। कहा जाता है कि मुगल शहंशाहों को खमीर वाली रोटियां इतनी पसंद थीं कि उनके बावर्चीखाने में नान बनाने के लिए विशेष कारीगर रखे जाते थे।

तंदूर का जादू: नान और तंदूर का साथ चोली-दामन का है। मिट्टी के ओवन (तंदूर) में पकने के कारण इसमें वो खास सोंधापन और लचीलापन आता है जो इसे आम तवे की रोटी से अलग बनाता है।

आम जनता तक पहुंच: 17वीं-18वीं सदी तक नान केवल अमीरों और दरबारियों के भोजन तक ही सीमित था। लेकिन धीरे-धीरे तंदूर के उपयोग के व्यापक होने से यह दिल्ली के ढाबों और फिर पूरे उत्तर भारत के आम लोगों की थाली का हिस्सा बन गया।

नान की खासियत: बाकी रोटियों के मुकाबले नान में खमीर लगाया जाता है। पुराने समय में दही या पिछले दिन के गुंथे हुए आटे का इस्तेमाल करके इसे फुलाया जाता था, जिससे यह नरम और मुलायम बनी रहती थी।

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शॉर्ट बायो
मंजू ममगाईं पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर काम कर रही हैं।


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मंजू ममगाईं वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिख रही हैं। बीते साढ़े 6 वर्षों से इस महत्वपूर्ण भूमिका में रहते हुए उन्होंने न केवल डिजिटल कंटेंट के बदलते स्वरूप को करीब से देखा है, बल्कि यूजर बिहेवियर और पाठकों की बदलती रुचि को समझते हुए कंटेंट को नई ऊंचाइयों तक भी पहुंचाया है। पत्रकारिता के तीनों मुख्य स्तंभों— टीवी, प्रिंट और डिजिटल में कुल 18 वर्षों का लंबा अनुभव उनकी पेशेवर परिपक्वता का प्रमाण है।

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